Smritiyo ki Gullak se
Smritiyo ki Gullak se

Hindi Poem: स्मृतियों की गुल्लक से कुछ ,
इतवारी दोपहर चुरानी है।
जो जी हमने हर ऋतु में दोपहरें,
उनसे परिचय कराना बाकी है।

स्मृतियों की गुल्लक से रिक्त हृदय के,
वो श्रंगार आज भी बाकी हैं,
न थे जिसमें ईर्ष्या और द्वेष भरे,
बस प्रेम के वो गुलाब आज भी साथी हैं।

स्मृतियों की गुल्लक से वो प्यास,
फिर से उस बचपन जीने की बाकी है।
दिल जहां मचल मचल जाता,
आम का बौर और उसकी महक सांसों में अभी साथी है।

स्मृतियों की गुल्लक से हर भोर का,
वो सूर्योदय छज्जे से देखना बाकी है।
कलेवा में मां के हाथों की बैंगन भाजी,
रात में पिता की गोद में सीखें शिष्टाचार तन में अभी बाकी है।

कैसे लौटा लाऊं वो रिक्तता हृदय की,
जहां हर्ष उल्लास से तन-मन था भरा।
सब कुछ तो था मुट्ठी में हमारी,
उस मुट्ठी में ही था आसमां  हमारा।