दयानंद अर्थात् ‘जिसे दया करने में ही आनंद मिले, जिसके आनंद का आधार ही दया हो, जो किसी से बदला लेकर नहीं बल्कि उसको क्षमा करके संतुष्ट व प्रसन्न होता हो और ‘महर्षि दयानन्द सरस्वती’ एक ऐसा ही उदाहरण हैं जो अपने नाम में पूरे खरे उतरते हैं। उनका नाम ही दयानंद नहीं था बल्कि वह दया, करुणा और क्षमा की प्रतिमूर्ति थे। शायद यही कारण होगा कि उनके गुरु ‘पूर्णानंद सरस्वती जी’ ने उन्हें ‘स्वामी दयानंद सरस्वती’ के नाम से दीक्षित किया।
