Hindi Prem Kahani: “आओ जी, फिर से स्वागत है आपका। इस बार बड़ी जल्दी आ गए।”
“अरे-अरे, इतनी उखड़ी-उखड़ी सी क्यों बोल रही हो? ऐसे तो कोई किसी का स्वागत नहीं करता।”
“हूंह…”
“अच्छा, अब देख भी लो मेरी तरफ।”
“क्यों चले आते हो बार-बार? क्या है मुझ में इतना खास कि तुम मुझे छोड़ नहीं सकते, मेरे बिन रह नहीं सकते हो?”
“ओहो, छोड़ो भी अब गुस्सा। मुस्कुरा कर देखो मेरी तरफ।”
“मुझे नहीं बात करनी तुमसे।”
“तो समझ लूं? अब तुम्हें मेरी फिक्र नहीं, अब तेरे दिल में मेरे लिए प्यार खत्म हो गया?”
“मैंने ऐसा तो कुछ नहीं कहा।”
“फिर यह नाराजगी क्यों?”
“यार, मैं भी सुकून से जीना चाहती हूं। तुम्हारी मौजूदगी कई बार मुझे बहुत परेशान करती है। बात सिर्फ मेरी होती तो मैं हर हाल में समझौता कर लेती, पर अब मेरे इर्द-गिर्द के सभी रिश्ते प्रभावित होते हैं। सभी मुझे नज़रे चुराने लगे हैं। तुम यह बात क्यों नहीं समझते? किसी को इतना भी खुदगर्ज नहीं होना चाहिए!”
“बाकी सब तो ठीक है, पर यह तेरे आखरी शब्द बिल्कुल गलत हैं। यह तोहमत तो मत लगाओ, मैं खुदगर्ज नहीं हूं।”
“खुदगर्ज ही तो हो! मुझे अपने साथ में उलझा कर सभी से दूर कर लेते हो।”
“हांआं, यह बिल्कुल सत्य है।”
“अच्छा बताओ, इंसान का जन्म क्यों होता है? सुना है कि 84 लाख जून भुगतने के बाद इंसानी जामा नसीब होता है, है ना!!”
“हम्म्म… बताया था एक रोज मां ने। पर इसका तेरे साथ से क्या मतलब???”
“अच्छा, जब सिर्फ मैं तेरे साथ होता हूं, तो क्या महसूस करती हो?”
“कुछ नहीं।”
“झूठ मत बोलो, बताओ ना…”
“हूंअंअंअं… जब मैं सिर्फ तुम्हारे साथ होती हूं, या कह लो कि तुम मेरे साथ होते हो, मैं सबसे दूर और खुद के साथ होती हूं। तुझे पल-पल महसूस करती हूं, अपनी रगों में तेरा एहसास, तेरी रवानगी महसूस करती हूं। तब मुझे एहसास होता है कि ये दुनिया, ये रिश्ते सब झूठे हैं। ये भी सच है कि तुम्हारी ही वजह से मेरी दोस्ती कलम से हुई, ‘जोत’ मेरा अस्तित्व बन सका। तुम तो पागल हो, जो मेरी तन्हाई में भी मुझे अकेला नहीं छोड़ते हो। अब तो लगता है कि मेरी कब्र में भी तुम मुझे नहीं छोड़ोगे। लोग यूं ही कहते हैं— जब मौत आती है, कुछ साथ नहीं जाता, पर मुझे यकीं है, तुम मेरे साथ ही जाओगे।”
“चलो, शुक्र है। तुम्हें मेरी कदर तो है, यह सुनकर दिल को अच्छा लगा। जानती हो, मैं कोई आवारा भंवरे जैसा नहीं हूं कि इधर-उधर जाता रहूं। पता है, एक तुम ही हो जो मेरी इज्जत करती हो। तुम मुझे औरों की तरह दुत्कारा नहीं करती हो, मुझे मां के आंचल की तरह संभालती हो। मैं जब तक चाहूं, तेरे पास रह सकता हूं। तू कभी मुझसे जुदा होने की दुआ नहीं मांगती।
मेरा नाम ‘दर्द’ लोगों ने ही रखा है। अपनी-अपनी समझ से लोग मुझे चीख, कसक, नाम देकर दुत्कारते हैं, रोते हैं, तड़पते हैं, मुझे मारने की लाखों यत्न करते हैं। पर तुम ऐसा नहीं करती। क्योंकि तुम खुदा की बहुत लाडली हो। वह तुम्हें बहुत प्यार करता है, और मुझे तेरे पास भेज के तुम्हें अपनी तरफ करने का जरिया बना लेता है।
कोई समझना चाहे तो मैं किसी के ‘कर्मों की सजा’ नहीं हूं। मतलबी दुनिया से दूर कर इंसान का परमात्मा से मिलन कराने वाला दूत हूं। बड़े फख्र से कहता हूं कि मैं ‘दर्द’ हूं, जिसे तुम बहुत मान बख़्शती हो — जो सभी के बस की बात नहीं है।”
“अच्छा-अच्छा, ज्यादा बातें ना बनाओ। आ जाओ, लग जाओ मेरे गले… हमेशा की तरह।”
प्रभजोत कौर जोत
7..हाय मैं शर्म से लाल हुई
गोलगप्पे खाने की शौकीन मैं जब भी बाज़ार जाती तो कभी भी अपने आप को गोलगप्पे खाए बिना रोक ना पाती।बाज़ार में शॉपिंग करते हुए लेट हो जाते तो भी गोलगप्पे खाना तो ज़रूरी होता।बहुत बार गोलगप्पे वाले के पास भीड़ होती तब भी मैं घर जाकर सासू मां को झूठ बोल देती कि ट्रैफिक था।
पतिदेव कहते कि किसी दिन फंसाओगी और मैं हंस पड़ती।एक बार मेरी बेटी को तेज़ बुखार था।मेरे ससुर जी ने प्यार से उसका माथा सहलाते हुए पूछा,”मेरी गुड़िया का क्या खाने का दिल कर रहा है” और वह बुखार में ही बोली,” गोलगप्पे”।
“गोलगप्पे कौन खाता है भला”?
“मम्मा तो जब भी बाज़ार जाती है गोलगप्पे खाती है”।
बुखार में पड़ी बच्चों के मुंह से निकले शब्द वहां खड़े सभी लोगों को हंसा गए थे और मैं शर्म से लाल होती हुई रसोई में भाग गई।
