Hindi Short Story
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Hindi Short Story: मेरे पिता जी व पड़ोसी बाबूजी ने एक प्लाट खरीद कर ,शहर में मकान बनवाया था। दोनों बचपन से साथ रहे। एक ही गाँव के रहने वाले थे।
मेरे पिता बाबूजी को अपना बड़ा भाई मानते थे। पिताजी स्वयं के जन्मदिन पर, प्रत्येक त्यौहार पर  अम्माजी- बाबूजी का आशीर्वाद लेने सुबह से उसके घर जाते थे।
  जिस प्रायवेट शाला के बाबूजी  प्राचार्य थे,उसी शाला में मेरे पिताजी पढ़ाते थे।
हमारी हैसियत उन लोगों से कम थी, परन्तु बाबूजी ने कभी हमें छोटा नहीं समझा।
मेरी माँ चार बच्चों की गृहस्थी में ही उलझी रहती थीं।वे बीमार भी रहती थीं।
माँ ही सबकी प्रथम गुरु होती है।अपने छोटे से वेतन में घर कैसे चलाना, वह हमने मांँ से ही सीखा। माँ तो माँ होती हैं,उनसे हम अन्जाने में ही न जाने क्या-क्या सीख जाते हैं, जो हमें याद भी नहीं रहता।
मेरी पड़ोस की अम्माजी भी मेरे लिए  माँ तुल्य थीं।उनकी दो बेटियां थीं।उनकी छोटी बेटी और मेरी अच्छी दोस्ती थी। वह मुझसे तीन साल बड़ी थी।उसकी शादी तय हो गई थी, तो अम्माजी उसे गृहस्थी का काम सिखा रही थी। मैं भी उसके साथ सब सीख जाती थी।
अम्मा जी बहुत स्वेटर बनाती थीं।उनसे मैंने स्वेटर बनाना,नयी-नयी डिजाइन बनाना सीखा ।मेरी सहेली को भी स्वेटर उन्होंने सिखाने की बहुत कोशिश की परन्तु वह नहीं सीख पाई।
 हमारे समय शालाओं में दशहरे की अष्टमी से भाईदूज तक दीपावली की छुट्टी होती थी।
तब हम दोनों सहेलियांँ अपने-अपने आंँगन में प्रतिदिन नयी रंगोली बनाते  थे।उसके पास रंगोली की पुस्तक थी । मैं उससे पेपर पर बनाकर ले आती थी।
मेरी सहेली व मेरे में रंगोली प्रतियोगिता होती थी। दोनों के घर के बीच एक ही दीवार थी, पर आँगन एक ही था। दोनों घर के  सदस्य हम  दोनों की रंगोली देखकर अपनी-अपनी टिप्पणियांँ देते थे।
    हम दोनों को रंगोली डालना व रंगोली के अलग-अलग रंग कैसे बनाना ये अम्मा जी ने ही सिखाया।
बेटी की शादी के बाद अम्माजी बाबूजी का घर सूना हो गया। चार साल तक मैं ही उनकी बेटी बन कर रही।अम्मा बाबूजी जब भी सिनेमा जाते या रिश्तेदारी में जाते मुझे भी साथ ले जाते। मेरी शादी में बिदा के समय बाबूजी और अम्मा  बहुत रोये।
   जब भी मायके आती,यदि उनसे मिलने में देरी हो जाती तो, नाराज़ हो जाते थे। दोनों कहते “तुमको हमसे मिलने की फुर्सत मिल गई।”
बाबूजी तो जल्दी भगवान के पास चले गये।अम्माजी चौरानवे  साल की उम्र तक चलती फिरती रहीं। वे एकाकी जीवन से ऊब गयीं थीं। अंतिम बार जब मैं उनसे मिलने गयी तो कहने लगी “मेरे लिए तुम भी प्रार्थना करो, कि मुझे भगवान जल्दी उठा लें,शायद मुझे  वे ले जाना भूल गये हैं “।
 मेरी प्यारी अम्माजी ने दुनिया से जाते -जाते भी समाज के सामने एक आदर्श प्रस्तुत किया। अपना शरीर वे मेडिकल कॉलेज के बच्चों की पढ़ाई के लिये दान कर गयीं।
उनको बिदा किये बहुत साल बीत गये, परन्तु आज भी अम्माजी के साथ बिताया हर पल आँखों के सामने तैर जाता हैं।
उन्हें शत-शत नमन।