Silhouette of a mother lifting her daughter into the air at sunset in a field.
Chuppi ka Ujala

Summary: ख़ामोशी में गूंजता आत्मविश्वास

दस साल की अनु की यह कहानी डर, हकलाहट और टूटते आत्मविश्वास के बीच उभरती एक नन्ही हिम्मत की दास्तान है, जहाँ माँ और नानी का निस्वार्थ सहारा उसे खुद को अपनाना सिखाता है।

Hindi Short Story: हर माँ चाहती है कि उसका बच्चा निडर होकर बोले, खुलकर अपनी बात कहे और दुनिया के सामने आत्मविश्वास से खड़ा हो। लेकिन कुछ बच्चों के लिए यह सफ़र आसान नहीं होता। कुछ बच्चों की आवाज़ रास्ते में ही अटक जाती है और तब सवाल सिर्फ़ बोलने का नहीं, समझे जाने का हो जाता है। दस साल की अनु ऐसी ही एक बच्ची है। अनु बोलते समय हकलाती है। शब्द उसके मन में तो पूरी तरह से साफ़ होते हैं, लेकिन ज़ुबान तक पहुँचते-पहुँचते लड़खड़ा जाते हैं। स्कूल में यह लड़खड़ाहट अक्सर मज़ाक बन जाती है। बच्चे उसकी नकल करते हैं, अधूरे वाक्यों पर हँसते हैं। हर हँसी अनु के भीतर एक डर छोड़ जाती है। धीरे-धीरे उसने बोलना बिल्कुल कम कर दिया।

घर लौटकर वह खिड़की के पास बैठ जाती और सामने बहती नहर को देखती रहती। तेज़ बहता पानी उसे अजीब-सा सुकून देता था जैसे कोई उसकी ख़ामोशी को बिना सवाल किए समझ रहा हो।

अनु के पिता राघव भी पानी से जुड़े थे। सिंचाई विभाग में काम करने वाले राघव को लोग एक जिम्मेदार और साहसी व्यक्ति के रूप में जानते थे। एक रात, लगातार बारिश के बाद नहर उफान पर थी। गाँव वालों को सुरक्षित निकालते हुए वह खुद तेज़ बहाव में बह गए। वह हादसा एक परिवार की खुशियां चीन ले गया था।

उस दिन के बाद कविता एक पत्नी नहीं, सिर्फ़ माँ बनकर रह गई। उसने अपने दर्द को आवाज़ नहीं दी। आँसू अपने अंदर ही रखे और बेटी के सामने खुद को मज़बूत दिखाने की कोशिश की। समय पर उठना, अनु को स्कूल भेजना, घर संभालना सब कुछ जैसे सामान्य चलता रहा। अब इस घर की असली ताक़त थीं अनु की नानी सुलोचना। उन्होंने कभी अनु को कमज़ोर बच्चा नहीं कहा। उनका मानना था हर बच्चे की अपनी ख़ास पहचान होती है।

वह हमेशा कहती थी ,कोई शब्दों से बोलता है, कोई आँखों से, और कोई अपने मौन से। हर शाम नानी अनु को अपने पास बिठातीं। कभी उसके हाथ पर अक्षर बनातीं, कभी उसे चुपचाप अपने कंधे से लगाए रखतीं। अनु को वह हमेशा समझातीं ,अगर बोलना मुश्किल लगे, तो लिखते हुए बोलो अपने आप को स्वीकार करो। नानी जानती थीं जिस दिन अनु ने अपने आप को स्वीकार कर लिया उस दिन से वो कभी खुद को कमज़ोर और अकेला महसूस नहीं करेगी।

A happy mother giving her daughter a piggyback ride indoors.
Two hearts, one love, endless memories

एक बार स्कूल में अनु को एक छोटा सा डायलॉग बोलना था। एक रात पहले वह डर से सो नहीं पाई। शब्द उसे अच्छी तरह याद थे, लेकिन आत्मविश्वास जरा भी नहीं था। सुबह कविता ने बस इतना कहा बच्चा तू मंच पर बोले या न बोले, हमेशा मेरे लिए उतनी ही प्यारी रहेगी। तो वहीं नानी ने उसकी हथेली में एक छोटा काग़ज़ रखा। उस पर लिखा था डर से बड़ी कोई नदी नहीं, और हिम्मत से बड़ा कोई पुल नहीं। अनु स्टेज पर खड़ी थी, जहाँ चारों तरफ तेज़ रोशनी और ढेरों नज़रें मौजूद थीं। उसने बोलने की कोशिश की। शब्द फिर अटक गए। लेकिन इस बार वह रुकी नहीं।

उसने वही काग़ज़ निकाला और पढ़ने लगी। आवाज़ पूरी तरह साफ़ नहीं थी, लेकिन भाव सच्चे थे। हॉल में सन्नाटा छा गया ,ऐसा सन्नाटा, जिसमें मज़ाक नहीं, कुछ नाज़ुक से एहसास छुपे हुए थे। उस दिन अनु ने पूरा डायलाग नहीं बोला, लेकिन एक ख़ास बात हुई , उसने खुद को छोटा भी महसूस नहीं किया। शाम को वह फिर नहर के पास गई। पानी आज भी तेज़ बह रहा था, लेकिन अब डरावना नहीं लगा। उसके मन में माँ और नानी के कहे प्यार भरे शब्द गूंजने लगे। पहली बार उसने खुद से बिना रुके कहा, मैं जैसी हूँ, ठीक हूँ।

उत्तराखंड से ताल्लुक रखने वाली तरूणा ने 2020 में यूट्यूब चैनल के ज़रिए अपने करियर की शुरुआत की। इसके बाद इंडिया टीवी के लिए आर्टिकल्स लिखे और नीलेश मिश्रा की वेबसाइट पर कहानियाँ प्रकाशित हुईं। वर्तमान में देश की अग्रणी महिला पत्रिका...