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नारीमन की कहानियां
Sitaron Bhari Odhani

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

नई दुल्हन ने अपने पति के साथ घर की दहलीज़ पर जैसे ही पांव रखा तो एक उल्लास भरा स्वर कानों में पड़ा, “ऐसे नहीं चलेगा भैया, पहले मेरा नेग, फिर भाभी को घर में लाना।”

“ऐसी भी क्या व्यग्रता है अंजू, थोड़ी देर उधार ही सही, पहले हमें अंदर तो आने दे” प्रकाश ने अपनी चचेरी बहन की मनुहार की।

“नहीं, एक से लाख तक नहीं भैया, इतनी संदर भाभी और नेग के समय उधार नहीं भैया, यह नहीं चलेगा, पहले मेरा नेग, फिर भाभी घर में।”

ऐसे ही, मस्ती और खुशी के वातावरण में नववधू ने घर में प्रवेश किया। देव पूजा से कंगना खेलने तक की सभी रस्मों के पश्चात किसी को याद आया, “अरे! नेहा कहां है?” और इन सब बातों से अनभिज्ञ आंगन के किसी कोने में खड़ी नेहा सोच रही थी, “घर में इतनी भीड़ क्यों है? इतनी भीड़ तो तभी हुई थी, जब मां को भगवान जी ले गए थे। उस दिन तो सब रो रहे थे। आज तो सब बहुत खुश है, बुआ भी, ताई भी, शीला की दीदी भी, और पापा भी।” उसकी बाल सुलभ चेतना को कोई उत्तर नहीं सुझा रहा था। तभी किसी ने नेहा को गोद में उठाया और प्रकाश की गोद में बिठा दिया। “पापा, कहां चले गए थे आप? पता है, आपके बिना मैं कितना रोई” प्रकाश नन्ही बिटिया की बात सुनकर व्याकुल हो उठा। जब उसे कुछ नहीं सूझा तो बोला, “नेहा, देखो कौन आया है? यह है तुम्हारी मां” प्रकाश ने अपनी नवविवाहिता पत्नी की ओर इशारा करते हुए कहा।

“सीमा, यह है हमारी बिटिया नेहा।”

नववधू ने आंख उठाकर नन्ही बच्ची को देखा और बच्ची ने नई मां को। बच्ची को लगा उसकी मां में जो आकर्षण की लौ थी, उसकी निश्छल हंसी से जो ममता बरसती थी, वह इस स्त्री की आंखों में कहीं भी नहीं थी। सीमा ने नेहा की ओर अपनी बाहें पसारी और प्रकाश ने नेहा को सीमा की गोद में बिठा दिया। यह क्या? बालिका पल-भर में ही कसमसा कर गोद से नीचे उतर गई। वह तो फूलों से भी हल्का स्पर्श गोदी में ढूंढ रही थी जो वहां था ही नहीं, फूल-सी बच्ची पल-भर में मुरझा गई। उसे तो नानी मां ने बताया था कि पापा उसके लिए नई मां लेने गए हैं मगर यह औरत तो मां नहीं है। नेहा कुछ पल तो सीमा को निहारती रही, फिर वह धीरे-धीरे चलकर अपने पापा के पास गई और पूछा, “पापा, मेरी मां तो भगवान जी के पास चली गई थी, फिर यह कौन है?”

प्रकाश को एकदम धक्का-सा लगा। पता नहीं नेहा सीमा को अपनी मां स्वीकार करेगी भी या नहीं? नेहा के ताजे घाव अभी भरे नहीं थे। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा, उसने स्वयं को दिलासा दिया।

यूं तो सीमा को पहले ही पता लग चुका था कि प्रकाश की एक बेटी है मगर प्रकाश के सुंदर व्यक्तित्व और प्रभावशाली व्यवहार के कारण सीमा की प्रकाश के प्रति हमदर्दी कब प्यार में पल्लवित हो उठी, समय ने दोनों को पता ही नहीं लगने दिया। दोनों शीघ्र ही विवाह का निर्णय ले बैठे। आज यथार्थ के धरातल पर यह पहली कटु चोट थी, जिसमें इतनी पीड़ा है यह अनुभव सीमा को पहली बार हुआ। इस पथ को जितना आसान सीमा ने समझा था इतना था नहीं। एक तरफ तो सीमा प्रकाश के मन पर एकाधिकार बनाए रखना चाहती थी, दूसरी तरफ बालिका के सरल मन पर एक अदृश्य अभाव अपना आधिपत्य स्थापित करने लगा था, पितृ स्नेह का अभाव। वह बालिका बार-बार स्वयं से प्रश्न करती,” पहले तो पापा मुझे अपने पास सुलाते थे। अब ताई जी के पास क्यों सुलाते हैं? उसका मन करता कि पापा अब भी उसे वैसे ही बाज़ार लेकर जाए जैसे पहले मां के साथ ले जाया करते थे। उधर सीमा में ना जाने कौन-सी कुंठा थी जो वह नेहा को साथ ले जाने से कतराती थी। “चकाचौंध की सभ्यता में विश्वास रखने वाली सीमा शायद नहीं चाहती थी कि लोग उसे इतनी बडी बच्ची की मम्मी समझे। इसलिए नेहा और प्रकाश के साथ बाहर जाने के कितने ही प्रस्ताव समय पर रद्द हो जाते। बालिका केवल इतनी-सी बात समझ नहीं पाती थी कि उसकी नई मम्मी, मां की तरह घंटों गोद में लेकर प्यार क्यों नहीं करती। उसे अपने सीने से लगा कर क्यों नहीं सुलाती। परिणाम यह हुआ सदा उछलने-कूदने वाली नेहा अपेक्षाकृत चुप रहने लगी।

विवाह के कुछ समय उपरांत सीमा का भाई आया, वह सीमा के लिए बहुत सुंदर, सुनहरी जड़ाऊ कारीगरी वाली, लाल रंग की चुनरिया ले कर आया और नेहा के लिए आंखें बंद करने और खोलने वाली गुड़िया। अब नेहा का स्कूल के बाद का समय गुड़िया के साथ बीतने लगा। उसकी ताई ने गुड़िया के लिए कितने ही रंग-बिरंगे कपड़े बनाए मगर चमकीली सुनहरी ओढ़नी ना थी। नेहा अक्सर सोचती अबकी बार मामा आएगा तो वह भी अपनी गुड़िया के लिए ओढ़नी जरूर मंगवाएगी। उधर जब सीमा अपनी ओढ़नी ओढ़ कर किसी भी विवाह शादी में जाती तो सबकी प्रशंसनीय दृष्टि सीमा से हटती ही नहीं थी। एक तो सीमा स्वयं सुंदर, उस पर इतनी आकर्षक ओढ़नी, सीमा की सुंदरता में तो मानो चार-चांद लग जाते। नेहा अक्सर सोचती कि यदि ऐसी ही ओढ़नी उसकी गुड़िया के पास भी होती तो वह अपनी गुड़िया का विवाह शीला के गुड्डे से करती मगर यह नेहा की हसरत ही रही। ताई ने एक ओढ़नी नेहा की गुड़िया के लिए बना भी दी मगर नेहा को तो चमकते झिलमिलाते सितारों वाली दिप-दिप करती वैसी ही चुनरिया चाहिए थी जैसी मम्मी के पास थी। जो उसकी गुड़िया के सुनहरे बालों पर बहुत सुंदर लगती। अपनी गुड़िया को देख नेहा अक्सर उदास हो जाती।

नेहा की यह उदासी उसकी हमउम्र सखी शीला से नहीं छुप सकी। वह बार-बार नेहा से पूछती, “नेहा तुम हमारे साथ पहले की तरह क्यों नहीं खेलती, अब तो पहले की तरह हंसती-बोलती भी नहीं।”

“मेरी गुड़िया की ओढ़नी में चमकीले सितारे नहीं है ना, मैं उसका विवाह तेरे गुड्डे के साथ कैसे करूंगी?” नेहा बार-बार दोहराती।

शीला को भी लगता दुल्हन गुड़िया के लिए सितारों भरी ओढ़नी होनी ही चाहिए। दोनों बालिकाएं घंटों सोचती मगर इस समस्या का कोई समाधान नहीं था। एक दिन शीला की दीदी को बड़े भैया की कमीज़ में टांकने के लिए बटन नहीं मिल रहा था। घर में बटनो से बना एक पर्स पड़ा था। उसने पर्स के कोने से एक बटन उखाड़ा और कमीज़ में टांक दिया। नन्हीं शीला यह सब देख रही थी। उसने अपनी दीदी से पूछा, “दीदी ऐसा करने से पर्स खराब नहीं होगा क्या?”

“अरे नहीं रे पर्स के ऊपर इतने बटन चिपके हैं, एक बटन उखाड़ने से क्या फर्क पड़ता है।”

शीला को तो जैसे अपनी समस्या का हल मिल गया। वह भागकर नेहा के पास गई और उसका हाथ पकड़ कर आम के पेड़ के नीचे ले गई।

“नेहा बता तो तेरी मम्मी की ओढ़नी में कितने सितारे है?”

“ढेर सारे,” नेहा ने नन्ही-नन्ही दोनों बाहें फैलाते हुए कहा।” आसमान से भी अधिक और उससे भी अधिक” बालिका को परिमाप का कोई पैमाना नहीं मिल रहा था।

“अच्छा यदि उसमें से हम 5-7 सितारे तोड़ कर गुड़िया की ओढ़नी में लगा दे तो क्या फर्क पड़ता है।” शीला ने अपनी दीदी की तरह आंखें नचाते हुए कहा।

“मगर यह कैसे हो सकता है?” मम्मी को पता लग जाएगा और ओढ़नी से सितारे टूटेंगे कैसे?”

“सितारे तो हम दोनों तोड़ लेंगे। 4-5 तुम तोड़ना और 4-5 मैं तोडूंगी बस गुड़िया की ओढ़नी पूरी और फिर तेरी गुड़िया दुल्हन और मेरा गुड्डा दूल्हा “दोनों बच्चियों की आंखों में कितनी ही खुशियां तैर गई।

नेहा को लगा यह सचमुच आसान काम है। उसके निश्छल मन में एक बार भी नहीं आया कि यह काम गलत है या ठीक, उसे तो केवल अपनी गुड़िया की ओढ़नी दिखाई दे रही थी, सितारों से भरी ओढ़नी। यकायक वह ठिठकी और बोली, “शीला, ओढ़नी में सितारे टांकेगा कौन?”

“मेरी दीदी वह कभी तम्हारे काम को मना नहीं करेगी” इसके बाद दोनों बच्ची हवा में उड़ने लगी।

अगले ही दिन योजना को कार्य रूप देना था। ओढ़नी को अटैची से निकाल लिया गया मगर ओढ़नी से सितारे तोड़ना आकाश से सितारे तोड़ने के बराबर था। दोनों सखियों ने बहुत प्रयत्न किया सितारे नहीं टूटने थे सो नहीं टूटे। दोनों बालिकाएं भी हठी, दोनों मन में ठान कर बैठी थी कि आज और अभी नहीं तो कभी नहीं। दोनों ने अतिरिक्त साहस से काम लिया और दांतो का सहारा लिया। दांत भी क्या तलवार भी शायद इतनी तेजी से ना चलती ओढ़नी हाथ में थी, ढेरों सितारों के लालच ने सिर उठाया और दोनों बालिकाओं ने जगह-जगह से जाने कितने सितारे तोड़ कर दम लिया। बाद में नेहा ने सभी सितारे और गुड़िया की चुनरी शीला को दे दी। ओढ़नी को फिर से अटैची में रख दिया गया।

शीला ने सभी सितारे और ओढ़नी अपनी दीदी को दे दिए और बोली, “दीदी, नेहा की गुड़िया की ओढ़नी में सितारे टांक दो ना…….”

दीदी की प्यारी और दुलारी नेहा। ना का तो प्रश्न ही नहीं था। हां रात को सितारे टांकते समय वह यह जरूर सोच रही थी पता नहीं भाभी ने इतने अस्त-व्यस्त ढंग से सितारे कहां से तोड़ कर दिए हैं? सितारे अधिक थे सो कुछ काम अगले दिन पर छोड़कर दीदी सो गई।

अगले ही दिन मोहल्ले मैं एकायक विस्फोट हुआ। सीमा को अपनी सहेली के बच्चे के नामकरण संस्कार पर जाना पड़ा तो सोचा क्यों ना वही चुनरिया ओढ़ कर जाया जाए। जैसे ही, उसने अटैची से निकाल कर चुनरिया को फैलाया तो धक से रह गई चुनरिया में कितने ही छोटे-बड़े, गोल-गोल छेद जगह-जगह से झांक रहे थे। सीमा तो उत्तेजना के मारे ज़ोर से चीख पड़ी। उसने ताई जी को पुकारा। देखते-देखते पूरा मोहल्ला इकट्ठा हो गया। कोई कहता किसी ईर्ष्यालु पड़ोसन का काम है, तो कोई कहता किसी ने जादू टोना कर दिया है। सीमा का रो-रो कर बुरा हाल था। इतनी सुंदर चुनरिया तो आसपास किसी के पास भी नहीं थी। उसके भीतर की आग अधिक से अधिक भड़कती जा रही थी। एक बार, बस एक बार, अपराधी का पता लग जाए, तो वह उसे छोड़ेगी नहीं। प्रकाश भी घर पर नहीं था वह करे तो क्या करें।

दोपहर को नेहा ज्यो ही स्कूल से लौटी तो देखा सीमा क्रोधाग्नि में तब्दील हुई कुर्सी पर बैठी थी। पढ़ी-लिखी सीमा यह मानने को कदापि तैयार नहीं थी कि यह जादू टोने का काम है, हां इतना अवश्य हो सकता है कि किसी ने उसकी अनुपस्थिति में नेहा के भोलेपन का फायदा उठाया हो। अतः उसने नेहा से आते ही कड़क कर पूछा, नेहा यह ओढ़नी किसने खराब की? मेरे पीछे यहां कौन-कौन आता है?”

“कोई नहीं मम्मी,” भयभीत बालिका ने लड़खड़ाती आवाज़ में उत्तर दिया।

“सच बताती है या अभी डंडे से ठीक करूं” सीमा ने अंदर से डंडा उठाते हुए बालिका को आग्नेय दृष्टि से देखा।

नेहा के लिए तो इतना ही काफी था। वह एकदम सिहर उठी और भयभीत स्वर में बोली,” शीला मम्मी”

” क्या शीला,” सीमा को तो जैसे विश्वास ही नहीं हुआ।

“और कौन था उसके साथ………”

“मैं मम्मी “

“सितारे कहां हैं,” सीमा अविश्वास को यकीन में बदलना चाहती थी।

“शीला के घर मम्मी।”

सीमा को तो जैसे अपना मुजरिम मिल गया था। पता नहीं कितने थप्पड़ मुक्के उसने नेहा पर बरसाए और अंत में डंडा उसके हाथ में था। उसे क्रोध और आवेश में यह भी होश नहीं रहा कि नेहा बहत छोटी है. उसका विवेक तो जैसे क्रोधाग्नि में भस्म हो गया था। बालिका के हृदय विदारक चीखें उस पर कोई प्रभाव नहीं डाल रही थी। नेहा बार-बार चीख रही थी, “मुझे मत मारो मम्मी, मैं आपके सभी सितारे दे दूंगी, मत मारो मम्मी, मुझे पता नहीं था, मुझे माफ कर दो मम्मी।” मगर सीमा पर तो जैसे खून सवार था, उसे छिन्न-भिन्न ओढनी दिखाई दे रही थी। उसकी सच्चे गोटे और जरी की, हजारों की ओढ़नी इस हठी बालिका ने पल भर में बर्बाद कर दी। क्रोध में, उसे यह भी पता नहीं था वह मार कहां रही है और बच्चे को चोट कहां लग रही है। पता नहीं कौन-सी भड़ास, कौन सी कुंठा, कब से उसके अवचेतन मन में कुंडली मारे बैठी थी जो एकदम फन उठाकर खड़ी हो गई। आखिर ताई ने भागकर उसके हाथ से डंडा छीन कर फेंकते हुए कहा, “क्या बच्चे की जान ही ले लोगी बहू .. यूं तो कसाई भी नहीं मारते, आज इसकी अपनी मां होती तो क्या इतनी बेरहमी से बच्ची को मारती” और ताई बडबडाते हुए नेहा को गोद में उठाकर ले गई।

ताई की बात सुनते ही सीमा हतप्रभ खड़ी रह गई। वह एकदम ग्लानि से भर उठी और कुर्सी पर बैठ कर फूट-फूट कर रोने लगी।

संध्या होने पर प्रकाश घर लौटा तो उसे सब बातों का पता लग चुका था। वह समझ नहीं पा रहा था, दूसरा विवाह करके उसने कौन सी भूल कर दी।

भीतर आकर प्रकाश ने सीमा से नेहा के विषय में पूछा तो वह रो उठी।

“आज तुमने अच्छा नहीं किया सीमा” कहते हुए प्रकाश ताई के घर से नेहा को लाने चला गया।

नेहा को देखते ही प्रकाश ने उसे कसकर सीने से लगा लिया। “मेरी बच्ची,” वह बुदबूदाया। नेहा ने आंखें खोल कर पापा को देखा। शादी के बाद प्रकाश ने पहली बार नेहा को इतना टूट कर प्यार किया। उसके स्नेह-स्पर्श से नेहा तो जैसे निहाल हो उठी मगर उसके शरीर पर चोटों के निशान नेहा से पहले बोल उठे। प्रकाश की आंखों से आंसू झरने लगे। नेहा आंखें बंद किए अब भी सुबक रही थी।

प्रकाश नेहा को लेकर घर आ गया और रात तक नेहा को तेज़ बुखार ने जकड़ लिया। वह एक ही बात दोहरा रही थी रही थी, “मैंने कुछ नहीं किया मम्मी, मझे माफ कर दो. अब दीदी मेरी गडिया की ओढनी में सितारे टांकेगी, मेरी गुड़िया का विवाह होगा’ कभी कहती” अच्छा पापा भगवान जी कहां हैं? मैं मां के पास जाऊंगी मेरी मां मुझे फिर से गोद में बिठाएगी मुझे प्यार करेगी प्रकाश जार-ज़ार रो रहा था उसकी उपेक्षा जिसे वह मामूली समझ रहा था, यह रंग लाएगी इसकी तो उसने कल्पना भी नहीं की थी।

नेहा बीमार क्या पड़ी उसकी बीमारी बढ़ती चली गई। अर्धमूर्छित अवस्था में वह केवल मां को पुकारती और फिर आंखें बंद कर लेती। सीमा ने कितना प्रयास किया कि किसी भी तरह बालिका एक बार उसे नज़र भर कर देख ले। नेहा उसकी तरफ देखती, डरी-डरी, सहमी-सी और फिर चिल्ला पड़ती, नहीं, तुम मेरी मां नहीं हो, मुझे मां के पास जाना है, मुझे मां के पास जाना है” अब तो नेहा के लिए मातृ-दर्शन ही उसके सांस लेने का उद्देश्य बन गया था। वह आंखें खोलती तो नजरें मां को तलाशती, सपने में मां को देखती, शीला की दीदी नेहा को देखने आई परंतु ना ही उसने गुड़िया की बात की, ना उसके विवाह की, ना ही ओढ़नी की और ना ही ओढ़नी में टंके सितारों की। वह हर तरफ मां को ही खोजती। अधिक हालत बिगड़ने पर नेहा को अस्पताल ले जाया गया। बालिका का मन हर नर्स और डॉक्टर से मां का पता पूछता। एक समय ऐसा भी आया कि नेहा की सांसें उखड़ रही थी और प्रकाश डॉक्टरों और नरों के साथ खड़ा असहाय हाथ मल रहा था। वह चाहता था, नेहा के जाते हुए प्राणों को थाम ले मगर उसके पास कोई उपाय नहीं था। परिवार के सभी सदस्य बच्ची के फूल से शरीर को निर्जीव होता देख रहे थे और अंत में बिलख-बिलख कर रो पड़े।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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