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बच्चों को प्लास्टिक टिफिन में खाना रखना, प्लास्टिक की वाटर बोतल, दाल-चावल के डिब्बे आदि आज सभी की जिंदगी का हिस्सा हैं। लोग बिना सोचे समझे इन्हें यूज करते हैं। लेकिन इतना प्लास्टिक यूज करने की आदत जानलेवा हो सकती है।
Plastic Containers Side Effects: बचा हुआ खाना प्लास्टिक के डिब्बों में फ्रिज में रखना, लगभग हर घर में एक बहुत कॉमन बात है। हमारे फ्रिज ऐसे डिब्बों से भरे रहते हैं। वहीं बच्चों को प्लास्टिक टिफिन में खाना रखना, प्लास्टिक की वाटर बोतल, दाल-चावल के डिब्बे आदि आज सभी की जिंदगी का हिस्सा हैं। लोग बिना सोचे समझे इन्हें यूज करते हैं। लेकिन इतना प्लास्टिक यूज करने की आदत जानलेवा हो सकती है। पिछले दिनों हुई एक स्टडी में प्लास्टिक यूज को लेकर भयानक सच्चाई सामने आई है।
सबसे खराब भारत की स्थिति

द लैंसेट ई-बायोमेडिसिन में प्रकाशित एक स्टडी में सामने आया कि भारत में डीईएचपी से हृदय संबंधी मौतों के मामले सबसे ज्यादा हैं। यह वैश्विक मृत्यु दर का लगभग एक तिहाई हिस्सा है। यह शोध 200 देशों में किया गया, जिसमें भारत की स्थिति सबसे गंभीर दिखी। डीईएचपी यानी डाई-2-एथिल हेक्सिल फेथलेट एक रसायन है, जो प्लास्टिक को ज्यादा लचीला बनाने के लिए काम में लिया जाता है। फूड कंटेनर से लेकर खिलौनों, शैंपू-लोशन की बोतलों, चिकित्सा उपकरणों में डीईएचपी का उपयोग किया जाता है।
भारत में सबसे ज्यादा मौतें
एनवाईयू लैंगोन हेल्थ के शोधकर्ताओं ने अपनी स्टडी में 200 से ज्यादा देशों के लोगों के यूरिन के नमूनों और पर्यावरण संबंधी डेटा का अध्ययन किया। शोधकर्ताओं ने पाया कि साल 2018 में 55 से 64 साल के लोगों में डीईएचपी के संपर्क में आने से लगभग 356,238 मौतें हुईं। यह आंकड़ा इस आयु वर्ग में वैश्विक हृदय रोग से होने वाली मौतों का 13 प्रतिशत से ज्यादा है। चिंता की बात यह है कि भारत में यह आंकड़ा सबसे ज्यादा था। यहां इससे करीब 103,587 मौतें हुईं। चीन में यह आंकड़ा 33,858 और इंडोनेशिया में 52,219 था।
जानलेवा बीमारियों का कारण
डीईएचपी सेहत के लिए खतरनाक हो सकता है। शोध के अनुसार डीईएचपी के संपर्क में आने से हृदय की धमनियों में सूजन आने लगती है। जिससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है। इसी के साथ डीईएचपी डायबिटीज, मोटापे, इनफर्टिलिटी और कैंसर जैसे जानलेवा रोगों का भी कारण बन सकता है। प्लास्टिक प्रोडक्ट्स में थैलेट्स का उपयोग भी किया जाता है। यह एक सिंथेटिक रसायन होता है, जिससे प्लास्टिक लचीला बनता है और उसमें खुशबू आती है। लेकिन थैलेट्स गर्भावस्था के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इससे समय से पहले जन्म जैसी स्थितियां बन सकती हैं। थैलेट्स हार्मोन हेल्थ को भी नुकसान पहुंचाता है।
खुद करनी होंगी कोशिशें
शोधकर्ताओं का कहना है कि प्लास्टिक यूज से हो रही मौतों का आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा हो सकता है। क्योंकि स्टडी में सिर्फ एक विशेष आयु वर्ग के लोगों को ही शामिल किया गया है। ऐसे में बहुत जरूरी है कि लोग अपने स्तर पर सतर्क रहें और प्लास्टिक का उपयोग कम से कम करें। स्टील और ग्लास कंटेनर, टिफिन और बोतलों का उपयोग करें। प्लास्टिक की थैलियों की जगह कपड़े के थैले काम में लें। अपने प्रयासों से आप परिवार की सेहत का ध्यान रख सकते हैं।
इसलिए बढ़ी भारत की परेशानी
भारत में डीईएचपी से मौतों के आंकड़े ज्यादा होने के कई कारण हैं। देश में प्लास्टिक उद्योग तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में डीईएचपी युक्त प्रोडक्ट का उपयोग भी तेजी से बढ़ रहा है। वहीं भारत में डीईएचपी कंट्रोल को लेकर कोई गंभीर कदम फिलहाल नहीं उठाए गए हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जापान आदि देशों ने साल 2008 की शुरुआत में ही प्लास्टिक यूज पर कार्रवाई शुरू कर दी थी। वहीं चीन साल 2018 से इस ओर सख्ती करने लगी। भारत में आज भी बड़े पैमाने पर लोग प्लास्टिक प्रोडक्ट्स यूज कर रहे हैं।
