Hindi Kahani: टेबल पर रखे हुए चाय के बर्तन से निकलती हुई भाप और आस – पास गर्म कपड़े पहनकर ठिठुरते हुए लोग। अलाव के पास एकत्रित होकर अपने शरीर को गर्म करते हुए राजनीति और दुनियादारी पर चर्चाओं के शोर के बीच भागते हुए कुली और इन सभी के बीच में यात्रीगण कृपया ध्यान दें आपकी रेलगाड़ी क्रमांक … प्लेटफार्म पर आ चुकी है। यह सब यहां कुछ नया नहीं था। यह रेलवे स्टेशन पर दैनिक दिनचर्या का हिस्सा था। इसी रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर एक पर बनवारी काका की दुकान थी जो यहां आने और जाने वाले यात्रियों की छोटी जरूरतों को पूरा करती थी और यह दुकान अक्सर हंसी मज़ाक के साथ गंभीर मुद्दों और जीवन से जुड़ी हुई बातों का केंद्र थी। अखबारों और रेडियो के साथ चर्चाओं को आगे बढ़ाने के लिए मिट्टी के बर्तन में चाय और बिस्किट सहयोगी के रूप में हमेशा तैयार रहते थे। ” जीवन में मिले ठोकर ” और उनको “अनुभवों की संपदा ” में रूपांतरित करके शिक्षाओं के रूप में परिवर्तित करके सकारात्मक बनाने की कला सिर्फ बनवारी काका की दुकान पर ही मिलती थी। आयुष प्लेटफार्म पर रखी हुई टेबल पर बैठकर अपने जीवन के बारे में सोचकर बहुत चिंतित था।
बनवारी काका अपनी दुकान में काम करने वाले छोटू को आयुष की तरफ इशारा करके चाय और बिस्किट देने के लिए कहते हैं। छोटू चाय को टेबल पर रखते हुए आयुष से कहता है – ” साहब आपकी चाय , और रुपए दुकान पर काका को देने हैं “। आयुष अपनी चिंता में ही खोया हुआ था उसे कुछ भी याद नहीं था। आयुष ने चाय पीकर बिस्किट खाना शुरू किया। कुछ समय बाद घड़ी की तरफ देखकर चाय का हिसाब देने बनवारी काका से पूछता है – ” चाय और बिस्किट के कितने रुपए हुए हैं ” ? बनवारी काका जवाब देते हुए कहते हैं – ” चाय और बिस्किट के कुल दस रुपए हुए हैं “। आयुष दस रुपए देकर वापिस टेबल पर बैठ जाता है। ” जीवन में मिले ठोकर ” हमें बहुत अच्छी शिक्षा देते हैं। यह ठोकर ही आपके ” अनुभवों की संपदा ” होती हैं। इन शब्दों को सुनकर आयुष बनवारी काका की तरफ देखता है। बनवारी काका पान बनाते हुए यह सब बोल रहे थे। आयुष कहता है – ” यह जीवन सिर्फ ठोकर खाते रहने के लिए है ठोकर खाओ और संपदा पाओ “। बनवारी काका मुस्कुराने लगते हैं।
आयुष कुछ पलों के बाद फिर से परेशानियों के बारे में सोचने लगता है। बनवारी काका आयुष के सिर पर हाथ रखते हुए उसे चाय देते हुए कहते हैं -” चाय की चुस्कियां लीजिए और जीवन की सभी परेशानियों को अब अलविदा कीजिए “। आयुष चाय की कुछ चुस्कियों को लेने के बाद कहता है – ” बनवारी काका जीवन सिर्फ एक समय लग रहा है जो अपनी गति से आगे बढ़ रहा है। मेरे जीवन से परेशानियों को बहुत प्रेम है हमेशा साथ रहती हैं। बनवारी काका कहते हैं – ” और बताओ अपने जीवन के बारे में “। आयुष कहता है – ” काका विद्यालय और कॉलेज के समय में कुछ लोगों से मेरी मित्रता हुई। मैं सभी की सहायता करता था। मगर सभी सिर्फ अपना काम मुझसे निकलवाते थे बहुत बुरा लगता था। फिर पढ़ाई समाप्त करने के बाद नौकरी की तलाश शुरू की लेकिन सफलता नहीं मिली। कुछ लोगों से पहचान हुई उन्होंने साथ में एक नया व्यापार शुरू करने के लिए प्रस्ताव रखा। मुझे व्यापार अच्छा लगा बहुत मेहनत की लेकिन जब फायदा हुआ सभी ने अपना फायदा लेकर मुझे व्यापार से बाहर निकाल दिया। फिर कुछ ही समय के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति कमज़ोर होना शुरू हो गई “। आयुष को सुनकर बनवारी काका कहते हैं – ” आपको ” जीवन में मिले ठोकर ” से सीखना चाहिए। यह ठोकर ही आपके जीवन की ” अनुभवों की संपदा ” होती हैं। भरोसा और मेहनत बहुत समझदारी के साथ करनी होती है। परेशानियों के स्थान पर नवाचार के बारे में विचार कीजिए। इतना कहकर बनवारी काका वापिस चले जाते हैं।
आयुष कुछ समय टेबल पर बैठे हुए रेलगाड़ी को आते और जाते हुए देखते रहता है फिर अपना बैग लेकर प्लेटफार्म से बाहर निकलने लगता है। आयुष रास्ते में बनवारी काका की बातों के बारे में विचार करता है। वह कहता है – ” इस ” जीवन में मिले ठोकर ” शिक्षक होते हैं “। यह आपके ” अनुभवों की संपदा ” होते हैं। कुछ ही पलों के बाद उसे रास्ते में ठोकर लगती है और वह गिर जाता है। उसे स्वयं के गिरने के साथ अपने बिखरते हुए सपनों की आवाज सुनाई देती है। उसे एहसास होता है कि संघर्ष की परिभाषा है जिसमें हिम्मत है गिरकर उठने की उसे ही ठोकर लगती है। फिर व्यक्ति को उसके आत्मबल की पहचान होती है “। धरातल पर गिरे हुए मन और टूटी हुई उम्मीदों को जोड़कर भीड़ से अलग होकर अपनी पहचान बनाना ही पुरुषार्थ है। शायद बनवारी काका यही बताना चाहते हैं। वह स्वयं को शारीरिक और मानसिक रूप से उठाता है और बनवारी काका की दुकान को देखकर मुस्कुराते हुए आगे बढ़ने लगता है।
आयुष घर पहुंचकर अपने कमरे में चुपचाप खिड़की के पास रखी हुई कुर्सी पर बैठकर अपनी मेज़ पर रखी हुई डायरी में अपने परिवार की स्थिति के बारे में लिखता है फिर इस स्थिति को बेहतर बनाने के लिए योजना भी बनाता है वह अपने जीवन की सभी परेशानियों को लिखता है और फिर उनसे बाहर निकलने की योजना बनाता है। इन सभी चीजों को लिखने के बाद आयुष शीशे के समाने खड़े होकर मुस्कराने लगता है। आयुष सफलताएं प्राप्त करने लगता है। आयुष फिर एक दिन उस रेलवे स्टेशन पर पहुंचकर प्लेटफार्म नंबर एक पर बनवारी काका की दुकान के पास रखी हुई टेबल पर बैठ जाता है। बनवारी काका पूछते हैं – क्या चाहिए चाय या कुछ और ? आयुष जवाब देते हुए कहता है – ” जीवन में मिले ठोकर ” और उन्हें “अनुभवों की संपदा ” बनाने के लिए आपका शुक्रिया काका “। फिर बनवारी काका आयुष को अपने गले से लगा लेते हैं।
