उसी के बारे में सोचते हुए कई बार मैं कुछ जरूरी काम भूल जाया करती थी। सारा दिन दुकान के बाहर बैठा रहता था। कभी फोन पर गाने सुनते हुए शायद खुद गाता भी रहता था, मेरी बालकनी से थोडे होंठ हिलते हुए दिखते थे उसके। ‘हद है, कैसे एक ही जगह सारा दिन निकाल देता है, क्या इसका कोई घर नहीं है? मां- बाप, भाई-बहन कोई तो होगा।’
अक्सर मन में ये विचार कौंधा करते थे। इसका काम कैसे चलता होगा, दोनों हाथों की जगह बस कमीज की बाहें झूलती हैं। एक पास में ही बैठी भिखारिन बुढ़िया खाना खिला देती थी अक्सर। कभी एक बहुत ही पतला छोटा लड़का जिसकी आंखें गोल-गोल थीं और था टेड़ी बाहर निकली हुई थीं। बाल मटमैले कहीं से आड़े, कहीं से खड़े हुए ऐसे लगते थे मानो सूखी हुई घास को कहीं-कहीं पर जानवराें ने पैरों तले रौंद दिया हो। उसकी नेकर में जिप खुली रहती थी जिसको उसने बीच में एक पिन से सुरक्षा की दृष्टि से जोड़ दिया गया था, उसके पास आकर बैठा करता था और फाेन पर बटनों को दबाया करता था।
उन दिनों कुछ खास काम नहीं होने की वजह से दिमाग में ऊल-जुलूल ख्याल आते रहते थे। आजकल टैलेन्ट की कद्र कहां है। शिक्षा से ज्यादा अनुभव का बोलबाला है। कल ही एक साक्षात्कार में मुझसे पूछा गया कि आपकी क्वालिफिकेशन और नौकरी के बीच में इतना अन्तराल कैसे आया? मैंने कहा कुछ व्यक्तिगत समस्याएं थीं। इस बात पर महोदया मुस्कुराई और फरमाया कि ठीक है हम आपको सूचित करेंगे। मैं समझ गई। ये तर्जुबा भी कई साक्षात्कार देने के बाद ही हासिल हुआ है। पहले जवाब का इन्तजार किया करती थी। आखिर इतने बेवकूफ, बिना पढ़े लिखे कमा रहे हैं और मुझसे कुछ नहीं हो रहा तभी फोन की घंटी बजी दीदी का फोन था वो कार्यरत हैं, शुरू से ही होशियार रहीं हैं हर काम में, मैंने उनसे ही सीखा सब कुछ। फोन उठाते ही मैनें अपने रोने शुरू कर दिये। “क्या निम्मी, नमन की इतनी अच्छी तनख्वाह है तो तुझे भला नौकरी करने की कहां जरूरत है, तू मस्त रहा कर।”
“दीदी प्लीज, तुम सब कुछ जानती हो, तब भी। बस अब कुछ करना है, समझ में नहीं आ रहा क्या करुं, दुनिया देश-विदेश घूम रही है और मैं इस सड़े हुए किराये के मकान में पड़ी हूं।”
“अच्छा-अच्छा, सब्र रख.. होगा एक दिन सब कुछ तू चिन्ता मत कर।” दीदी हमेशा की तरह दिलासा देने लगी। “तुझे पता है वो मंजरी, अरे वही जिसने भागकर शादी कर ली थी….”
“हां-हां याद है वही ना जो एक शादी शुदा आदमी के साथ भाग गई थी और फिर उस आदमी की पत्नी ने उसको कमरे में बन्द करके बहुत पीटा था।”
“हां-हां, वही, वही….” और फिर मैं और दीदी बहुत हंसे। “हां, तो बताआे ना क्या हुआ, उसके बारे में कुछ बता रहीं थीं तुम।”
“अरे उस बेचारी को कैंसर हो गया है।” “ओहो अरे ये तो बहुत बुरी बात है।” मुझे सचमुच बहुत दुख हुआ।
“हां लोग कहते हैं कि उस आदमी की पत्नी की बद्दुआएं हैं सब।”
“हां….यार पर इसमें आदमी का दोष कोई नहीं देख रहा….उसको क्या हक था अपनी पत्नी के होते हुए किसी दूसरी औरत से इश्क फरमाने का।” और मुझे कुछ याद आ गया और मेरा मन बहुत खराब हो गया। था टेड़ी और बात करके दीदी ने फोन रख दिया और मुझे संसार के सारे मर्दों पर गुस्सा आने लगा। मै चाय का कप ले कर बालकनी में आ खड़ी हुई। सामने सड़क के उस पार बाजार में रौनक होने लगी थी। लड़कियां अपने पुरुष मित्रों के साथ कुछ खाने-खरीदने आ गईं थीं।
इतनी दूर से भी मैं उनके चेहरे पर एक गर्व की चमक महसूस कर पा रही थी। मटके वाली अम्मा आज भी चाय की चुस्की के साथ बगल वाली सब्जी लेकर बैठी हम उम्र अम्मा से अपनी पुत्रवधु की बुराई कर रही थी, बस, क्या बताऊं-गुलाम बना कर रख दिया है मेरे बेटे को। बैठ कहने से बैठता है खड़े होने कहे तो खड़ा होता है, भैया मुझे तो शक है कि रात को हाथ पांव भी दबवाती होगी। इस बुढ़िया को कौन पूछता है सारा दिन इन मिट्टी के खिलौनों पर रंग करके हाथ, गर्दन और कमर की एेसी की तैसी हो जाती है। सारी रात कराहती हूं पर मजाल है दोनाें में से कोई पूछ ले। साली चुड़ैल ने मेरे बेटे पर काला जादू कर दिया है, बदले में सब्जी वाली ने और दो चार बुरी बहुओं के बारे में विचार प्रस्तुत किये और भगवान का शुक्रिया अदा किया, कि उसके बेटा नहीं है। “भैया जब तक हाथ पांव चलेंगें हम बूढ़ा-बुढ़िया काटते रहेंगें जिंदगी, चार लड़कियां हैं, कभी बुरा वक्त आया तो देख लेंगीं नहीं तो अल्लाह मालिक।” मुझे उसके विचार कुछ ठीक लगे। वह लड़का हैडफाेन लगाए था और बुढ़िया उसे थोड़ी-थोड़ी देर में चाय पिला रही थी, गोल कंचे जैसी आंखों वाला लड़का शायद कुछ लिख रहा था।
इतना आर्कषक और साफ-सुथरा भिखारी मैंने अपनी जिन्दगी में पहली बार देखा था। बड़ी-बड़ी आंखें, गेहुंआ रंग, करीने से कढ़े हुए घने बाल। चेहरे पर वही 22-23 की उम्र में रहने वाला नूर। क्यों भीख मांगने पर मजबूर हुआ यह? कहां है इसका परिवार? यह बुढ़िया क्या इसकी कुछ है? नहीं-नहीं यह तो थोड़ी गन्दी दिखती है और काली, बदसूरत भी है, यह नहीं हो सकती। जाने दो मुझे क्या है, जो भी है। फिर मैं अपनी ही परेशानियों से घिरने लगी।
एक-एक करके वे मुझे अपनी उपस्थिति से अवगत कराने लगी, कहने लगी कि मुझे किसी और के बारे में सोचने का कोई हक नहीं है, मैं पहले उनसे भिड़ू, उनसे निबटूं। बहुत कुछ करना है जब अपने से बहुत बेवकूफ या उम्र में छोटे लोगों को 40-50 हजार का पैकेज उठाते देखती हूं तो मन में टीस सी उठती है, जब दूसरी लड़कियों को बिना टैग पढ़े कपड़े खरीदते और अपने आप को चोरी से टैग पढ़ कर हैंगर पर वापस लटकाते हुए पाती हूं तो मन होता है कि शाॅपिंग माॅल ही आना बन्द कर दूँ। जब टेढ़े मेढ़े शक्लाें-सूरत की लड़कियों को गाॅगल्स लगाकर मर्सडीज़ या आडी चलाते हुए देखती हूँ तो सोचती हूँ कि क्या मेरी जिन्दगी रिक्शों, शेयरिंग आटो या बसों में धक्के खाते ही निकल जाएगी? आह भरकर में अन्दर चली गई।
कुछ सोचते-सोचते फ्रिज खोला कि रात के खाने के लिए कुछ बना लूँ, कुछ ऐसी सब्जी नहीं दिखी जिसको खाकर मन कुछ ठीक हो या फिर अन्दर से आवाज़ आई, ‘हे भगवान, फिर खाना बनाओ! एक बार बहुत पैसे आ जाएं तो रसोइया रखूंगी। सीमा कितनी सुखी है रसोइया खाना बना जाता है और वो अपने नाखूनों को आकार देती हुई नेल पेंट लगा रही होती है। यही सोचते-सोचते दो टमाटर बेवजह ही निकाल लिए थे, जैसे ही ख्यालों से बाहर आई तो दिमाग पर जोर डाला कि क्यों निकाले, कुछ समझ नहीं आया तो वापस रखने पड़े। पिछले कुछ महीनों से दिमाग पर पैसा कमाने का इतना भूत सवार था कि किसी और दिशा में उसने कार्य करना ही बन्द कर दिया था। भूलने की बीमारी हो गर्इ थी सो अलग।
उस दिन तो हद ही हो गई जब कूड़ा लेने आए लड़के काे मैनें इस्त्री के कपड़े थमा दिये। जब वह वहां ही खड़ा मेरी ओर ताकता रहा तो मैंनें कहा शाम तक दे देना। बेचारा भला था, बोला ठीक है ये कपड़े मैं धोबी को दे आऊंगा पर आप कचरा तो दे दो। ओफ्फ! मैने कहा साॅरी भैया मैं ही दे दूंगी और कपड़े वापस ले लिए। बहुत शर्म महसूस हुई उस दिन। रात को सोचती रही कभी अपने अतीत के बारे में और कभी भविष्य के बारे में सपने बुनती रही। कब धीरे से नींद ने अपने आगोश में ले लिया पता ही नहीं चला।
सुबह जब चाय लेकर बालकनी में गई तो देखा कि बुढ़िया उस लड़के का मुंह धुला रही है और एक हाथ में टूथब्रश है। छोटा लड़का बगल वाले ठेले पर बैठा एक गोल मटोल पिल्ले के साथ खेल रहा था, पिल्ला उसको कभी यहां कभी वहां चाट रहा था तो उसे गुदगुदी हो रही थी और वह ही-ही करता हुआ पिल्ले को हटा रहा था। अभी ट्रैफिक का शोर बहुत कम था। बस सड़क की सफाई करने वाले धूल का गुबार उड़ा रहे थे। चाय की रेड़ियां शुरु हो गईं थी और कुछ जल्दी काम पर जाने वाले लोग चाय पीने लगे थे। वहीं चाय पीने आए एक लड़के ने मंगू को कुछ पैसे दिये और थोड़ी देर बात कर चला गया, मुझे मंगू पर दया आई; हां शायद इसी नाम से बुलाते थे लोग उसे। बुढ़िया ने वो पैसे रख लिये और मंगू के कान में हैडफोन लगा दिया और शायद कोई नम्बर मिलाया। मैं अन्दर आई तो मन में अजीब बेचैनी थी। एक उत्सुकता थी उसके बारे में जानने की, एक इच्छा अन्दर ही अन्दर पनप रही थी उससे बात करने की। मन ने अपने आप ही निश्चय कर लिया कि आज जाकर बात करूंगी उससे। सोचे जिसको जो सोचना है।
दिमाग में ही सूची तैयार कर ली थी कि बाजार से क्या-क्या लेना है जबकि दिमाग वाली सूची कभी कामयाब नहीं हो पायी थी, कुछ न कुछ रह ही जाता था और फिर दोबारा जाने की झुंझलाहट को कुछ हद तक मैंने दूर करना सीख ही लिया था। आखिर अनुभव भी कोई चीज होती है। मुझे बाजार जाने और विशेषतः सब्जी खरीदने जाने में कभी खुशी या उत्साह महसूस नहीं हुआ। लेकिन उस दिन एक अनोखी उत्सुकता थी अपने कथा पात्र से मिलने की। मैं वहां पहुंची तो वह उस कुपोषित बच्चे से कविताएं सुन रहा था और समय-समय पर निर्देश भी दे रहा था।
मैं वहां खड़ी रही और बात करने में कुछ हिचकिचाहट महसूस हुई तो अचानक सूझा कि काेई पता ही पूछ लेती हूं।
‘अ…..भैया यहाँ कोई हार्डवेयर की दुकान होगी यहां?’ इस प्रश्न पर दुकान वाले भाईसाहब बोले, ‘मैडम अगली गली में है।’ उनकी मुस्कान कुछ विशेष बड़ी और नकली थी। हद् है, अब मैंने फोन निकाला और कुछ देर व्यस्त होने का नाटक किया ताकि यह भाईसाहब किसी ग्राहक में व्यस्त हो जाएं। अब सही समय है, मैंने फिर प्रयास किया, ‘भैया, आप….’
‘माई नेम इज मंगेश सिन्हा मैम, आई नो यू स्टे इन दैट अर्पाटमैंट, राईट?’
मेरा तो दिमाग ही घूम गया जैसे सांप सूंघ गया हो, थोड़ी देर तक बोल ही नहीं पाई।
‘मैम, मैंने बहुत बार सोचा आपसे मिलने आने के लिए….आप इंगलिश पढ़ातीं हैं ना? मुझे ग्रामर की क्लासेज लेनी थीं। मेरी स्पाेकन तो ठीक है थोड़ी ग्रामर में प्राॅब्लम है।’
‘लेकिन आप तो….मतलब यहां….फिर….मेरा मतलब आप इंगलिश….’
‘सांइस ग्रैजुएट हूं मैम, एक हादसे में अपना परिवार खो बैठा और मेरे हाथ…. यह अंकल, उसने दुकान वाले भाईसाहब की तरफ देखा, वहां उस वक्त मौजूद थे… सो मुझे अपने साथ ले आए….ही इज वैरी काइन्ड मैन, ही ओन्ली टुक केयर आॅफ मी।’ भाईसाहब मुझे देखकर मुस्कुराए, उनके मोटे होंठ फैलकर कानों तक आ गए और उन्होंने गर्व से मेरी ओर देखा, यह एक ‘अवार्ड विनिंग स्माइल’ थी। ‘आइ एम नाॅट अ बगैर मैम, फोन पर स्पोकन इंगलिश की फ्री ट्रेनिंग देता हूं, बदले में स्टूडेंन्ट्स मेरा फोन रीचार्ज करवा देते हैं। मुझे जिन्दगी काटनी तो थी मैम, पहले बहुत दुखी रहा करता था, घर से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं होती थी, मन करता था आत्महत्या कर लूं। फिर एक दिन ऐसे ही टीवी पर एक मोटीवेशनल स्पीच आ रही थी, सुन कर लगा कि कुछ करना चाहिए। मैंने अंकल से इस विषय पर बात की तो वह बहुत खुश हुए और कहा कि मैं उनके बच्चों को पढ़ा सकता हूं। बस वहीं से हुई खुश रहने की शुरुआत। फिर एक दिन दुकान पर कोई दो मित्र आपस में इंगलिश में बात कर रहे थे मुझे लगा इन्हें शायद और प्रैक्टिस की जरूरत है, एक ने कहा कि कोई मिलता ही नहीं है जिससे बात करके इंग्लिश बेहतर हो जाए। मैंने उन्हें सुझाव दिया कि मुझसे प्रतिदिन तीस मिनट या एक घंटा बात करो। मैं आपकी मदद कर सकता हूं। वे लड़के बहुत खुश हुए और बस तब से ही इन्हीं सब कामों में समय व्यतीत होता है। ‘ताे आप मुझे ग्रामर की क्लास देंगी ना मैम?’
मैं ख्यालों से वापस आई या फिर शायद खो गई थी उसकी बातों में, वह बैठा था मैं खड़ी थी पर मैंने बौना महसूस किया अपने आप को….आंखें नहीं मिला पा रही थी जैसे वह कोई चढ़ता हुआ सूरज हो और मैं देख नहीं पाऊंगी आंखें चुंधिया जाएंगी….बहुत तुच्छ या फिर गिरा हुआ कहना औचित्यपूर्ण रहेगा।
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