Jaan se Jyada Aan ki Parvah
Jaan se Jyada Aan ki Parvah

Hindi Kahani: “छोटी ! तुम आओगी या नहीं रूपा बुआ के काज में…? पता तो चल ही गया होगा कि बुआ नहीं रहीं अभी बात करने और पुरानी बातों पर विवाद बनाने का समय नहीं है । तुम तो अभी ससुराल में ही हो ना ? मुझे लगता है तुम्हारे घर से बुआ का घर सिर्फ ढाई घण्टे का रास्ता है । एकतरफा रूही फोन पर बोलती जा रही थी । हालांकि दूसरी ओर फोन पर उसकी बहन रागिनी थी । पर रागिनी असमंजस में चुपचाप रूही की बात सुनी जा रही थी । “हेलो..हेलो ! रूही ने बोलकर समझना चाहा कि फोन कट गया है तो रागिनी की भारी आवाज़ सुनाई दी । अब रूही ने अपने भाई पवन को कॉन्फ्रेंस कॉल किया तब रूही ने पवन से आने का विचार जानना चाहा तो पवन ने भी दो टूक बोलकर फोन रख दिया..”मैं नहीं आ पाऊँगा, और वैसे भी बुआ से हमारा तो कोई ऐसा खास रिश्ता भी नहीं था । मम्मी का दिल भी दुखाया था उन्होंने। खैर..छोड़ो ! ऐसे घटिया लोगों के बारे में क्यों बात करना..? क्या कर सकते हैं, जाना था चली गईं । “अरे ! पवन ! किसी के जाने के बाद क्या उसमें खोट निकालना ? अब तो वो चली गईं, आदर नहीं कर सकते हो तो कम से कम निरादर तो मत करो । और वैसे भी..मम्मी – पापा से कैसा रिश्ता था, अच्छी बहन, अच्छी ननद थीं नहीं थी वो सोच के नहीं बल्कि अपने रिश्ते निभाओ । रुही ने खीझते हुए मन मसोसकर कहा ।

रुही की छोटी बहन रागिनी इन दिनों अपने ससुराल बोकारो आयी हुई थी दशहरा में । थोड़ी -थोड़ी दूरी पर ही प्रकाश जी का पूरा परिवार रहता था ।वहीं कतरास में रूपा बुआ का भी घर था पर दोनों बुआ – भतीजी वैचारिक मतभेद के कारण दिल से जुड़ नहीं पाती थीं ।
रुही ने अलमारी से अपना छोटा सा बैग निकाला ,और तीन – चार कपड़े प्रेस करवाकर रखे हुए थे। जैसे ही कपड़ों को बैग में डालने लगी उसका मन सोच – सोचकर विचलित होने लगा । सारे तो वहाँ बुआ और चाची के रिश्तेदार होंगे, मेरा अपना कोई होगा नहीं, कितनी मिन्नतें करूँ सबके आगे । जब इंसान को जान से ज्यादा आन की परवाह है …। अब पुराने ख्यालों के बादल मन में घिरकर आने लगे …रूपा बुआ बहुत मस्तमौला थीं, पापा और चाचा जितने शांत , गम्भीर बुआ उतनी ही चुहलबाज़ थीं । दादी की लाडली थीं, पर हम तीनों भाई – बहनों पर बहुत प्यार उड़ेलती थीं । पापा पैसे कमाने में इतने व्यस्त थे कि पापा के ऑफिस से आने के बाद मम्मी कुछ भी कहानी बनाकर परोस देतीं पापा चटखारे लेते थे, कभी दिमाग पर ज़ोर डालने की कोशिश नहीं किए की उनकी पत्नी मेघना जी पूरा घर और रिश्तों को तहस – नहस करने के लिए अकेले ही काफी हैं ।

उस दिन भी ऐसा ही हुआ था । रूपा बुआ के ससुराल में उनके बड़े ससुर का देहांत हो गया था । फूफाजी तो अपने काम से बाहर राउरकेला में रहते थे, बीच – बीच में आते लेकिन सारी जिम्मेदारियां बुआ ही निभाती थीं । जैसे ही बुआ ने खबर सुना दो कपड़े बैग में रखकर अपने ससुराल आ गईं । दो महीने बाद ही मेरी शादी थी, तैयारियाँ चल ही रही थीं कि ये सब हादसा हो गया । उसके बाद बुआ को अचानक से सिर दर्द होने लगा तो मायके नजदीक होने की वजह से वो मम्मी को बिन बताए घर पर आ गईं । मम्मी आँगन में गेहूँ धो रही थीं, बुआ को अचानक दहलीज पर देखकर उनके शरीर मे जैसे लहर दौड़ गयी । पापा बोले…”आओ रूपा, बैठो ना ! सोचा घर पहुंच जाओगी तब तुम्हें कॉल करूँगा । दादी भी बोलने लगीं..”बेटी पैर धोकर आ जाओ, अभी हमलोग खाने ही जा रहे थे ।
दादी की बात जैसे ही खत्म हुई मम्मी बुआ को देखकर चीखने लग गईं…रूपाssssss …एक तो आप मृत्यु वाले घर से आए हो और अपने घर जाने की जगह मेरे घर घुस गए । अब नकारात्मकता और मनहूसियत यहाँ फैलाना है क्या ? सोचना चाहिए कि शादी ब्याह वाला घर है । दादी की आँखें डबडबा गईं फिर मैं बुआ के पीठ पर हाथ रखते हुए मम्मी की ओर देखकर बोलने लगी …क्या मम्मी ! इतना ज्यादा तमाशा करने की क्या जरूरत है ? तब बुआ ने धीरे से बोला..बिट्टो ! मुझे वहाँ बड़ा भारीपन सा लग रहा था तो थोड़ी हिम्मत बटोरने चली आयी । मम्मी ने हाथ खींचकर अंदर किया मुझे फिर मम्मी की चमची छोटी के पास जाकर मैं बोली…”छोटी ! रोको न मम्मी को । छोटी के बोलने से पहले पवन ने कहा..इनकी गलती माफ करने लायक है ? घर के इतने अच्छे माहौल में न जाने कैसी जगह से आ गईं । पापा के पास रोकर मैं बोलने लगी तो बुआ उतरा सा रुआंसा चेहरा लिए दादी से गले मिलीं और पापा के पैर छूकर जाने लगीं । अब मेरे भी सब्र का बांध टूट गया तो मैंने चिल्लाकर कहा..पापा ! जा रही हैं बुआ । पत्नी भक्त पापा बुआ को न रोककर मम्मी से बोलने लगे ..मेघना ! क्यों इतने गुस्से में हो, रूपा चली जाएगी रोको तो सही । मम्मी ने चीखते हुए कहा..”क्यों रोकूँ उन्हें ? सुना..क्या बोल रही थी ..? सिर दर्द कर रहा है चक्कर आ रहा है ।मतलब वहाँ की मनहूसियत ले आयी न यहाँ ?
मैंने मम्मी से बोला..इतना पास मायके है तो भेंट मुलाकात के लिए आएंगी ना मम्मी ! ऐसे नहीं करना था आपको । “तुम चुप रहो रुही ! ज्यादा परवाह है तो साथ मे चली जाओ । तभी दादी को मम्मी ने तरेरकर देखा जो घुट घुटकर बिना आवाज़ निकाले रो रहीं थीं । मम्मी ने बोला..”जाइये माँ जी ! आपको लग रहा है वो अच्छा की हैं तो आप भी चले जाइये । दादी ने सिसकते हुए बोला…”अभी शादी में समय है बहू ! दोनो इस घर की बेटियाँ ही हैं मैं किसी का पक्ष नहीं ले रही लेकिन उसका मन नहीं माना , ऐसे माहौल में बोझिल सा लगा तो सबसे मिलने आ गयी । अपने दुःख हल्के करने के लिए तो होते हैं । और तबियत खराब तो कभी भी हो सकता है वहाँ की नकरात्मकरता को इस तरह न खींचो । ऐसे दिन कोई शौक से नहीं मांगता है । बूढ़े थे वो, समय हो गया था चले गए, क्यों खींचना इतना बात को …? मम्मी ने हाथ जोड़ते हुए कहा…आप चले ही जाइये माँ जी ! या फिर आपको इस घर मे खाना खाना है तो जो बोलूँ वो सुनना होगा । इन सबमे पापा की भूमिका इतनी ही थी कि वो मूक दर्शक बने रहे । पवन और रागिनी ने मम्मी को बोलने की बजाय ये कहा कि ..”मम्मी ! आप कितनी परेशान हो रही हैं, समझ मे आता है हमलोग को, बुआ हमारे घर का भला सोच ही नहीं सकतीं । और मम्मी ने दोनो बच्चों का माथा चूमते हुए रसोई से बना हुआ खाना उठाया और कूड़े में डाल दिया फिर बिस्तर पर लेट गईं । वो दिन – रात बहुत ही बेकार बीता ।

“रुही ! चलो जल्दी, अभी तक तैयार नहीं हुई । आज ऑफिस थोड़ा लेट जाऊँगा , तुम्हें बुआ के घर छोड़ आता हूँ । रुही अपने पति अमर की आवाज़ सुनकर जैसे वर्तमान में लौटी । “अभी तक पैकिंग नहीं की हो ? क्या कर रही थी । हड़बड़ाते हुए बोली..ब..ब बस ! दो कपड़े और अपनी दवा ही तो रखना है अभी रखती हूँ । जैसे ही गाड़ी में बैठी रुही की मम्मी और रागिनी का फोन आया… मम्मी का फोन रुही ने अनदेखा कर दियाऔर रागिनी से बात करने लगी । रागिनी ने कहा..”दीदी ! मुझे जाना ठीक नहीं लग रहा लेकिन मेरे पति ने बहुत गुस्सा किया पुरानी बातें सुनकर । मुझे बोल रहे हैं हम दोनों साथ मिलकर चलें। एक बार बहुत मिलने का तुमसे मन है दीदी ! प्लीज थोड़ी देर के लिए आ जाना । “नहीं..नहीं ! छोटी मुझे माफ़ कर दो । वही गलती मुझे नहीं दोहराना, तुम्हारी, पवन की और मम्मी की सोच बिल्कुल एक है । बुआ ने भी तो इतना ही वक़्त मिलने को सोचा होगा लेकिन मम्मी ने हमेशा के लिए रास्ता बंद कर दिया , तब से मेरे अंदर रिश्तों का भय बैठ गया है ।

और तुम चाहती न छोटी तो मम्मी को समझा सकती थी। वो माँ हैं तो ये नहीं कि उन्हें गलत कहने और करने का अधिकार है । याद है तुम्हें बुआ हमे नहला देती थीं, तेल लगा देतीं थीं कितने बड़े हो जाने पर भी और जो सब्जी नहीं पसन्द होती थी तो झट से रोटी में घी चुपड़ कर नमक लगाकर खिला देती थीं, कभी भूखे नहीं सोने दिया, कितना प्यार और ममत्व लुटाईं और हमने उनके लिए क्या किया ? अपना रोग भी छिपा गईं वो, किस काम का ऐसा मायका ? शादी में आने के बाद भी पूरे समय मम्मी के तानों का और अवहेलनाओं का शिकार , कितना झेल गईं वो ?

“अजीब लगता है ना दीदी ! पर अब मुझे उनके दर्द का एहसास है । ससुराल में रिश्तों को निभाते निभाते सब पुराना याद आता है तो गलत सही का एहसास होता है, पर मैंने बहुत देर कर दी । आँखें नम हो गईं रुही की और फोन काट दिया ।

अब रुही बुआ के घर आ गई थी । भेंट ,- मुलाकात करके वापस अपने घर चली आयी । अगली बार जब बरखी के दिन रुही बुआ के घर गयी तो पहुँचते ही देखा मम्मी – पापा बुआ की बेटी छवि के साथ बैठी हुई थीं । रुही मुँह मोड़कर आगे बढ़ती उससे पहले मेघना जी ने कहा…”अब माफ करने को कुछ नहीं बचा रुही समझती हूँ अपनी गलती पर बहुत शर्मिंदा हूँ, शब्द नहीं मेरे पास । लोगों की भीड़ वहाँ बढ़ने लगी और रुही सुनकर चुपचाप निकल कर अंदर गयी । सबसे भेंट करने के बाद शाम में निकलने लगे तो बुआ की बेटी आकर मेरे गले लगी और जी भर रोई । पुचकारते हुए सोलह वर्ष की बेटी छवि और तेरह वर्षीय अंशु का रुही ने माथा चूमा तो छवि ने कहा…दीदी ! मामा – मामी मुझे अपने साथ ले जाएँगे, नानी का घर तो नहीं देखी पता नहीं क्यों मम्मी नहीं ले जाती थी लेकिन अब वहाँ अच्छी तरह रहकर मम्मी के बचपन की बातें जानूँगी और उनके खिलौने से खेलूँगी ।

मुट्ठी भींच कर आँसुओं पर नियंत्रण करके अंदर ही अंदर रोई रुही । पर मम्मी – पापा का ये पश्चाताप रूपी फैसले से दिल मे खुशी के साथ संतुष्टि मिल रही थी ।
बार – बार दिमाग मे यही सवाल कौंध रहा था जीते जी इंसान के सामने आन क्यों…??