guru dakshina
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Heart Touching Story: अपने अध्ययन की समाप्ति पर स्वामी दयानन्द ने अपने गुरु स्वामी विरजानन्द के श्री चरणों में नतमस्तक होकर निवेदन किया कि गुरु जी, आपने मुझे जो वैदिक ज्ञान का दान दिया है उससे मैं धन्य हो गयौ मेरे पास और कुछ तो है नहीं। कुछ लौंग मुझे भिक्षा में प्राप्त हुई हैं, इन्हीं को मैं गुरु दक्षिणा के रूप में आपको भेंट करना चाहता हूँ। कृपया स्वीकार करें।

अन्धे गुरु विरजानन्द ने दयानन्द से कहा-‘वत्स, मैं गुरु दक्षिणा में तुझसे वही वस्तु लूंगा, जो तुम्हारे पास है। दयानन्द ने कहा-‘भगवन्, मैं तो अकिंचन हूं। मेरे पास कुछ नहीं है। गुरु ने शिष्य से कहा-दयानन्द तुम अकिंचन नहीं हो। तुम्हारे पास अतुल धन राशि है। मेरी गुरु दक्षिणा यही है कि तुम संपूर्ण देश में वेदों की अलख जगा कर समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करो और देश का उद्धार करो। स्वामी दयानन्द ने गुरुचरणों में सिर नवा कर उनका आदेश शिरोधार्य किया। इतिहास साक्षी है कि ऋषि दयानन्द ने अपने वैदिक ज्ञान के आधार पर देश में जागृति की लहर दौड़ा कर मृत हिन्दू जाति में नवीन प्राण का संचार किया और देश सेवा में स्वयं अपना बलिदान कर दिया।

ये कहानी ‘दिल को छू लेने वाली कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंDil Ko Chhoo Lene Wali Kahaniyan (दिल को छू लेने वाली कहानियाँ)