Funny Stories for Kids: सर्दियाँ शुरू हुईं तो निक्का को खेल में मजा आने लगा । वह रोज शाम को गोगा, मिंटू और सत्ते के साथ लच्छू बाबा के बगीचे में खेलने जाता । वहाँ सब लोग गेंद से खेलते । निक्का को भी गेंद से खेलना अच्छा लगता । पर कई बार गेंद उछलकर लच्छू बाबा के बगीचे की चहारदीवारी से बाहर चली जाती । तब बड़ी मुसीबत हो जाती । निक्का को मम्मी से गेंद के लि ए पैसे माँगने पड़ते । एक दिन निक्का ने मम्मी से कहा, “मम्मी …मम्मी , मुझे गेंद ला दो । नीली वाली…बस, नीली वाली ही लाना, जैसी गोगा के पास है ।”
मम्मी हसँ कर बोलीं, “ठीक है ला दूँगी । नीली वाली ही लाऊँगी ।” उसी शाम मम्मी निक्का के लि ए एक छोटी-सी, प्या री-सी नीली गेंद ले आईं । देखकर निक्का तो नाच उठा । घर में देर तक फर्श और दीवार पर टप्पे खिलाता रहा । फिर कुछ देर बाद वह बाहर भाग खड़ा हुआ । बाहर मैदान में गोगा, मिंटू और सत्ते उसका इंतजार कर रहे थे । साथ ही रवि , भोला और सोनू-मोनू भी थे । सब चि ल्ला ते हुए दौड़े, “गेंद आ गई, गेंद । निक्का की गेंद ।” फिर तो और बच्चे भी आकर जुट गए । देर रात तक खूब खेल जमा । कभी गेंदतड़ी , तो कभी पचगुट्टी । निक्का का मन भरता ही नहीं था । और बच्चे भी
जोश में थे ।…गेंद सबको नचा रही थी । पर गेंद के साथ उछलने-कूदने दौड़ने और नाचने का भी अपना आनंद था । गेंद फि रकनियाँ खाती तो बच्चे भी फिरकनी जैसे नाचने लगते । गेंद टप्पा खाती तो बच्चे भी ‘टप-टपाक-टप्पा ’ कहकर दौड़ते ।
अचानक खेलते-खेलते गेंद दूर नाले की तरफ चली गई । निक्का उसे पकड़ने तेजी से दौड़ा , मगर उसके देखते ही देखते लुढ़कते-लुढ़कते गेंद नाले में जा पड़ी ।
निक्का रोआसा हो गया । जोर से चि ल्ला या, “हाय, मेरी गेंद…!” वह घर आया तो मम्मी ने पूछा, “क्यों निक्का , परेशान क्यों है ? गेंद कहाँ गई ?” पर निक्का कुछ नहीं बोला । चुपचाप चारपाई पर पड़कर सो गया । मम्मी ने निक्का को दो-तीन बार जगाया, “निक्का , जरा एक फुलका खा ले बेटा ।…निक्का , जरा सा दूध पी ले ।” पर निक्का ने मना कर दिया । पूछने पर कहता, “भूख नहीं है मम्मी ।”
“क्या हुआ तेरी भूख को ?” मम्मी पूछतीं तो निक्का कहता, “पता नहीं मम्मी !”
पर मम्मी जानती थीं, निक्का को अपनी प्या री सी नीली गेंद खोने का बहुत ज़्यादा दुख है । पर भला वे इसमें क्या कर सकती थीं ? पूरी रात निक्का को गेंद के सपने आते रहे । खेलते-खेलते कभी गेंद झाड़ी के पीछे चली जाती, कभी तालाब में । निक्का ढूँढ़ता, मगर गेंद मिलती ही नहीं थी । पूरी रात वह इधर-उधर मारा फि रता रहा, रोता रहा…गेंद कभी मिलती, तो फिर गायब हो जाती । एक बार तो वह धौलूधारा पहाड़ पर रहने वाले आसमानी बाबा के बड़े-से झोले में घुस गई । फि र उड़ते-उड़ते फि रोजी तितली के बड़े से महल में जा पहुँची और दोनों में तेज दौड़ने का कंपिटीशन शुरू हो गया ।
फिर वह गेंद अचानक ऊपर की ओर उड़ी और उड़ते-उड़ते सातवें आसमान में चली गई । अब भला आसमान में कैसे जाए निक्का और कैसे लेकर आए अपनी प्या री नीली गेंद ?…
निक्का परेशान ।…अजब मुश्किल थी । अजब सपना । सपने में हकबकाया निक्का इधर-उधर दौड़ता हुआ अपनी नीली गेंद तलाश रहा था । पर गेंद थी कि मिलकर भी मि लती नहीं थी । कभी मि लती, कभी फिर खो जाती । जैसे निक्का से छुआछाई खेल रही हो ।
सुबह निक्का उठा तो बेहद उदास था । मम्मी ने उसके सि र पर हाथ फेरा, तो उसका बुरी तरह रोना छूट गया । रोते-रोते बोला, “मम्मी , मेरी गेंद…!” “क्या हुआ गेंद को ?” मम्मी ने प्या र से उसे पुचकारते हुए पूछा । “नाले में…! कल रात में मैं खेल रहा था तो नाले में चली गई । अब तो
मि लने से रही मम्मी ।”
निक्का की बात पूरी हो पाती, इससे पहले ही मम्मी हँस पड़ीं । बोली, “वो दखे सामने, शरूे ! उसके मुँह में क्या हैं ?”
“अरे-अरे मेरी गेंद ! देखूँ कहीं फट तो नहीं गई ।” निक्का दौड़ा और शरूे को पुचकारकर उससे अपनी गेंद ले ली । उसने जमीन पर टप्पा मारा, तो गेंद खूब उछली । “वाह ! गेंद तो ठीक है…एकदम बढ़िया !…शाबाश शेरू !” निक्का उछला और नाचने लगा । उसने शेरू को पुचकारा और बाहर खेलने भाग निकला ।
निक्का के पीछे-पीछे शेरू भी भागता चला गया । अब तो निक्का को खेल में एक नया साथी मि ल गया, शेरू ! जब-जब उसकी गेंद दरू चली जाती, शरूे मुहँ में लेकर उठा लाता । निक्का और उसके
साथी शेरू की इस अदा पर झूम उठते ।
ये कहानी ‘बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Bachchon Ki 51 Natkhat Kahaniyan बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ
