Hindi Kahani
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Hindi Motivational Story: “मिस्टर दीपक आपने सभी सवालों का जवाब बिल्कुल सही दिया है। हमें खुशी होगी आप जैसा काबिल व्यक्ति हमारे स्टाफ में शामिल हो। हम आपको कॉल करके बताएंगे कि कब से ज्वाइन करना है।”
राजेन्द्र ने संगीत शिक्षक के लिए अंतिम अभ्यर्थी दीपक से कहा जिसके चेहरे पर शुन्य भाव उसने भी महसूस किए।
राजेंद्र ने अपने पिता के स्कूल को संभालने का कार्य भार अपने कंधों पर ले लिया था उनकी मौत के बाद।
वो अपनी मेहनत और ईमानदारी से उस छोटे से प्रायमरी स्कूल को हायर सेकेण्डरी तक ले आया था।
उसके कुछ रिश्तेदार इस उम्मीद से उसके पास हमेशा आते रहते थे कि वो अपने स्कूल में उन्हें नौकरी पर लगा देगा पर राजेंद्र का दो टुक जवाब रहता। “जब वेकेंसी निकलेगी तब अपना बायोडाटा लेकर स्कूल आ जाइएगा। अगर आप उस पोस्ट के काबिल होंगे तो आपको नौकरी जरूर मिलेगी लेकिन यह मत सोचिएगा कि आप मेरे रिश्तेदार हैं तो सिर्फ इसी आधार पर नौकरी के काबिल हो
गए।”
उसके कई रिश्तेदारों ने तो उससे रिश्ता ही तोड़ लिया था जब राजेन्द्र ने बाकी कैंडिडेट की तरह उनके साथ व्यवहार किया और नौकरी के लिए उपयुक्त योग्यता नहीं है कहकर साफ मना कर दिया।
उसका मकसद शिक्षा को व्यापार या भाई-भतीजावाद से दूर रखना था। स्कूल कोई राजनीतिक अखाड़ा या फिल्म इंडस्ट्री नहीं है और ना ही कोई व्यापार है यह तो ज्ञान का मंदिर है। राजेंद्र द्वारा चलाए जा रहे आर. के. पब्लिक स्कूल में शिक्षा का स्तर बहुत ही अच्छा था
वो हमेशा शिक्षक की नियुक्ति के समय उनकी योग्यता और पढ़ाने की क्षमता का पूरा ध्यान रखता।

इंटरव्यू हॉल से निकलने के बाद दीपक को ऐसा लग रहा था कि इस स्कूल में भी उसे नौकरी नहीं मिलेगी। उसकी योग्यता संगीत शिक्षक के इस पद के लिए उपयुक्त थी और उसने सभी सवालों का जवाब भी बिल्कुल सही दिया था। लेकिन इससे पहले वो कई स्कूल में नौकरी के लिए आवेदन दे चुका था। हर जगह से उसे निराशा ही हासिल हुई थी।
फिल्म इंडस्ट्री और राजनीति की तरह शिक्षा विभाग में भी नेपोटिज्म का बोलबाला हो रहा है इस बात का दीपक को अहसास हो गया था। ज्यादा तर स्कूल के प्रिंसिपल और मैनेजमेंट अपनी जान-पहचान वालों को ही नौकरी पर रखना चाहते हैं जिनमें भले उस विषय को पढ़ाने की कुछ योग्यता भी ना हो। उसे ऐसा ही लग रहा था कि इस स्कूल के वरिष्ठ कार्यकर्ता भी बाकी उन जैसे ही हैं जो अपने जान पहचान वालों को ही नौकरी पर रखेंगे।
घर आकर दीपक ने अपना बैग एक तरफ रखा और अपनी बीमार मां के पास आकर बैठ गया और उनके पैर दबाने लगा। एक के बाद एक कई जगह से मिली निराशा उसके मन मस्तिष्क पर हावी हो गई थी।
“अरे! बेटा तू थक गया होगा। जा खाना खाकर थोड़ा आराम कर ले। अच्छा ये तो बता आज का इंटरव्यू कैसा रहा?”
“ठीक ही रहा मां “
“तुझे नौकरी मिल ही जाएगी। तू उदास क्यों होता है?”
“मां हर बार की तरह इस बार भी परिणाम अभी नहीं बताया है।”
“अरे! परिणाम बनाने में समय तो लगेगा ही। “
“हां मां वो तो मैं भी समझता हूं पर जानता हूं अब उनके पास कुछ जान-पहचान वालों के फोन आएंगे जिन्होंने मेरा साक्षात्कार लिया है और जिनके हाथ में परिणाम होगा उनके पास इस पद के लिए। फिर उनका इंटरव्यू क्वालिफिकेशन बिना कुछ देख उन्हें नियुक्त कर दिया जाएगा। उन्हें बच्चों के भविष्य से कोई मतलब नहीं है बस खुद का वर्तमान और भविष्य सुधारना ही मुख्य मकसद है।”
दीपक की आवाज में इस अन्याय के लिए आक्रोश था। वह अपनी ही धुन में बोलता रहा।
” मां हर जगह यही हो रहा है। सरकारी नौकरी के लिए तो एस. सी, एस. टी और ओबीसी कोटा के कारण जेनरल वालों का नंबर ही नहीं आता। वो चालीस प्रतिशत अंक लाकर भी नौकरी पा जाते हैं और हम नब्बे प्रतिशत वाले भी नौकरी से वंचित रह जाते हैं। देश में बेरोज़गारी बढ़ती ही जा रही है। हम लोगों के लिए कहीं कोई नौकरी नहीं है। मुझे तो लगता है इतनी पढ़ाई करना बेकार ही है। या तो तो कोटा हो या कोई अपना संबंधी अपना रिश्तेदार हो जिसके हाथ में हो नौकरी पर लगाना।‌”
” बेटा ऐसा मत सोच। कुछ लोग दुनिया में अभी भी अच्छे हैं जो योग्य व्यक्तियों की तलाश में रहते हैं। तुझ में योग्यता है और वह बेकार नहीं जाएगी। मुझे विश्वास है कि तुझे यह नौकरी जरूर मिलेगी।”
“मां काश! ऐसा हो जाए। लोगों को नौकरी योग्यता के आधार पर ही मिलने लगे। भाई भतीजावाद और आरक्षण पूर्ण रूप से खत्म हो जाए।”
राजेंद्र सभी अभ्यर्थियों के बायोडाटा को काफी देर तक खंगालता रहा। उसे दीपक का बायोडाटा, उसकी आवाज और उसके सुरों का ज्ञान बहुत ही अच्छा लगा था। दीपक से ना तो उसकी कोई रिश्तेदारी थी और ना ही किसी जान पहचान वाले ने उसे भेजा था। वह तो अखबार में आर. के. स्कूल में संगीत शिक्षक की आवश्यकता है के विज्ञापन को देखकर ही साक्षात्कार के लिए आया था।
वह अपने ऑफिस में बैठा अपना अंतिम निर्णय दे ही रहा था कि तभी उसकी भाभी के भतीजे रिंकू का फोन आया।
“प्रणाम फुफा जी “
“हां रिंकू कैसे फोन किया? मैं अभी जरूरी काम कर रहा हूं। बाद में बात करता हूं।”
“फुफा जी मैंने भी आपसे जरूरी बात करने के लिए ही फोन किया है। बस एक मिनट मेरी बात सुन लीजिए।”
“अच्छा! बताओ क्या बात है?”
“कल पेपर में आपके स्कूल में संगीत शिक्षक की नियुक्ति का विज्ञापन देखा। बस उसी सिलसिले में आपसे बात करनी थी।”
“उसका साक्षात्कार तो हो गया। तुमने समय नहीं देखा क्या?सुबह नौ बजे से बाहर बजे तक ही था।”
“मुझे साक्षात्कार की क्या जरूरत है?”
“क्यों तुम्हें क्यों नहीं जरूरत और वैसे भी तुमने तो बी ए पास कोर्स किया है। तुमने तो स्कूल में कभी संगीत सीखा ही नहीं और संगीत से तो तुम्हारा दूर-दूर तक का भी नाता नहीं है । अभी स्कूल में संगीत शिक्षक की जरूरत है।”

“तो क्या हुआ आप मेरी बुआ के देवर हैं और यह आपका स्कूल है। आपके ही हाथ में तो है कि आप अपने लोगों को ही नौकरी पर रखें। वैसे भी मैं तो आपके अपने भतीजे जैसा ही हूं ना। संगीत का क्या है वो भी सिखा देंगे हम। उसके लिए कौन सी डिग्री की जरूरत है। अच्छा तो बताइए ना फूफा जी कब से आना है मुझे आपके स्कूल में?”
“रिंकू इंटरव्यू हो चुका है और रिज्लट भी तैयार है।”
“तो क्या हुआ फुफा जी जिसको चुना है उसकी जगह मुझे रख लीजिए।”
राजेंद्र ने फोन काट दिया और आज के इस इन्टरव्यू के लास्ट कैंडिडेट दीपक मिश्रा के बॉयोडाटा में लिखे कॉन्टैक्ट नंबर पर फोन लगा दिया।
“हैलो मिस्टर दीपक आप कल से ही आर. के. पब्लिक स्कूल में संगीत शिक्षक का कार्य भार संभाल रहे हैं।”
दीपक को विश्वास नहीं हो रहा था। राजेंद्र ने दुबारा यही बात बताई और स्कूल आने का समय बताया।
फोन रखने के बाद दीपक की आंखें खुशी से झलक उठी और उसने अपनी मां के पैर छूकर यह खुशखबरी जैसे ही दी उन्होंने उसे गले से लगा लिया।
” मैंने कहा था ना आज भी कुछ लोग काबिलियत को तवज्जो देते हैं।”