चांदनी - गृहलक्ष्मी की कहानियां

गौरी के आंसू उसके अंदर का दर्द बयां करते थे। वह खुद को बहुत ही बेबस और लाचार पाती थी। उसके माता-पिता भी बहुत दु:खी रहने लगे। मगर उनके ऊपर दु:खों का असली पहाड़ तो अभी टूटना बाकी था। गौरी की शारीरिक संरचना की खबर उड़ते-उड़ते किन्नर समाज तक जा पहुंची।

आज शर्माजी के यहां बड़ी ही रौनक लगी हुई थी। कई वर्षों बाद पोता होने की खुशी में, जोरदार पार्टी दी गई थी। मैं पहुंची, तब तक बच्चे का नामकरण हो चुका था। मुझे देखते ही मिसेज शर्मा बड़े ही प्यार से मुझसे आकर मिली।
‘अरे संजना! कितनी देर कर दी आने में, मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रही थी।’
‘अरे आंटी, वो बस बच्चों को स्कूल से लाकर, फिर ट्यूशन क्लास में पहुंचाकर, सीधी आपके पास ही आई हूं।’
‘मतलब बच्चों को नहीं लाई। ये तो गलत बात है।’ शर्मा आंटी ने थोड़ी-सी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा।
‘आंटी, कल से दोनों के ही एग्जाम शुरू हो रहे हैं, बस इसीलिए। खैर मेरी छोड़िए, ये बताइए पोते का नाम क्या रखा?’
‘तुम्हारे अंकल ने नाम रखा है- ‘पार्थ।’
‘बड़ा ही प्यारा नाम है। आपको बहुत बधाई हो आंटी।’
‘सारी बातें यहीं खड़े-खड़े करोगी क्या!’ कहकर आंटी मुझे अंदर ले गईं। अंदर के हॉल में, एक कोने में, सोफे पर वृंदा अपने नन्हे से राजकुमार को गोद में लिये बैठी थी। नीचे फर्श पर कुछ औरतें बैठी गीत गा रही थीं। नन्हा पार्थ अपनी मां की गोद में सुकून की नींद सो रहा था। मैं जाकर वृंदा के पास बैठ गई। वृंदा ने पार्थ को मेरी गोद में दे दिया, बड़ा ही प्यारा बच्चा था। एकदम कमल के फूल जैसा कोमल और खूबसूरत। उसके चेहरे से नजर हटाने का दिल ही नहीं कर रहा था।
‘लो संजना, पहले कुछ खा लो’ आंटी ने नाश्ते की ट्रे मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा।
मैंने आंटी के हाथ से चाय नाश्ते की ट्रे लेकर अपने पास रख ली। पार्थ को दोबारा वृंदा की गोद में सौंपा। मैंने चाय का घूंट भरा ही था कि बाहर से थोड़ा शोर-शराबा-सा आने लगा।
‘बधाई हो बधाई हो। पोता हुआ है। पोते की बधाई लेने आये हैं।’
मैं और सभी औरतें समझ गए कि बाहर हिजड़े आ गए हैं। खैर क्यों ना आते भला! उनका तो काम ही यही है। तभी शर्मा आंटी बाहर से आईं और बोलीं, ‘संजना, बाहर हिजड़े आए हैं। तुम वृंदा और मुन्ने को लेकर बाहर आ जाओ।’ मैंने झट से अपनी चाय खत्म की। बच्चे को गोद में लिया और वृंदा के साथ ही बाहर आकर कुर्सी पर बैठ गई। हिजड़ों की सरदार बुलबुल ने अपनी टोली को गाने का हुक्म दिया। उसकी टोली में उसके अलावा चार और लोग भी थे। एक ढोलक बजाने लगा और दूसरा हारमोनियम बजाने लगा। बाकी के दोनों ने नाचना शुरू किया। बुलबुल अपनी टोली के पास वहीं एक कुर्सी लेकर बैठ गई। नाचने वाले दोनों हिजड़ों में से एक को देख कर मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने उसको कहीं देखा है। बड़ा ही जाना-पहचाना सा चेहरा लग रहा था। बुलबुल उसे बार-बार बीच में टोक भी देती थी।
‘ए चांदनी, ठीक से ठुमका लगा नहीं तो यह सेठानी रुपया देने में चिक-चिक करेगी।’ बुलबुल की बात सुनकर ढोलक वाला ढोलक की थाप और तेज कर देता है और दोनों हिजड़े पहले से ज्यादा फुर्ती के साथ नाचने लगते हैं। हिजड़े अपने नाचने-गाने में लगे हुए थे। सभी औरतें आपस में हंस-हंसकर नाच गाने का आनंद ले रही थी। मगर मेरा ध्यान बार-बार उसी बात पर चला जाता कि आखिर मैंने उस हिजड़े को कहां देखा है। तभी एक धुंधला-सा चेहरा याद आया।
‘कहीं ये गौरी तो नहीं?’ मैंने अपने आप से सवाल किया। मगर इसका नाम तो चांदनी है? मेरे मन के एक कोने में उधेड़बुन चल रही थी। नाच-गाना जब खत्म हुआ तो, बुलबुल ने बधाइयां गाना शुरू कर दिया। जैसे ही उसने बधाइयां गाना शुरू किया शर्मा आंटी एक थाली में चावल, फल, सुहाग का पूरा सामान इत्यादि लेकर आ गईं। बुलबुल ने थाली लेकर गाना गाते-गाते सारी सामग्री वृंदा की गोद में डाल दी। और उसके सर पर हाथ रख आशीर्वाद देने लगी।
‘लाओ सेठानी जी, पूरे 51,000 रु. लूंगी, पोते की बधाई’ बुलबुल ने अपने दोनों हाथों से ताली पीटते हुए कहा।
‘अरे बुलबुल 51,000 तो बहुत ज्यादा है। मैं 21,000 से एक रुपया ज्यादा नहीं दूंगी’ शर्मा आंटी ने कहा।
‘हाय कैसी बातें करती हो। बड़ी मिन्नतों के बाद तो चांद-सा पोता घर आया है। और तुम हो कि कंजूस बन रही हो।’
‘अरी बुलबुल मान जा, आजकल थोड़ा हाथ तंग है। फिर कभी कुछ हो तब ले जाना’ शर्मा आंटी ने मिन्नत की।
‘देखो सेठानी, हमें मत सिखाओ हां। बुलबुल की दुआ लगे। तेरा मुन्ना हजार बरस का हो। मुन्ने की बलायें ले लूं। भगवान मुन्ने को हजार वर्ष की नीम दे। हिजड़ों की दुआ कभी खाली नहीं जाती।’
‘अच्छा-अच्छा ठीक है दे दूंगी।’ आंटी को पता था कि बुलबुल से पीछा छुड़ाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था।
मैं, वृंदा और मुन्ने तो अंदर लेकर आ गई। अंदर आने के बाद भी मेरा मन कहीं उलझा हुआ था। तभी किसी ने पीछे से मेरे कंधे पे हाथ रखा।
‘संजना, कैसी हो’ एक मर्दानी-सी आवाज सुनकर मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो चांदनी मेरे पीछे खड़ी थी।
‘तुम-तुम, गौरी हो ना’ मैं सहसा पूछ उठी।
‘हां! मैं गौरी ही हूं। मैंने तुम्हें देखते ही पहचान लिया था।’
‘हां, मैं भी बड़ी देर से तुम्हारे बारे में ही सोच रही थी। लेकिन बुलबुल तो तुम्हें चांदनी नाम से…’
‘हां संजना, गौरी से चांदनी। हम्म बड़ी लम्बी कहानी है’ गौरी ने लम्बी सांस लेते हुए कहा।
‘गौरी तुम तो रामपुर में थी। फिर यहां दिल्ली कैसे?’
‘यह जिंदगी भी बड़ी अजीब चीज है। पल में इंसान को कहां से कहां लाकर खड़ा कर दे पता ही नहीं चलता।’ कहते हुए गौरी एकदम शांत हो गई।
मैं गोरी के चेहरे की तरफ देखने लगी। गौरी के चेहरे पर वही भोलापन आज भी बरकरार था जो कभी बचपन में हुआ करता था। एक ही स्कूल में पढ़ते थे हम दोनों। गौरी का घर भी मेरे घर से कुछ ही दूरी पर था। गौरी के पिता की बर्तनों की दुकान थी और मेरे पिता पेशे से वकील थे। एक ही स्कूल होने के कारण हम दोनों अक्सर साथ में स्कूल आना-जाना करते थे। गौरी बड़ी हंसमुख और सरल स्वभाव की थी। वह बहुत होशियार थी। हर साल क्लास में फर्स्ट आया करती थी। अक्सर हम लोग एक दूसरे के घर भी आया जाया करते थे। बचपन के दिन सुहावने होते हैं। वैसे ही हमारे भी थे।
धीरे-धीरे समय बीतता है, और बचपन यौवन में परिवर्तित होता है। हमारे साथ भी ऐसा ही होना शुरू हुआ। बचपन से किशोरावस्था में कदम बढ़ रहा था। प्रकृति के अनुसार मेरी शारीरिक संरचना में भी परिवर्तन आना शुरू हो गया। मासिक धर्म की भी शुरुआत हो चुकी थी। मानसिक परिवर्तन भी आने शुरू हो गए। लेकिन मेरे उम्र की गौरी में कहीं कोई परिवर्तन नहीं आ रहा था। उसका बस कद ही थोड़ा बड़ा हो रहा था। वरना वक्षस्थल का उभार या मासिक चक्र जैसा कोई भी लक्षण शुरू नहीं हुआ था। मेरा कोमल मन अक्सर इन बातों को सोचता था। कभी-कभी तो गौरी से पूछ भी लिया करती थी।
‘गौरी तुम्हारा पीरियड कब आता है?’
गौरी ‘पीरियड! ये क्या है संजना’ गौरी बड़ी ही मासूमियत से पूछती।
उसका जवाब सुनकर मैं भी चुप हो जाती। जब मैंने मां को गौरी के बारे में बताया तो उनके चेहरे पर एक शिकन सी आ गई। उस वक्त मुझे समझ नहीं आया कि मां आखिर क्यों चिंतित हो रही है। लेकिन धीरे-धीरे कुछ महीनों बाद मोहल्ले में खबर फैलने लगी। आस-पड़ोस में गौरी के बारे में चर्चाएं होने लगी, मोहल्ले में गौरी को हिजड़ी कहा जाने लगा। गौरी के पिता परेशान रहने लगे। धीरे-धीरे गौरी के पिता ने उसका स्कूल जाना भी बंद करा दिया। गौरी खुद भी बहुत चुप-चुप रहने लगी। अब वह किसी से भी ज्यादा बात नहीं करती थी। सिर्फ एक मैं ही थी जो गौरी के पास जाया करती थी। मुझे याद है, वो घंटों मेरे पास बैठ कर रोती रहती थी।
‘संजना भगवान मेरे साथ ही ऐसा क्यों कर रहा है? क्यों उसने मुझे तुम्हारे जैसा नहीं बनाया?’
एक दिन दोपहर का समय, मैं स्कूल से वापस आ रही थी। तभी देखा कि गौरी के घर के बाहर बहुत भीड़ लगी हुई है। उसी भीड़ में मैंने अपने माता-पिता को भी खड़ा देखा तो घबरा गई।
सारा माजरा समझ आने में देर नहीं लगी। गौरी के माता-पिता को जिस बात की फिक्र थी, आज वही हुआ था। किन्नरों का एक झुंड गौरी को लेने आया था। गौरी घर के अंदर बंद थी। मेरे पिता किन्नरों से कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्यवाही करने की मांग कर रहे थे। मगर किन्नर या हिजड़े अपनी बात पर डटे हुए थे। उनका तर्क था कि गौरी उनके समाज का हिस्सा है। वो उसको ऐसे कभी नहीं रहने दे सकते। बात जब ज्यादा बढ़ने लगी तो बाबूजी ने पुलिस को बुला लिया। पुलिस के आने से उस समय तो मामला शांत हुआ। मगर बात अब कोर्ट तक जा पहुंची थी। मेरे पिता ने गौरी के पिता की तरफ से वकालत की, कई महीनों तक कोर्ट में मुकदमे की कार्यवाही चली।
आखिरकार कोर्ट ने भी अपना फैसला किन्नरों के पक्ष में सुनाया। गौरी और उसके माता-पिता की रही सही उम्मीद भी टूट गई। फैसले के अगले दिन फिर से किन्नरों का झुंड, गौरी के घर आ पहुंचा। गौरी डर के मारे अपने घर के अंदर छुपी हुई थी। गौरी के मां-बाप, रो-रो कर उनसे रहम की भीख मांग रहे थे। मगर उनको, उनकी किसी भी बात का कोई असर नहीं हुआ। आखिरकार किन्नरों का झुंड, गौरी को उसके घर से खींचकर ले गया। और पूरा मोहल्ला तमाशा-बीन बनकर देखता रह गया।
‘संजना…संजना…कहां खो गई। आंटी की आवाज से तन्द्रा भंग हुई। आंटी हाथ में पैसे, मिठाई और कुछ कपड़े लिए खड़ी थी। गौरी अब भी वहीं बैठी हुई थी।
‘गौरी तुमने बताया नहीं, तुम यहां कैसे पहुंची। मैंने गौरी से फिर पूछा।
‘संजना, उस दिन घर से जब किन्नर मुझे ले आए तो बहुत दिनों तक तो मैं रोती रही। मन में सोचती थी, यहां से वापस अपने घर कैसे जाऊं। लेकिन उन लोगों से भाग पाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन था। धीरे-धीरे उन्होंने मुझे नाच-गाना सिखाना शुरू कर दिया और मुझे अपने साथ लेकर जाने लगे। मैं शर्म और घुटन के मारे जी भी नहीं पा रही थी और मर भी नहीं पा रही थी। एक जिन्दा लाश की तरह हो गई थी।
वहां जो किन्नरों की सरदार थी- शबनम, वह मुझे बहुत समझाती थी। वो कहती थी कि ‘देख बेटा, तुझे लग रहा होगा कि हमने तेरे साथ ज्यादती की है। मगर ये समाज बहुत बुरा है। तू आज कम से कम ऐसे लोगों के बीच तो है, जिनका दर्द बिलकुल तेरे जैसा है। यहां सब तेरे जैसे हैं। यहां कोई भी तुझे ताना मारने वाला नहीं है। मगर वो समाज जहां से तू आई है, वो तुझे और तेरे मां-बाप को जीते-जी मार डालता। वो समाज तुझे कभी नहीं अपनाता। समाज के तानों से तंग आकर या तो एक दिन तू खुदकुशी कर लेती या फिर तेरे मां-बाप।
शबनम की बातें मुझे तीर की तरह चुभती थी। मुझे लगता था कि मेरे मां-बाप मेरे लिए तड़प रहे होंगे। ऐसा कुछ नहीं होगा जैसा शबनम कहती है। लेकिन संजना एक दिन मेरा ये भ्रम दूर हो गया।
करीब एक साल बाद, मैं एक शादी में गई। मुझे जाना ही पड़ा, और कोई चारा भी नहीं था। वहां जब मैं बाकी किन्नरों के साथ नाच रही थी तो मेरी नजर मेरे पिता और भाई पर पड़ी। उन दोनों को देखकर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मैं लपककर उनके पास मिलने जाने लगी। मगर तभी मेरे पिता ने आंखों में आंसू भरकर, अपने दोनों हाथों को जोड़कर, मुझे उनसे दूर रहने का इशारा किया। मैं समझ गई कि शायद वो मुझे अपनी बेटी बताकर, समाज में अब और शॄमदगी उठाना नहीं चाहते हैं। उस वक्त शबनम के कहे शब्द मेरे कानों में गूंजने लगे। सच ही तो कहा था उसने कि अब उस समाज में मेरा कोई नहीं था। शबनम की नजर भी मेरे पिता और मुझ पर पड़ चुकी थी। वो मेरे पास आई और उसने मुझे सीने से लगा लिया। शबनम के सीने से लिपटकर मैं फूट-फूटकर रोने लगी। उस समय उसने मुझे एक मां की तरह सहारा दिया। मैंने शबनम से कहा कि मुझे अब इस शहर में नहीं रहना। शबनम ने मेरी परेशानी और मेरे दर्द को बखूबी समझा।
वह बोली, ‘रोती क्यों है- गौरी। मैं हूं ना। मैं कल ही तुझे दिल्ली भेज दूंगी। वहां तू चांदनी के नाम से जानी जाएगी। गौरी को हमेशा के लिए यहीं छोड़ जाना। और अब इस दुनिया में ही खुश रहने की कोशिश करना।’ शबनम की बातों ने मेरे जख्मों पर मरहम का काम किया। मैं अगले दिन ही दिल्ली आ गई। यहां बुलबुल के साथ मुझे रहने का मौका मिला। मैंने नियति को ही अपना नसीब समझ कर जीना शुरू कर दिया। अब तो इन लोगों के साथ रहने की आदत हो गई है’ कहते-कहते गौरी थोड़ी भावुक भी हो गई और हल्का-हल्का मुस्कुराने भी लगी।
‘गौरी अब हम एक ही शहर में हैं। मैं शादी के बाद से यहीं रह रही हूं। कभी-भी अपनी इस सहेली की याद आये तो घर जरूर आना। यहीं पास ही मेरा घर है।’
‘मैं जरूर आऊंगी। मगर आज के बाद तुम कभी मुझे गौरी कहकर नहीं बुलाओगी। गौरी को अब मैंने कब का पीछे छोड़ दिया। अब मैं चांदनी हूं। चांदनी बनकर ही खुश रहना चाहती हूं। एक ऐसी दुनिया में रहना चाहती हूं, जहां सब लोग मेरे जैसे ही हैं। यहां कोई भेदभाव नहीं है। सब अपनी जिंदगी को खुशी-खुशी जीते हैं।’
शर्मा आंटी ने उनको रुपये देकर विदा कर दिया। जाते-जाते गौरी ने मुड़कर पीछे देखा और हल्की-सी मुस्कुराहट छोड़ कर चली गई। मैं दरवाजे पर बुत बनी खड़ी रही।

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