दयानंद वही नाम है जिसने अपनी मृत्यु के जिम्मेदार यानी ‘रसोईये जगन्नाथ’ को सब जानते हुए भी क्षमा किया बल्कि उसे प्रलोभन देने वाले षड्ंयत्रकारियों से उसके प्राणों को बचाने के लिए पांच सौ रुपए देकर उसे नेपाल भी भेजा। दया और क्षमा का यह उदाहरण अपने आपमें जितना अद्भुत है उतना ही वंदनीय भी है।

बहरहाल, बात सदियों पहले की है गुजरात में एक जिला था ‘काठियावाड़’ जिसमें एक गांव था ‘टंकारा’, जिसमें कृष्ण लालजी तिवारी का परिवार रहता था जो जाति से शैव मत का कट्टर अनुयायी था। सन् 1824 में तिवारी जी की पत्नी ने गुरुवार के दिन एक अबोध बालक को जन्म दिया। जिसका नाम ‘मूलशंकर’ रखा गया। धीरे-धीरे समय बीतता गया। मूलशंकर बड़ा होता गया। मूलशंकर कभी स्कूल नहीं गया। उसकी पढ़ाई उसके पिताजी की देख-रेख में ही होती थी वह मूलशंकर को समय-समय पर धर्मशास्त्रों की शिक्षा देने के साथ-साथ संस्कृत भाषा का ज्ञान भी देते थे।

महत्त्वपूर्ण घटनाएं

हर संन्यासी के जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं घटती हैं जिनसे गुजरकर न केवल उसका चित्त जिज्ञासाओं से भर जाता है बल्कि मन में वैराग्य को भी जगा जाता है। फिर उसे घर-परिवार का, समाज-देश का कोई बंधन कोई मोह नहीं रोक पाता। ऐसा ही कुछ घट रहा था बाल अवस्था के मूल शंकर के जीवन में।

सच्चे शिव की प्यास

उनका परिवार शैव मत का अनुयायी होने के कारण, शिव का उपासक था। एक बार की बात है, महाशिवरात्रि के महापर्व पर सर्वत्र प्रसन्नता का वातावरण था। पिता ने अपने पुत्र मूलशंकर को शिवरात्रि व्रत का महत्त्व बताते हुए कहा था कि बाबा भोलेनाथ शिव प्रसन्न होकर अपने भक्तों को मनोवांछित फल देते हैं। यह सुनकर बालक मूलशंकर ने दिन में उपवास किया, तथा रात्रि में अपने पिता के साथ शिव मन्दिर में श्रद्धापूर्वक शिव पूजा तथा अर्चना की।

पूजा हो चुकी थी, सभी भक्तजन आराम की स्थिति में थे। चारों तरफ शांति का वातावरण था। तभी एक चूहा कहीं से निकल कर वहां आ गया। जो शिवलिंग पर चढ़ाए गए प्रसाद को खा रहा था। इस दृश्य को बालक मूलशंकर ने अपनी आंखों से देखा था, तभी उसके मन में एक प्रश्न पैदा हो गया, कि समस्त संसार की रक्षा करने वाला यह शिव है। मेरे पिता ने तो मुझे यह बताया था परन्तु यह शिव तो स्वयं अपनी रक्षा इस साधारण से चूहे से भी नहीं कर पा रहे हैं। यह शिव नहीं हो सकते। यह कथा पिता को सुनाई तो पिता ने भी पुत्र की शंका का निवारण ये कहकर कर दिया कि यह तो शिव की प्रतिमा है। वह शिव तो कैलाश पर निवास करते हैं बस फिर क्या था तभी से मूलशंकर के मन में कैलाशवासी शिव के दर्शन करने की इच्छा बलवती हो गई।

वैराग्य की उत्पत्ति

जहां एक ओर मूलशंकर के जीवन में सच्चे शिव को पाने की गहन उत्कंठा थी वहीं सोलह वर्ष की आयु में उसकी छोटी बहन ने हैजे के कारण दम तोड़ दिया था जिसे देखकर उसके मन में वैराग्य का भाव उत्पन्न हुआ। भाव उत्पन्न ही हुआ था कि कुछ वर्षों बाद उसके धर्मात्मा एवं विद्वान चाचा भी चल बसे। इन दो मृत्युओं से मूलशंकर के जीवन में वैराग्य का भाव भीतर तक बैठ गया।

विवाह का दबाव

बात सच्चे शिव की तलाश और वैराग्य भाव पर ही खत्म होने वाली कहां थी। घर वाले मूलशंकर के विवाह के पीछे हाथ धोकर पड़ गए थे। मूलशंकर ने विवाह से बचने के कई बहाने बनाए। यह भी कहा कि वह काशी जाकर विद्या ग्रहण करना चाहता है परंतु पिताजी ने कहा कि पढ़ाई विवाह के बाद भी हो सकती है। मूलशंकर समझ गया था कि अब उसकी एक नहीं चलने वाली इसलिए उसने गृहत्याग की योजना बनाई। रात्रि में ही शौच के बहाने से वह घर से निकल गया फिर कभी उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

यात्रा और ठगी

मूलशंकर ने बचपन से ही सुन रखा था कि योगी-महात्मा आदि वनों में रहते हैं इसलिए उसने वनों में जाने का निर्णय किया और यात्रा के लिए निकल पड़े। अपनी प्रारंभिक यात्रा में ही मूलशंकर को झूठे एवं ठगी साधुओं का सामना करना पड़ा। जिन्होंने मूलशंकर को लूट लिया। क्योंकि मूलशंकर समृद्ध-संपन्न परिवार से था तो उन साधुओं ने कहा बिना त्याग के कैसा संन्यास? संन्यासी को पहले सब कुछ छोड़ना पड़ता है, तुम पक्के वैरागी तभी बन पाओगे जब अपना सभी कुछ दान कर दोगे। यह कहकर उन्होंने उसके सभी आभूषण इत्यादि उतरवा लिए।

प्रारंभिक यात्रा के इसी दौर में मूलशंकर की मुलाकात एक ब्रह्मचारी से हुई जिसने उसे नैष्ठिक ब्रह्मचारी बनने का सुझाव दिया तथा ब्रह्मïचर्य की दीक्षा भी दी। साथ ही मूलशंकर से उसका नाम ‘शुद्ध चैतन्य’ रख दिया तथा काषाय (गेरुए) वस्त्र भी धारण करने को दिए।

नामकरण

मूलशंकर की यात्रा यहां खत्म होने वाली न थी प्रकृति ने उसके लिए कुछ और ही सोच रखा था। उसे शुद्ध चैतन्य नहीं दयानंद सरस्वती होना था। ग्रह त्याग के बाद यात्रा का सिलसिला जारी रहा जिसमें मूलशंकर को साधु-संतों एवं ब्रह्मïचारियों आदि का सान्निध्य प्राप्त हुआ। इसी बीच मूलशंकर की मुलाकात ‘पूर्णानंद सरस्वती’ से हुई जिन्होंने उसे वास्तविक संन्यास की दीक्षा दी तथा संन्यास का नया नाम ‘स्वामी दयानंद सरस्वती’ दिया। इस संन्यास दीक्षा के बाद से मूलशंकर नामक बालक दयानंद सरस्वती के नाम से जाना जाने लगा।

ज्ञान प्राप्ति

अपनी इसी यात्रा के दौरान दयानंद सरस्वती को नर्मदा तट पर भ्रमण के समय ‘स्वामी दंडी विरजानंद जी’ की योग्यता तथा उनके अपूर्व शास्त्रज्ञान का पता चला। ज्ञान प्राप्ति के लिए दयानंद, दंडी विरजानन्द जी के पास मथुरा पहुंचे। कुटिया के द्वार बन्द थे, इन्होंने खटखटाया तो अन्दर से आवाज आई, कौन है? उत्तर था गुरुदेव ये ही तो जानने के लिए आपके पास मैं आया हूं। इस प्रकार तर्क पूर्ण उत्तर तो किसी से आज प्रथम बार ही सुना है अब तो कुटिया के द्वार खुल गए, कहा अन्दर चले आओ। अब अपना पूर्ण परिचय दो, तुम कौन हो तथा कहां से आए हो और यहां आने का क्या प्रयोजन है।

स्वामी दयानन्द ने सभी प्रश्नों का यथोचित उत्तर दिया था। उत्तर से संतुष्ट होकर ही दंडी जी ने कहा था कि दयानन्द तुमने आज से पहले जो कुछ भी पढ़ा है, उसे भूल जाओ तुम्हारे पास ये जो भी पुस्तकें हैं, इन्हें यमुना जल में प्रवाहित कर दो, ये सभी अनार्ष ग्रन्थ हैं। मैं तुम्हें आर्य ग्रन्थों को पढ़ाऊंगा। एक पाठ को केवल एक बार ही पढ़ाऊंगा। दूसरी बार नहीं पढ़ाऊंगा तथा मेरे पास भोजन आदि की भी कोई व्यवस्था नहीं है। वह तुम्हें कहीं बाहर से स्वयं ही करनी होगी। स्वामी दयानन्द ने गुरुदेव की सभी बातों को स्वीकार किया और अपने पास संग्रहित किए गए सभी ग्रंथों को गुरु की आज्ञा से यमुना में बहा दिया। यहां दयानन्द ने पाणिनी व्याकरण, पतंजलि योगसूत्र, अष्टाध्यायी, महाभाष्य तथा वेद-वेदांग का अध्ययन किया।

गुरुजी की कुटिया में झाडू लगाने का काम भी स्वयं विद्यार्थी ही करते थे। एक बार स्वामी दयानंद का नंबर भी आ ही गया। झाडू लगाकर कूड़ा इकट्ठा करके दयानन्द उसे उठाकर बाहर फेंकने के लिए, कुछ साधन लेने चले गए  तभी अचानक ही उधर से गुरुदेव आ पहुंचे इनका पैर उस कूड़े पर पड़ गया। गुरुजी ने पूछा आज झाडू किसने लगाई है, वो इधर मेरे पास चले आओ।

दयानन्द ने कहा गुरुदेव झाडू लगाकर कूड़ा मैंने ही इकट्ठा किया है तभी गुरुजी ने क्रोधावेश में आकर एक लाठी दयानन्द को मारी बाद में गुरुजी के हाथों को सहलाते हुए दयानन्द ने कहा कि गुरुदेव आपके हाथों में दर्द हो रहा होगा, ये मेरा शरीर तो वज्र के समान कठोर हो गया है। लाठी लगे निशान को दिखाकर दयानन्द कहा करते थे, कि ये मेरे गुरुजी का दिया हुआ प्रसाद है।

गुरु से विदाई का दिन

बहरहाल अध्ययन काल समाप्त हुआ और विदाई का दिन आया। दयानंद ने विदाई की बेला में गुरु स्वामी दंडी विरजानंद को दक्षिणा के रूप में लौंग भेंट की और कहा मुझ अंकिचन के पास अन्य कुछ नहीं है जो आपको भेंट करूं। इस पर दंडी जी ने कहा कि वे तो उनसे वही मांगेंगे जो उनके पास है। इस पर स्वामी दयानन्द सरस्वती ने कहा कि वे यथा-सामर्थ्य वह वस्तु उन्हें अवश्य देंगे। स्वामी दंडी विरजानन्द ने कहा, पुत्र तुमने जो अध्ययन किया है उसकी सफलता तभी है जब तुम पूरे देश का सुधार करो। वेद की विद्या लुप्त हो गई है, इसका पुन: प्रचार करो। सत् शास्त्रों की शिक्षाओं को फैलाओ। मत-मतान्तरों को समाप्त कर वास्तविक वेद धर्म का प्रचार करो। यही तुम्हारी गुरुदक्षिणा है। उन्होंने आशीर्वाद दिया कि ईश्वर तुम्हारे पुरुषार्थ को सफल करे। उन्होंने अंतिम शिक्षा दी ‘मनुष्यकृत ग्रंथों में ईश्वर और ऋषियों की निंदा है, ऋषिकृत ग्रंथों में नहीं।’ वेद प्रमाण हैं। इस कसौटी को हाथ से न छोड़ना।

ज्ञान प्राप्ति के पश्चात्

ज्ञान प्राप्ति के बाद दयानंद ने अनेक स्थानों की यात्रा की हरिद्वार में कुंभ के अवसर पर पाखंड-खण्डिनी की पताका फहराई। वह आगरा भी गए जहां उनका निवास लगभग दो वर्ष का रहा। आगरा में ही उन्होंने संध्या विधि की एक पुस्तक लिखी। यहां से वे धौलपुर, ग्वालियर, करौली, जयपुर, अजमेर, पुष्कर में उन्होंने मत-मतान्तरों का खंडन किया और वेदों का ध्वजा लहराया। जयपुर में तीन-चार शास्त्रार्थ किए जिनसे इनकी विद्वता का परिचय स्थानीय विद्वानों को मिला। पुष्कर, अजमेर में किसी विद्वान की हिम्मत उनसे शास्त्रार्थ करने की नहीं हुई।

स्वामी दयानन्द सरस्वती हरिद्धार कुंभ मेले में पहुंचे। कुंभ मेले के अवसर पर हजारों साधु-संत तथा अनेक संप्रदायों के आचार्य, मठाधीश तथा महन्त आए थे। हरिद्वार के इस धर्म मेले में स्वामी दयानन्द सरस्वती निर्भय होकर मत-मतान्तरों का खंडन करते और उपनिषदों के प्रमाण देकर एकेश्वर उपासना का प्रचार करते थे। अढ़ाई वर्षों तक स्वामी दयानन्द सरस्वती गंगा के किनारे-किनारे भ्रमण कर उपदेश देते रहे। इस गांगेय तटवर्ती प्रदेश में उन्होंने लोगों को संध्योपासना तथा गायत्री का उपदेश दिया। कभी-कभी वे मनुस्मृति तथा उपनिषदों की कथा भी किया करते थे। अढ़ाई वर्षों की इस अवधि में अनेक छोटे-बड़े शास्त्रार्थ भी होते रहे। जिसमें स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सभी विद्वानों को पराजित किया। स्वामी दयानन्द सरस्वती के विचार वेदानुकूल थे। एवं उस समय गंगा के किनारे स्वामी दयानन्द सरस्वती की विद्वता की धूम मच गई थी।

स्वामी दयानन्द सरस्वती पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, बंगाल, बिहार आदि कई स्थानों पर गए और अपने व्याख्यान दिए। अनेक स्थानों का भ्रमण करने के बाद स्वामी दयानन्द सरस्वती इलाहाबाद आए और वहां अनेक व्याख्यान दिए। ‘योर कालेज’ के विद्यार्थी भी उनके पास आते और अनेक प्रकार के प्रश्नोत्तर करते थे। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने उन्हें वैदिक धर्म की विशेषताओं की जानकारी दी। ये विद्यार्थी यूरोपीय विद्वानों के लिखे इतिहास तथा ऐसे ही प्रोफेसरों द्वारा दी गई शिक्षा के कारण अपने धर्म की उपेक्षा करने लगे थे। अब स्वामी दयानन्द सरस्वती के मुख से उसके महत्त्व का उन्हें ज्ञान हुआ तो वे प्रसन्नता से भर गए। इलाहाबाद में ही स्वामी दयानन्द सरस्वती ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ नामक अपना प्रमुख सिद्धांत ग्रंथ लिखा था।

वेदों का प्रचार-प्रसार

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने विभिन्न स्थानों का भ्रमण, शास्त्रार्थ और मौलिक युक्तियों के सहारे वेदों का प्रचार किया। लोगों को वेदों के ज्ञान के उस स्त्रोत से परिचित कराया जिससे नाना विज्ञानों की नहरें निकलती हैं। मनुष्य को उस शाश्वत ज्योति की झलक दिखा दी जिससे संसार के समस्त ज्ञान रूपी दीपक अपना प्रकाश ग्रहण करते हैं और अंधकार को दूर करते हैं। ईश्वरीय ज्ञान वेदों को उन्होंने सर्वसाधारण तक पहुंचाया।

मध्यकाल के बाद भारतीय धर्म में मिथ्या विश्वासों एवं आडम्बरों का बोलबाला था। अनेक धार्मिक संप्रदायों की स्थापना हो चुकी थी। मूर्तिपूजा, पशुबलि, सती प्रथा आदि धार्मिक कुरीतियों की, उन्होंने कटु आलोचना की और अंधविश्वास, बाल-विवाह, अशिक्षा, पर्दाप्रथा, छुआछूत एवं समुद्र यात्रा निषेध का सख्त विरोध किया तथा विधवा विवाह और स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहन दिया। सती प्रथा को पाप एवं क्रूर बताया और स्त्रियों के समान अधिकार पर बल दिया। स्त्रियों को शिक्षित करने की दिशा में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने कारगर कदम उठाया। स्त्रियों को वेद पाठ करने की अनुमति दी।

दयानंद जी का हिन्दी भाषा प्रेम

स्वामी जी की मातृभाषा गुजराती थी। इसके बावजूद भी वे संस्कृत के प्रकांड पंडित बने और एक लंबे अरसे तक अन्य भाषा-भाषियों से सरल संस्कृत में ही बात करते रहे। जैसे-जैसे उन्होंने हिन्दी प्रदेशों में भ्रमण किया, वैसे-वैसे वे हिंदी में भी बात करना सीखते गए। उन्होंने बोलचाल के लिए कामचलाऊ हिंदी सीख ली थी लेकिन वे अपने विचारों की गंभीरता को प्रकट करते समय सरल संस्कृत का ही प्रयोग करते थे।

एक बंग्लाभाषी के आग्रह करने पर दयानंद ने हिंदी में लिखना और बोलना आरंभ किया। यह बात सन् 1873 की है। उस समय दयानंद की आयु 48 वर्ष के करीब थी। उन्होंने हिंदी में अपना पहला भाषण पचासवें वर्ष के दौरान काशी में दिया। उनका दिया गया यह भाषण असाधारण था। इसका समर्थन प्राप्त करने के लिए उन्होंने अनेक धर्मग्रंथों के प्रमाण दिए थे। उन्होंने बड़ी तन्मयता और सूझ-बूझ से हिंदी भाषा की आत्मा को आत्मसात करने का प्रयत्न किया था।

उन्होंने हिन्दी को अपनाकर नौ वर्ष के अंतराल में जो काम कर दिया, वह काम बड़े से बड़ा हिंदी भाषी भी नहीं कर सका। हिंदी अपनाने के बाद उन्होंने अपने सारे व्याख्यान हिंदी में ही दिए। उन्होंने सभी ग्रंथ हिंदी में लिखे और शास्त्रार्थ तथा पत्र-व्यवहार भी हिंदी में करने लगे।

हिन्दी भाषा को फैलाने के लिए पाठशालाओं का निर्माण

स्वामी दयानंद के सभी विज्ञापन हिंदी में प्रकाशित होते थे। उनके आदेश पर आर्य समाज ने कई पाठशालाओं का निर्माण किया। इन पाठशालाओं में हिंदी की शिक्षा दी जाने लगी। साथ ही साथ आर्यसमाज ने कई हिंदी पत्र-पत्रिकाओं का भी प्रकाशन किया। दयानंद ने आर्य समाज के प्रत्येक सदस्य के लिए हिंदी का पठन-पाठन अनिवार्य कर दिया था। वे यह भली-भांति समझ गए थे कि हिंदी ही देश को एकता के सूत्र में पिरो सकती है।

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने हिन्दी भाषा और साहित्य को प्रोत्साहन दिया। हिन्दी भाषा में ग्रंथों की रचना कर उन्होंने राष्ट्र भाषा का गौरव बढ़ाया। संस्कृत भाषा के महत्त्व को पुन: स्थापित किया। उन्होंने ब्रह्मïचर्य और चरित्र निर्माण की दृष्टि से आश्रम-व्यवस्था प्रणाली के माध्यम से छात्रों को शिक्षित करने की प्रथा शुरू की। स्वदेशी-मंत्रों की दीक्षा दी और पश्चिमी विचारों और आदर्शों के अंधानुकरण के विरुद्ध आंदोलन आरंभ किया। दूसरे धर्म में गए हुए हिन्दुओं को पुन: अपने मूलधर्म में लाने का समर्थन किया। इसके लिए उन्होंने ‘शुद्धि आंदोलन’ चलाया।

क्रांति की नई लहर

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना कर भारत के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन में नई गति ला दी थी। अनाथालयों एवं विधवाश्रमों की स्थापना की गई। विवाह संबंधी नियमों को सरल बनाया गया और सामाजिक दोष दूर करने  के लिए आंदोलन किया गया। स्त्रियों की स्थिति में सुधार लाने के लिए स्वतंत्र स्कूलों और कॉलेजों की स्थापना की गई।

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपने जीवन का बहुमूल्य भाग सच्चे धर्म की खोज में व्यतीत किया। उनके जैसे महापुरुष के लिए यह समझ लेना स्वाभाविक ही था कि धार्मिक सुधार के बिना इस धर्मभूमि भारत का सुधार असंभव ही है। अत: सुधार के इस विचार को ही प्रधानता देकर उन्होंने एक ऐसी संस्था का बीजारोपण किया जिसका उद्देश्य था, देश में धर्म सुधार करना तथा सच्चे वेदाधारित धर्म का प्रचार करना। उनका विचार किसी नए संप्रदाय या मत की नींव डालना कदापि नहीं था। अपितु उनका विचार तो पुरातन शुष्क धर्मवृक्ष को हराभरा करने का ही था। स्वामी दयानन्द सरस्वती के पूर्व भारतवासी अपने को भूल चुके थे कि भारत ही कभी जगत गुरु था। परंतु भारतीय संस्कृति की महत्ता का शंख जब स्वामी दयानन्द सरस्वती ने फूंका तो भारतीय समाज में नवचेतना और आत्म-सम्मान के भाव जाग्रत हुए और भारतवासी यह अनुभव करने लगे कि उनके धर्म और संस्कृति का महत्त्व अन्य धर्मों से कम नहीं है। सभी भारतवासी फिर से जग उठे। भारतीयों में स्वाभिमान और राष्ट्र प्रेम जागरित हुआ। स्वधर्म, स्वभाषा और स्वदेश की आवाज ने कालान्तर में इस देश में स्वराज्य की आवाज बुलंद की।

हत्या का षड्यंत्र

स्वामी जी की मृत्यु जिन परिस्थितियों में हुई, उससे भी यही आभास मिलता है कि उसमें निश्चित ही अंग्रेजी सरकार का कोई षड्यंत्र था। स्वामी जी की मृत्यु 30 अक्टूबर, 1883 को दीपावली के दिन संध्या के समय हुई थी। उन दिनों वे ‘जोधपुर नरेश महाराज जसवन्त सिंह’ के निमंत्रण पर जोधपुर गए हुए थे। वहां उनके नित्य ही प्रवचन होते थे। यदा कदा महाराज जसवन्त सिंह भी उनके चरणों में बैठकर वहां उनके प्रवचन सुनते। दो-चार बार स्वामी जी भी राज महल में गए। वहां पर उन्होंने ‘नन्हीं’ नामक वेश्या का अनावश्यक हस्तक्षेप और महाराज जसवन्त सिंह पर उसका अत्यधिक प्रभाव देखा। स्वामी जी को यह बहुत बुरा लगा। उन्होंने महाराज को इस बारे में समझाया तो उन्होंने विनम्रता से उनकी बात स्वीकार कर ली और नन्हीं से संबंध तोड़ दिए। इससे नन्हीं स्वामी जी के बहुत अधिक विरुद्ध हो गई। उसने स्वामी जी के रसोइए ‘कलिया’ उर्फ ‘जगन्नाथ’ को अपनी तरफ मिलाकर उनके दूध में जहर डलवा दिया। परन्तु जगन्नाथ ने थोड़ी ही देर बाद स्वामी जी के पास आकर अपना अपराध स्वीकार कर लिया और उसके लिए क्षमा मांगी। उदार-हृदय स्वामी जी ने उसे राह खर्च और जीवन यापन के लिए पांच सौ रुपए देकर वहां से विदा कर दिया ताकि पुलिस उसे परेशान न करे। बाद में जब स्वामी जी को जोधपुर के अस्पताल में भर्ती कराया गया तो वहां संबंधित चिकित्सक भी शक के दायरे में रहा। उस पर आरोप था कि वह औषधि के नाम पर स्वामी जी को हल्का विष पिलाता रहा। बाद में जब स्वामी जी की तबियत बहुत खराब होने लगी तो उन्हें अजमेर के अस्पताल में लाया गया। मगर जब तक काफी विलम्ब हो चुका था। स्वामी जी को बचाया नहीं जा सका।

इस संपूर्ण घटनाक्रम में आशंका यही है कि वेश्या को उभारने तथा चिकित्सक को बरगलाने का कार्य अंग्रेजी सरकार के इशारे पर किसी अंग्रेज अधिकारी ने ही किया अन्यथा एक साधारण वेश्या के लिए यह संभव नहीं था कि केवल अपने बलबूते पर स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे सुप्रसिद्ध और लोकप्रिय व्यक्ति के विरुद्ध ऐसा षड्यंत्र रच सके। बिना किसी प्रोत्साहन और संरक्षण के चिकित्सक भी ऐसा दुस्साहस नहीं कर सकता था।

अंतिम वाक्य

जब दयानंद जी को यह लगने लगा कि अब यह शरीर जर्जित हो गया है और इस रोगी शरीर से राष्ट्र तथा समाज की सेवा नहीं हो पाएगी तब उन्होंने प्रभु की न्याय व्यवस्था में ही रहना उचित समझा। उन्होंने अपना क्षौर कर्म कराया तथा स्नान आदि के पश्चात् आर्य भक्तों को पास बुलाकर कहा, ‘इस भवन की खिड़की दरवाजे खोल दो फिर मुस्कुराते हुए दो वाक्य बोलो- हे ईश्वर तूने अच्छी लीला की, तेरी इच्छा पूर्ण हो। इतना कहकर उन्होंने अपने प्राणों का विसर्जन कर दिया।’

अंतिम वसीयत

यूं तो अनेक महापुरुषों ने अपनी अंतिम वसीयत लिखी है परंतु महर्षि दयानन्द जी की वसीयत की कोई उपमा नहीं मिलती। हमारे देश में प्राय: साधु संतों को मृत्यु के बाद अग्नि में नहीं जलाया जाता। उनके मृत शरीर को भूमि में गड्डा बनाकर बैठने की मुद्रा में दबा दिया जाता है, जिसे समाधि के नाम से जाना जाता है, अथवा नदी के बहते जल में बहा देते हैं उसे जल समाधि भी कहते हैं। परन्तु महर्षि दयानन्द ने अपनी वसीयत में साफ शब्दों में कहा था, ‘आर्यों मेरी मृत्यु के बाद मेरे शरीर को कहीं भूमि में नहीं दबाया जाए, नदियों के जल में भी नहीं बहाया जाए। केवल मात्र वैदिक विधि से ही अग्नि में दाह कर्म किया जाए। मेरी चिता की राख और अस्थियों को किसी नदी नालों में भी ना बहाया जाए। केवल मात्र इतना करें जब चिता ठंडी हो जाए, तब उस राख और अस्थियों को किसी गरीब किसानों के खेत में डालकर मिट्टी से दबा देंं, जो खाद बनकर किसान की उपज बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो। इसके बाद मेरी याद में कोई समाधि आदि भी ना बनाई जाए। जड़ पूजा के आदी ये लोग मेरे नाम पर भी कोई पाखंड खड़ा ना करें। मैंने अपने जीवन में जिस पाखंड का खंडन सदैव किया है, वही पाखंड जड़ पूजा, मेरे नाम पर किसी भी रूप में नहीं की जाए। 

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