Ishwar ka chamatkar
Ishwar ka chamatkar

Hindi Social Story: ” साहब आपकी कॉफी टेबल पर रखी है और दोपहर का भोजन बनाकर रसोईघर में रख दिया है आप अपने समय पर याद से खाकर बर्तन खाने की टेबल पर रख देना हम शाम को आकर साफ कर देंगे , ठीक है और आप ध्यान से अपनी दवाएं जरूर ले लेना और रात के भोजन के लिए सब्जियां आप लेकर आ जाना। साहब अब मैं चलती हूं ” अपने कमरे में खिड़की से बाहर झांकते हुए अंशुल को यह सब कहकर शिवानी दीदी घर से बाहर चली जाती हैं। अंशुल अभी अपने विचारों की दुनिया में ही घूम रहा था। कुछ ढूंढने की कोशिश कर रहा था शायद कुछ खास था उसका या फिर कुछ नया जो उसके जीवन में कुछ नया परिवर्तन लाने वाला था मगर वह था क्या ? अचानक खिड़की के पास रखी हुई एक पत्रिका नीचे गिर जाती है उसके गिरने की आवाज को सुनकर अंशुल अपने विचारों की दुनिया से वास्तविक जीवन में आकर उस पत्रिका को एक नज़र में देखकर उसे टेबल पर रख देता है और खिड़की की तरफ देखने लगता है। फिर उसका मन अचानक उस पत्रिका को देखने के लिए उससे कहता है वह पत्रिका में देखता है उसमें लिखा होता है ” कुछ युवाओं ने मिलकर शुरू किया अनोखा क्लब ” भजन क्लबिंग ” यह पढ़कर अंशुल स्वयं से कहता है – ” काश ! मेरे जीवन में भी कोई ” ईश्वर का चमत्कार ” हो जाता मेरे संगीत को उनका आशीर्वाद मिल जाता “। और फिर अपने आधुनिक और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की ओर देखकर निराश होने लगता है। भोजन करने के बाद वह रात के भोजन के लिए सब्जियां लेने बाज़ार चला जाता है। 

घर से बाज़ार कुछ ही दूरी पर था इसलिए उसने पैदल ही जाने का निर्णय लिया कुछ ही कदम चलने के बाद उसने कुछ लोगों को देखा जो अपने साथ संगीत से जुड़े हुए कुछ वाद्य यंत्रों को लेकर चल रहे थे कुछ पल उन्हें देखने के बाद वह आगे चलने लगता है। बाज़ार में बहुत भीड़ थी एक नए प्रकार का शोर था जो उसने पहले कभी नहीं सुना था कुछ नया और आकर्षक वह सोचता है शायद यह उसके संगीत से जुड़े रहने के कारण उसके मन का भ्रम है। वह सब्जियां लेकर घर की ओर चलने लगता है। रास्ते में कुछ बच्चे स्कूल से आते हुए मस्ती कर रहे थे और अपने उत्साह और बचपन के आनंद में खोए हुए थे। वह सोचता है शायद बचपन सभी का एक जैसा ही होता है हर चीज़ में उत्साह और उमंग। वह घर पहुंच जाता है और देखता है कि उसकी खिड़की अभी भी खुली हुई है वह सब्जियां टेबल पर रख देता है और खिड़की बंद करने की ओर बढ़ने लगता है तभी उसके फोन की घंटी बजती है और उसे अवगत कराया जाता है कि उसके द्वारा निर्मित संगीत की धुनों को निर्माताओं की टीम ने अस्वीकार कर दिया है। इस जानकारी से अवगत होने के बाद वह थोड़ा निराश होता है और सोचता है कि अब सिर्फ ” ईश्वर का चमत्कार ” ही उसको राह दिखा सकता है पत्रिका पर लिखे ” भजन क्लबिंग ” शब्द को पढ़कर और डूबते हुए सूरज को देखते हुए अंशुल खिड़की बंद करने लगता है। 

खिड़की को बंद करते हुए एक प्यारी-सी आवाज अंशुल को सुनाई देती है। यह आवाज़ अंशुल को कुछ परिचित – सी लग रही थी। अंशुल आस – पास देखने लगता है मगर उसे कुछ दिखाई नहीं देता। मगर एक बार फिर वह आवाज पूरे वातावरण में अपनी मौजूदगी का संकेत देती है। अंशुल देखता है कि उसकी बालकनी के ऊपर एक कोयल बैठी है जो यह मधुर आवाज से अपनी उपस्थिति को बता रही है। अंशुल उसे देखकर खिड़की बंद कर देता है और अपने संगीत के वाद्य यंत्रों को देखने लगता है। तभी दरवाजे पर दस्तक होती है अंशुल दरवाजा खोलता है और सामने शिवानी दीदी होती हैं। वह कहती हैं – ” जी साहब आप सब्जियां लेकर आ गए मैं रात का भोजन बना देती हूं “। अंशुल कहता है – ” शिवानी दीदी आज रात का भोजन नहीं बनाएं मुझे भूख नहीं लग रही है “। शिवानी दीदी कुछ गंभीरता से पूछती हैं – ” साहब क्या हुआ कुछ परेशानी है , आपको सही लगता है आप बता सकते हैं ” ? अंशुल कहता है – ” अब ” ईश्वर का चमत्कार ” ही कुछ कर सकता है लोगों को पता नहीं क्या हुआ है ” भजन क्लबिंग ” किसी को संगीत की समझ ही नहीं हैं “। 

इतना कहकर अंशुल कुर्सी पर बैठ जाता है और अपनी आंखों को बंद कर लेता है। शिवानी दीदी कहती हैं – ” साहब अगर सही लगे तो मैं कुछ कहना चाहती हूं “। अंशुल इशारा करते हुए कहता है -” जी बताएं, क्या कहना चाहती हैं आप “। शिवानी दीदी कहती हैं – ” जी , कल मेरे भाई का जन्मदिवस है इसलिए अपने घर में भजन संध्या आयोजित की है वो कहते हैं नया शब्द ” भजन क्लबिंग ” अगर आपको सही लगे तो ज़रूर आना “। अंशुल कहता है – ” जी ” भजन क्लबिंग ” ठीक है मैं कल शाम को आता हूं। “। शिवानी दीदी घर जा चुकी थीं और अंशुल अपनी गहरी नींद में “। अगली सुबह चाय और नाश्ता करने के बाद अपनी नई धुनों पर अंशुल काम करने लगता है आज शिवानी दीदी की छुट्टी थी इसलिए सिर्फ कॉफी पीकर ही अंशुल अपना पूरा ध्यान अपने संगीत पर लगाए हुए था। सुबह से संगीत और धुनों की आवाज़ों ने दोपहर के सूरज को अपनी अंतिम ऊंचाई पर पहुंचाकर उसको शाम की ठंडी हवाओं से परिचित कराकर अलविदा कहना शुरू कर दिया था। अचानक अंशुल को याद आता है आज उसे शिवानी दीदी के घर जाना है उनके भाई के जन्मदिवस पर आयोजित भजन संध्या के कार्यक्रम में। वह तैयार होकर अपने वाद्य यंत्रों के साथ शिवानी दीदी के घर की ओर निकल पड़ता है। उसके अंदर कोई उत्सुकता नहीं थी सिर्फ औपचारिकता और उसका संगीत के साथ खास रिश्ता और ” ईश्वर का चमत्कार ” अदृश्य अवस्था में। रास्ते में उसे कुछ कॉफी शॉप मिलते हैं और कुछ बागीचे जहां लोग ईश्वर के भजनों को नई धुनों और आधुनिक एवं पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ आनंदित हो रहे थे। 

शिवानी दीदी के घर पहुंचकर अंशुल अपने संगीत के वाद्य यंत्रों के साथ एक स्थान पर बैठ जाता है। शिवानी दीदी उसका स्वागत करती हैं और कहती हैं – ” साहब अभी कुछ समय में भजन संध्या मतलब ” भजन क्लबिंग ” शुरू होने जा रहा है “। अंशुल देखता है ईश्वर से आशीर्वाद लेकर सभी लोग अपने स्थान पर बैठ चुके हैं और भजन संध्या शुरू हो जाती है। ईश्वर के भजनों को सभी अलग तरीके से सुनकर मस्ती में झूम रहे थे। सभी को खुश होते देखकर अंशुल ने अपने सभी वाद्य यंत्रों और धुनों के साथ भजन संध्या को और भी अच्छा बना दिया। पूरा वातावरण झूम उठा और हर तरफ सिर्फ संगीत ही नज़र आने लगा था। भजन संध्या के पूर्ण होने के बाद सभी ने अंशुल की बहुत तारीफ़ की और उसको एक स्मृति चिन्ह भी दिया। कुछ समय के बाद अंशुल अपने घर की और लौटने लगता है। मगर रास्ते में वह कुछ नया महसूस कर रहा था। रास्ता वही था बस कुछ नया अंशुल अनुभव कर रहा था। शायद ” ईश्वर का चमत्कार ” हो चुका था और एक नाविक को समंदर में दिशा मिल चुकी थी। अंशुल घर पहुंचकर अपनी सभी धुनों को अपने सभी आधुनिक और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ अभ्यास करने लगता है ” भजन क्लबिंग ” को ध्यान में रखते हुए वह कुछ नई निर्मित संगीत की धुनों को निर्माताओं की टीम को भेज देता है। मगर अब अंशुल इंतजार नहीं करता बल्कि ” भजन क्लबिंग ” में शामिल होने लगता है और कुछ नया लिखकर अपने संगीत के साथ सभी को सुनाने भी लगता है। सभी उसकी तारीफ करने लगते हैं। 

कुछ दिनों में अंशुल के पास ” भजन क्लबिंग ” की तरफ से आमंत्रण आने लगते हैं और धीरे – धीरे अन्य व्यक्ति भी अंशुल के साथ जुड़ने लगते हैं और फिर यह सब मिलकर अपना एक स्टूडियो भी बना लेते हैं। अंशुल को बहुत अच्छा लगता है वह सभी जगह अपनी पहचान बनाने लगता है। फिर एक दिन उसके फोन की घंटी बजती है और उसे यह ख़बर मिलती है कि उसके द्वार निर्मित संगीत की धुनों को निर्माताओं की टीम ने स्वीकार कर लिया है। अंशुल यह ख़बर शिवानी दीदी को सुनाता है। शिवानी दीदी यह ख़बर सुनकर कहती हैं – ” साहब आज आपके लिए गाजर का हलवा बनाया जाएगा , शाम को मैं स्वयं गाजर लेकर आऊंगी “। अंशुल कहता है – ” भईया , शिवानी दीदी अब साहब नहीं आप मुझे भईया कहकर बुलाएं अगर आप नहीं होते तो शायद मैं आज यहां नहीं होता यह सब आपके आमंत्रण के कारण है ” भजन क्लबिंग ” आज एक स्टूडियो का रूप ले चुका है और यही ” ईश्वर का चमत्कार ” है ईश्वर भी यही चाहते हैं कि उनके भजनों को नए तरीके से कॉफी शॉप और बगीचों में भी सुना जाए।