Funny Stories for Kids: एक थी नन्ही गौरैया । बड़ी भोली, बड़ी प्यारी सी । वह रोज सुबह निक्का के घर के लॉन में आकर बैठती थी । फुदक-फुदककर यहाँ से वहाँ जाती, फिर वहाँ से वहाँ । इस बीच चौकन्नी होकर गरदन घुमा, चारों ओर देख लेती, कि यहाँ कोई खतरा तो नहीं ।
सर्दियों में लॉन में बैठकर धूप सेंकना उसे पसंद था और गरमी के मौसम में उसे वहाँ अमलतास और गुलमोहर की ठंडी-ठंडी छाया मिल जाती । निक्का को गौरैया बड़ी अच्छी लगती थी । वह सोचता, इससे मेरी दोस्ती हो जाए, तो कितना अच्छा होगा । उसे याद आया । नानी ने बताया था, वे अपने आँगन में चिड़ियों के लिए एक प्लेट में गेहूँ और बाजरे के दाने रख देती हैं । एक सकोरे में थोड़ा पानी भी ।
रोज ढेर सारी गौरैयाँ आती हैं । आँगन में चह-चह, चह-चह करके तूफान सा उठा देती हैं, जैसे खुश होकर नानी को धन्यवाद दे रही हों । फिर दाना खाकर, पानी पीकर वे बड़े प्यार से नानी के कंधे पर आकर बैठ जाती हैं । जैसे चुपके से कह रही हों, तुम कितनी अच्छी हो नानी ! यों नानी से बड़ी देर तक वे बातें करती हैं, फिर उड़ जाती हैं ।
निक्का को लगा, क्यों न मैं भी इसी तरह गौरैया से दोस्ती कर लूँ? वह रोज उसके लिए एक प्लेट में गेहूँ के दाने और मिट्टी के कटोरे में पानी रखता था ।
गौरैया बड़ी खुश थी । अब वह निक्का की तरफ ऐसे देखती, जैसे उसे धन्यवाद दे रही हो ! धीरे-धीरे निक्का की नन्ही गौरैया से दोस्ती हो गई । एक दिन निक्का लॉन में बैठा कहानियों की किताब पढ़ रहा था । अचानक गौरैया ने उसे लाकर दिया एक छोटा सा पत्ता । बिल्कुल निक्कू सा । उसकी छोटी वाली उँगली से भी छोटा । था तो हरा, पर बीच-बीच में वह चाँदी की तरह चम-चम चमक उठता था ।
‘मैं क्या करूँ इसका ?’ निक्का की समझ में नहीं आया । उसने हैरानी से गौरैया की ओर देखा । गौरैया बोली, “चीं-चीं…चीं-चीं-चीं…!” निक्का को लगा कि गौरैया कह रही है, ‘प्यारे निक्का , इस निक्कू से पत्ते को खूब सँभालकर रखना । यह तुम्हारे काम आएगा !’
आखिर उसने उसे अपने स्कूल बैग की अंदर वाली जेब में रख लिया । पर चाँदी जैसा चमकता वह छोटा-सा पत्ता इतना संदुर और प्यारा था कि निक्का का मन उसी में रमा रहता । और कई बार तो उसे लगता, यह पत्ता रूप भी बदलता है । कभी कुछ तो कभी कुछ । एक बार उसने बस्ते में झाँककर देखा तो पता चला, वह पत्ता तो मोरपंख बन गया है । फिर एक दिन सुबह-सुबह उसे गुलाब की बड़ी तेज खुशबू आई । उसने इधर-उधर झाँककर देखा, अरे, गुलाब कहाँ खिला है ?
उसे आसपास कहीं गुलाब नहीं दिखाई दिया । तभी अचानक उसने बस्ते में झाँका । आश्चर्य ! वह निक्कू सा पत्ता अब गुलाब का फूल बनकर मुसकरा रहा था ।
यही नहीं, अब तो वह अकसर सुबह-सुबह हँसते हुए कहता, “गुड माॅर्निंग मि . निक्का !”
“गुड मॉर्निं ग !” निक्का भी हँसकर जवाब देता था । निक्का को बड़ी हैरानी होती थी– अरे भाई, यह क्या जादू-मंतर है ? कि सी को बताऊँ, तो भला कौन मुझ पर यकीन करेगा ?
फिर एक दिन की बात । निक्का को सुबह तैयार होने में जरा देर हो गई । इसलिए स्कूल जाते हुए उसने अपने बैग में झटपट ढेर सारी किताबें बेतरतीब ठूँस लीं । बस्ता बड़ा भौंड़ा और अजीब-सा हो गया । पर निक्का का ध्यान तो इस ओर था ही नहीं ।
वह उसे उठाकर स्कूल जाने लगा तो बस्ते के भीतर से आवाज आई, “रुको, जरा रुको…निक्का , रुको ।” निक्का के पैर वहीं ठिठक गए । सोचने लगा, ‘कौन बोला, कौन…?’ तभी फिर से आवाज आई, “मैं बोल रहा हूँ । तुम्हारा दोस्त पत्ता । जैसे गोलू गोगा, जैसे पप्पन , जैसे सत्ता !” कहकर वह पत्ता हँसने लगा ।
निक्का को हैरानी हुई, कैसा है यह पत्ता ? कहीं जादू वाला तो नहीं ! बिल्कुल मेरी ही तरह बोलता है ।
निक्का इसी सोच में था, तभी उस पत्ते ने थोड़ी शिकायती आवाज में कहा, “निक्का देखो तो, बस्ता कितना भद्दा लग रहा है तुम्हारा ! इतनी लापरवाही भी अच्छी नहीं । क्या तुम अपनी किताबों को अच्छी तरह नहीं रख सकते ? इसमें दो मिनट भी नहीं लगेंगे, और बस्ता सज जाएगा । तुम्हारा मन भी खुश होगा ।” निक्का को गलती पता चली । बोला, “सॉरी, दोस्त पत्ते ! तुम सचमुच बहुत अच्छे हो ।” उसने बस्ता करीने से लगाया और मुसकराता हुआ स्कूल की ओर चल पड़ा ।
लेकिन उसने सोच लिया था कि आगे से वह सुबह थोड़ा जल्दी उठेगा । ताकि बिना किसी हड़बड़ी के, करीने से अपना बस्ता लगा सके । ऐसे ही कुछ दिन और बीते । गौरैया का दिया हुआ वह चाँदी जैसा पत्ता सचमुच निक्का का दोस्त बन गया । उसे हमेशा वह अच्छी -अच्छी बातें बताता था । जहाँ जरूरत होती, वहाँ टोकता भी था । फिर एक बार की बात ! रात का समय था, निक्का के घर की लाइट चली गई । मम्मी परेशान हो गईं । वे रसोई में खाना बना रही थीं । अब खाना कैसे बनाएँ ? उन्होंने वहीं से आवाज लगाई, “अरे भई निक्का , जरा मोमबत्ती जलाओ । ढूँढ़ो जल्दी , माचिस कहाँ है, मोमबत्ती कहाँ ?”
निक्का झटपट ढूँढ़ने लगा माचिस और मोमबत्ती, पर अँधेरे में भला कैसे ढूँढ़े ? वह थोड़ा परेशान था । इतने में उसका ध्यान अपने स्कूल बैग की ओर गया । उसमें कुछ ऐसी रोशनी टि मटि मा रही थी, जैसे छोटा-सा बल्ब जल रहा हो ।
“अरे, अरे, वहाँ यह रोशनी कैसी है !” निक्का हैरान । तब तक निक्का की मम्मी , मीनू दीदी और नंदू भैया भी आ गए थे । सब हैरानी से निक्का के बैग को देख रहे थे । और आपस में कह रहे थे, “वाकई ऐसा लग रहा है, जैसे निक्का के बस्ते में कोई बल्ब जल रहा हो । कहाँ से आया भई, कहाँ से आया ? यह तो कोई जादू-मंतर है ।”
फिर तो उस रात गौरैया के उस नन्हे जादू वाले पत्ते से बिल्कुल बल्ब जैसा काम लिया गया । बगैर बिजली के भी सारा काम चल गया । सब हैरान थे, ‘कमाल है भई । गौरैया का यह कैसा अनोखा उपहार !’ ऐसे ही एक दिन निक्का स्कूल से घर लौट रहा था, तो वह झूला पार्क के पास से निकला । उसे यह देखकर दुख हुआ कि झूला पार्क में बहुत कम फूल खिले थे । उसने सोचा, ‘कितना अच्छा हो, अगर पार्क में हर ओर फूल ही फूल खिले हों !’
आश्चर्य ! निक्का के यह सोचते ही पार्क में चारों तरफ फूल ही फूल खिल गए । निक्का के बस्ते से भी खुशबू आ रही थी । देखा तो वह चाँदी जैसा चमकीला पत्ता भी एक संदुर फूल बन चुका था । मोगरे का खबू खशु खुसबूदार । फिर कुछ रोज बाद की बात है, निक्का का पानी से भीगने का मन था । तब देखते ही देखते वह चमकीला छोटा सा पत्ता पानी के फव्वारे में बदल गया । हालाँकि मजे की बात यह कि निक्का की कि ताबें बि ल्कुल नहीं भीगीं । तो भी निक्का उस फव्वा रे के पानी में अच्छी तरह नहा लिया ।
अब तो रोज निक्का याद करता गौरैया को । भला कहाँ गई चमकीले जादुई पत्ते का अनोखा उपहार देने वाली वह नन्ही सी गौरैया ?
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ऐसे ही एक-एक कर बहुत दिन बीत गए । फिर एक दिन आई वह गौरैया । बोली, “प्यारे निक्का , मैं पंपापुर गई थी । अभी-अभी लौटी हूँ । अब मुझे उस पत्ते की जरूरत है । लाओ जी, लाओ मेरा पत्ता !”
निक्का ने झट बैग खोला और वह चाँदी जैसा चमकीला पत्ता निकालकर दे दिया । फिर बोला, “थैंक्यू गौरैया दीदी, आपने शायद मुझे जादू वाला पत्ता दिया था ।” गौरैया हँसी । बोली, “था तो वह सादा सा पत्ता, पर तुम बहुत अच्छे बच्चे हो निक्का । मन तुम्हारा बड़ा साफ है । इसलिए तुम जो सोचते हो, वह खुद-ब-खुद हो जाता है ।” “अच्छा , लाओ, दो वह पत्ता !” गौरैया बोली, “मुझे ऐसे बच्चे को देना है जो बहुत उदास रहता है । शायद इससे उसके जीवन में थोड़ी खुशियाँ आ जाएँ !” गौरैया ले गई वह पत्ता । शहर के दूसरे छोर पर रहने वाले एक बच्चे के लिए । जॉन उसका नाम था । उसके पिता नहीं थे । सिर्फ माँ थी, जो दूसरों के घर काम करती थी । जाते-जाते गौरैया बोली, “सुनो निक्का , जॉन भी तुम्हारी तरह बहुत प्यारा बच्चा है । पर वह सब दिन अकेला और उदास रहता है । उसके साथ कोई खेलने वाला नहीं है । बस, एक मैं ही हूँ, जो कभी-कभी उससे बातें करके उसे खुश कर देती हूँ । यह पत्ता पाकर वह बहुत खुश होगा ।”
जब गौरैया फिर से विदा लेकर जा रही थी, निक्का बोला, “गौरैया, प्यारी गौरैया, कभी मुझे जॉन से मि लवाना । उससे मि लकर मुझे बहुत अच्छा लगेगा ।” गौरैया बोली, “क्यों नहीं, क्यों नहीं, जरूर मि लवाऊँगी ! जॉन वाकई अच्छा लड़का है । उसे तुम्हा रे जैसा दोस्त मि लेगा तो वह खुश होगा । बहुत खुश ।” कहकर वह उड़ी और उड़कर आसमान में चली गई ।
ये कहानी ‘बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Bachchon Ki 51 Natkhat Kahaniyan बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ
