प्यार की डोर – परिवार को जोड़े रखने वाली ताकत
यह कहानी बताती है कि बच्चों के लिए सबसे कीमती तोहफा माता-पिता का समय और प्यार होता है। छोटे-छोटे बदलाव रिश्तों में दूरियाँ मिटाकर परिवार को खुशियों से भर देते हैं।
Hindi Short Story: नैतिक और मिहिका भाई-बहन थे। घर में सबकुछ होते हुए भी उनके दिलों में एक खालीपन था। उनके माता-पिता, रजत और सीमा, कामकाज और व्यस्त दिनचर्या में इतने उलझे रहते कि बच्चों से बातचीत कम ही हो पाती। अक्सर खाने के वक़्त भी सिर्फ पढ़ाई की बातें होतीं। नतीजा यह हुआ कि बच्चों और माता-पिता के बीच दूरियाँ बढ़ने लगीं। नैतिक को लगता कि पापा को उसकी क्रिकेट प्रैक्टिस की कोई परवाह नहीं, मिहिका सोचती कि माँ को उसकी ड्रॉइंग या डांस में ज़रा भी रुचि नहीं है। रजत और सीमा को भी लगता कि बच्चे अब उनकी सुनते नहीं, बस मोबाइल और दोस्तों में ही खोए रहते हैं। धीरे-धीरे घर का माहौल बोझिल होने लगा।
एक दिन सीमा ने देखा कि मिहिका स्कूल से लौटकर सीधा कमरे में चली जाती है और घंटों अकेली रहती है। रजत ने भी गौर किया कि नैतिक ने उनसे अपने टूर्नामेंट की एक भी बात साझा नहीं की। दोनों को अचानक एहसास हुआ कि कहीं न कहीं गलती उनकी ही है। बच्चों को वक्त न देने और हमेशा डाँट-फटकार में उलझे रहने से रिश्तों में दरार आ गई है।
एक शाम नैतिक क्रिकेट मैच हारकर घर लौटा। वह बहुत उदास था और बिना कुछ कहे अपने कमरे में चला गया। नैतिक ने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया और आँसुओं को छुपाने की कोशिश की। सीमा ने धीरे से दरवाज़ा खटखटाया और कहा, बेटा, क्या मैं अंदर आ सकती हूँ? उसने धीमी आवाज़ में बोला, आ जाइए। सीमा और रजत दोनों अंदर आए। नैतिक की आँखें लाल थीं। उसने कहा, आप लोग कभी मेरा मैच देखने नहीं आते। जब मैं जीतता हूँ तो ताली बजाने वाला कोई अपना नहीं होता, और जब हारता हूँ तो हिम्मत बढ़ाने वाला भी कोई नहीं होता। तभी रजत ने नैतिक को गले से लगा लिया और कहा, अब से तुम्हारे हर मैच में हम तुम्हारे साथ होंगे।
उस रात रजत और सीमा ने फैसला किया कि अब वे बच्चों से सच में जुड़ने की कोशिश करेंगे। अगले दिन उन्होंने छोटे-छोटे बदलाव शुरू किए।
रजत ने नैतिक के साथ मैदान जाकर उसका क्रिकेट मैच देखा। शुरुआत में तो नैतिक चुप रहा और उसे लगा पापा और माँ बस उसे खुश करने के लिए एक या दो बार ही उसके मैच में साथ आएंगे । लेकिन जब उसने देखा कि पापा सच में उसके खेल में काफी दिलचस्पी ले रहे हैं, तो उसने खुद से रोज़ माँ और पापा के साथ खेल की बातें शुरू कर दीं। वहीं, सीमा ने मिहिका से कहा कि वह उसकी ड्रॉइंग देखना चाहती हैं। मिहिका पहले झिझकी, फिर धीरे-धीरे रंगों और पेंटिंग के बारे में बताने लगी।

धीरे-धीरे यह सिलसिला बढ़ता गया। अब रात का खाना टीवी के सामने नहीं, बल्कि सब मिलकर साथ में खाते और दिनभर की बातें शेयर करते। वीकेंड पर फैमिली टाइम तय हुआ—कभी पार्क में पिकनिक, कभी मूवी और कभी घर पर पेंटिंग वर्कशॉप या बोर्ड गेम्स।
नैतिक और मिहिका को लगा जैसे उनका घर बदल गया हो। जहाँ पहले खामोशी और तकरार थी, वहाँ अब हँसी और अपनापन था। बच्चों ने भी अपने माता-पिता से खुलकर बातें करना शुरू कर दीं। नैतिक ने पापा को अपने अगले मैच में कोच की तरह शामिल किया, और मिहिका ने माँ को अपने स्कूल के डांस शो की तैयारियों में साथ रखा।
एक दिन सब साथ बैठकर घर की बालकनी में चाय और पकौड़े खा रहे थे। तभी मिहिका मुस्कुराकर बोली, “अब लगता है हमारा घर सबसे अच्छा है, क्योंकि अब हम सब साथ हैं।”
यह सुनकर रजत और सीमा के दिल भर आए। उन्हें समझ आ गया कि बच्चों को सबसे बड़ी ज़रूरत किसी सुविधा की नहीं, बल्कि उनके साथ बिताए गए समय और प्यार की है।
आज नैतिक और मिहिका अपने माता-पिता के काफी करीब आ गए थे, अब उनका घर हँसी-खुशी से भरा हुआ प्यारा सा आशियाना बन चुका था।
