Hindi Kahani
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Hindi Kahani: “रमा पिताजी कहां हैं?” सुहास ने ऑफिस से आते ही अपनी पत्नी से पूछा।
“सुबह से अपने कमरे से बाहर निकले ही नहीं हैं। मैंने नाश्ता और खाना समय पर दे दिया था। मैं तो बोल बोल कर थक गई कि थोड़ा घर के काम में भी मदद करवा दिया करें और बाजार से  फल सब्जी ही ला दिया करें पर मेरी बात सुनते ही कहां हैं? आप ऑफिस चले जाते हैं और बच्चे स्कूल। मैं अकेले घर बाहर सारा काम संभालती हूं।”
सुहास के माथे पर चिंता की लकीरें घिर आई यह सोचकर कि कहीं उसके पिता की तबियत खराब तो नहीं है। उसे रमा पर गुस्सा भी आ रहा था कहीं उसके व्यवहार से तो वो दुखी नहीं हो गए। यह आज पहली बार नहीं हुआ था वो पहले भी कई बार इसी तरह शिकायतें किया करती थी।
कुछ महीने पहले ही इस घर में कितनी चहल-पहल और रौनक बनी रहती थी। जब मां और पिताजी एक साथ इस घर में रहा करते थे फिर अचानक घर में मौन पसरता चला गया रमा की एक जिद के कारण जो अब सुहास को भी अखरने लगा था।
बैग सोफे पर रखकर वो पिताजी के कमरे में जाने लगा तो रमा बोली
“आप हाथ मुंह धोकर पहले चाय पी लीजिए। उनका तो अब रोज रोज का नाटक हो गया है। किसी ना किसी बात पर मुंह फुलाकर बैठ जाएंगे। मैं तो कहती हूं…”
सुहास ने अपनी पत्नी की बात बीच में ही काटते हुए कहा। “तुम मेरी और पापा की चाय उनके कमरे में ही ले आना।”
रामदयाल अंधेरे में बैठे अपनी पत्नी की तस्वीर हाथ में लिए और  उसका शॉल लपेटे उसकी खुशबू को महसूस करते उसकी यादों में खोए थे।
  वो उनकी हर पसंद ना पसंद का ध्यान रखती थी और हमेशा उनके हर सुख दुख में उनका साथ दिया करती थी। कम आमदनी में भी कितने अच्छे से घर संभाल लिया करती थी। कभी कोई शिकायत नहीं की, उनकी हर बात का सम्मान किया। दोनों बच्चों को पढ़ाया लिखाया और अच्छी नौकरी लगने के बाद उनकी शादी करवाई। कितने सपने देखे थे दोनों ने साथ मिलकर।
 महीने भर में ही वो खुद को कितना बूढ़ा और अकेला महसूस कर रहे थे जब से वो अपने दूसरे बेटे के पास रहने गई थी।
रिटायरमेंट के बाद उन्होंने सोचा था कि वो गांव जाकर रहेंगे और जीवन की आपाधापी में जो समय एक दूसरे के साथ बिता नहीं पाएंगे वो समय साथ बिताएंगे।
एक तरफ रामदयाल अपनी पत्नी के साथ सुकून गांव के घर में रहना चाहते थे और दूसरी तरफ रमा और  उसकी देवरानी के मन में लालच ने जगह ले ली थी। दोनों ने मिलकर ही तो यह योजना बनाई कि सास ससुर के रहते सारी पुस्तैनी जमीन बिक जाए । दोनों ने अपने अपने पतियों के कान भरने शुरू कर दिए थे।
“लोग क्या कहेंगे कि पिता के रिटायर होते ही दोनों बेटों ने उन्हें गांव जाने को मजबूर कर दिया। उनके दो दो बेटे बहू होने के बावजूद वो दोनों गांव में जाकर रहें यह ठीक तो नहीं। वैसे भी गांव की जमीन मकान बेच कर हम शहर में ही अपनी जमीन ले लेते हैं।”
सुहास को भी अपनी पत्नी की बात सही लगी। उसका छोटा भाई निशांत जो दूसरे शहर में रहता था वो भी अपनी पत्नी और बच्चों के साथ उस दिन आया था जिस दिन रामदयाल अपनी पत्नी के साथ नए जीवन की कल्पना में खोए हाथों में फूलों का गुलदस्ता और बेली के फूलों का गजरा लिए घर में प्रवेश कर रहे थे।
उन्होंने अपने जीवन के पैंतीस साल पोस्ट ऑफिस में काम करके बिताए थे और अब साठ साल की उम्र में वो रिटायर हो गए थे। अब वो गांव के अपने पुस्तैनी घर में अपनी पत्नी के साथ रहकर जीवन बिताना चाहते थे।
दोनों बेटों और बहुओं ने दलीलें देकर उन्हें वो पुस्तैनी मकान बेचने और रिटायरमेंट के पैसे दोनों बच्चों में बांटने पर मना लिया। पैसों के साथ साथ दोनों भाईयों ने अपने माता-पिता का भी बंटवारा कर लिया।
“बच्चों की खुशी में ही हमारी खुशी है।” कमला ने रामदयाल को भरी आंखों से समझाते हुए कहा था।
छोटे बेटे रुपेश के बच्चे अभी छोटे थे और उसकी पत्नी नौकरी करती थी तो उसने मां को अपने साथ ले जाने के लिए मना लिया।
रामदयाल और कमला बच्चों के आगे बेबस हो गए थे।
“पापा आप अंधेरे में क्यों बैठे हैं? आपकी तबियत तो ठीक है?” सुहास ने कमरे की लाइट जलाते हुए कहा।
रामदयाल फफक उठे।
“तुम्हारी मां के बिना मैं अधूरा हो गया हूं। मैं कल ही जा रहा हूं ‌उसके पास।”
“पापा आप फिर वही जिद लेकर बैठ गए।  आपको यहां क्या दिक्कत है? किस चीज की कमी है इस घर में। क्या मैं आपको समय पर चाय नाश्ता नहीं देती हूं या आपके कपड़े धोती नहीं हूं।” रमा ने चाय की ट्रे रखते हुए कहा।
रामदयाल कुर्सी से उठकर खिड़की के पास खड़े हो बाहर आकाश में उड़ते पंछियों को अपने अपने घौंसलो की तरफ जाते हुए देखने लगे। दिन भर की उड़ान के बाद वो अपने आशियाने में रात गुजारेंगे पर क्या वो अपनी पत्नी से दूर रहकर सुकून से एक पल भी गुजार पा रहे हैं। चाय नाश्ते खाने के साथ बहू के ताने और अपमान के घूंट अब उनसे बर्दाश्त नहीं हो रहे थे।
“पापा बताईए ना हमसे क्या ग़लती हो गई जो आप यहां हैं जाने की बात कर रहें हैं। रमा ठीक ही तो कह रही है कि वो आपका कितना ध्यान रखती है।” सुहास  चाय का कप लिए अपने पापा के पास आ खड़ा हुआ।

“बेटा कल को तुम्हारे भी बच्चे बड़े होंगे और तुम दोनों को भी हमारी तरह अलग-अलग रहने पर मजबूर कर देंगे तो तुम क्या करोगे?”
रामदयाल की आंखों में आंसू भर आए। वो अपने कुर्ते की आस्तीन से आंसुओं को पोंछते हुए बोले…
“जीवनसाथी का साथ बढ़ती उम्र में ज्यादा जरूरी है यह बात तुम्हें अभी समझ नहीं आ रही है पर जब मेरी उम्र में पहुंचोगे तब जानोगे।”
सुहास अपने पिता को उदास देख रुआंसा हो गया उसे एहसास हो गया था कि उसने कितनी बड़ी ग़लती की अपने माता-पिता को एक दूसरे से अलग करके।
पापा अपना सामान पैक कीजिए हम मां के पास जा रहें हैं।
रामदयाल की बूढ़ी पनीली आंखों में चमक जाग उठी।
सुहास ने अपने कमरे में आकर अपने भाई को फोन किया और बताया कि वो पापा के साथ कल ही आ रहा है मां से मिलने। पिता के बुढ़ापे को वो महसूस कर रहा था। रमा ने भी अपनी ग़लती मानते हुए अपने सास ससुर से माफी मांगी।
अब रिटायरमेंट के बाद की जिंदगी वो अपनी पत्नी के साथ ही रहेंगे यह सोचकर उनकी आंखों से खुशी के आंसू झलक उठे।
कविता झा’अविका’