जब ओसीडी से जूझती तनीषा को अनदेखी मदद ने संभाला
यह भावनात्मक कहानी ओसीडी से जूझती तनीषा और उसकी मीना के बीच बने उस रिश्ते को दिखाती है, जहाँ बिना पढ़े-लिखे भी गहरी समझ और सहारा मिला।
कहानी बताती है कि सच्ची मदद और मानसिक स्वास्थ्य की शुरुआत अक्सर इंसानियत, धैर्य और बराबरी से होती है।
Hindi Short Story: तनीषा को हमेशा लगता था कि मदद वही कर सकता है, जो पढ़ा-लिखा हो, समझदार हो, उसकी तरह सलीकेदार हो। बाक़ी लोग उसके लिए बस दुनिया का शोर थे। इसीलिए उसने कभी मीना को गंभीरता से नहीं लिया। मीना उसके घर में काम करती थी। रोज़ सुबह आती, चुपचाप झाड़ू-पोछा करती, और बिना ज़्यादा बोले चली जाती। तनीषा उसे बस निर्देश देती यहाँ अच्छे से साफ़ करना, उस कोने को दोबारा देख लेना। मीना सिर हिलाती और काम में लग जाती। तनीषा को यह नहीं दिखता था कि मीना हर बार उसके काँपते हाथ देख लेती है। यह भी नहीं दिखता था कि मीना समझ जाती थी, यह सिर्फ़ सफ़ाई नहीं है। तनीषा का मन दिन-ब-दिन भारी होता जा रहा था। हर चीज़ उसे डराने लगी थी। कभी उसे लगता कि घर गंदा है, कभी लगता उसने कुछ गलत छोड़ दिया है।
वह बार-बार चीज़ें चेक करती, बार-बार हाथ धोती, और फिर भी चैन नहीं मिलता। रात को उसका सिर दर्द से फटने लगता, लेकिन वह किसी से कुछ कहती नहीं थी।
उसे लगता था,मैं इतनी समझदार हूँ, मुझे किसी की ज़रूरत नहीं। एक दिन तनीषा बुरी तरह टूट गई।वह रसोई में खड़ी थी, पानी से सिंक साफ़ करते हुए अचानक फिसल गई और फर्श पर बैठ गई। पानी बह रहा था, हाथ काँप रहे थे, साँस रुक-रुक कर आ रही थी। वह लगातार रोये जा रही थी।मीना उसी वक़्त वहां पहुँची। तनीषा ने जल्दी से आँसू पोंछने की कोशिश की, लेकिन मीना ने कुछ नहीं कहा। वह बस पास आकर बैठ गई। न सवाल, न सलाह। कुछ देर बाद उसने बहुत साधारण-सी आवाज़ में कहा, दीदी, जब मन बहुत भागता है न, तब उसे ज़बरदस्ती पकड़ना नहीं चाहिए।

तनीषा ने चौंककर उसकी ओर देखा। मीना बोली, मेरे साथ भी होता था। जब मेरा बच्चा चला गया था। मन दिन-रात डरता था कुछ न कुछ बुरा होने वाला है। तब एक डॉक्टर ने मुझसे कहा था डर को बैठने दो, खुद थक जाएगा। तनीषा सन्न रह गई। उसे पहली बार एहसास हुआ कि मीना सिर्फ़ झाड़ू-पोछा करने वाली औरत नहीं है। उसके पास भी दर्द है, अनुभव है और पूरी समझ भी। उसके ओसीडी को मीणा ने कितनी आसानी से समझ लिया था। उस दिन के बाद अगर तनीषा बार-बार हाथ धोती, तो मीना कहती, कोई जल्दी नहीं है। अगर तनीषा घबरा जाती, तो वह चुपचाप पानी का गिलास पकड़ा देती।

एक दिन मीना ने कहा, दीदी, अगर आप चाहें, तो हम आज घर का एक काम कम कर देते हैं। बस एक। तनीषा ने हिम्मत करके हाँ कहा और ऐसा करने के बाद उसने आसानी से समझ लिया कोई काम काम कर लेने से ना ही कुछ गलत हुआ ना ही उसकी दुनिया बिखरी। तनीषा को पहली बार लगा शायद मदद ऊँचाई से नहीं, बराबरी से आती है। उसके बाद तनीषा ने मीना के साथ जाकर खुद को डॉक्टर को दिखाया, इलाज शुरू हुआ। लेकिन सच यह था कि इलाज की पहली सीढ़ी मीना ही थी। वही मीना, जिसे वह कभी अपने लायक नहीं समझती थी।
एक दिन तनीषा ने उससे कहा,मैंने तुम्हें कभी धन्यवाद नहीं कहा। मेरे ओसीडी को तुमने इतनी आसानी से समाज लिया, मेरी इतनी बड़ी परेशानी इतनी आसानी से ठीक कर दी। मीना मुस्कुराई और बोली , मुझे इस परेशानी का नाम नहीं पता और ना ही कभी इसके बारे में कुछ सुना है।
मैंने तो बस आपको अपने जैसा इंसान समझा। मीना की बातें सुनने के बाद तनीषा मानने लगी है की ज़िंदगी में जो हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा देता है, वह हमेशा वैसा नहीं होता, जैसा हम कल्पना करते हैं और यही समझ तनीषा के जीवन का सबसे गहरा बदलाव बन गई।
