banjaare ka kutta
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Heart Touching Story: धन भाग धन घड़ी! लाखा और मेरी चौखट पर?’ हजारी ने लाखा को अपने घर पर आया देखकर आश्चर्य से कहा। ‘जिस के घर चार हाथ लम्बा और सुन्दर बेटा हो, उसकी चौखट पर तो बेटी वाला भगवान भी आने में गुरेज न करे, भाई।’ लाखा ने राम राम जी देते हुए कहा। ‘ओह लाखा, मैं तो भूल ही गया था कि बेटी फूलवती इतनी बड़ी हो गई है। लाखा, भाई आप मजाक तो नहीं कर रहे हो, मेरे जैसे माणस के साथ?’ हजारी ने जल का लोटा थमाते कहा।

‘जवान बेटी का बाप मखौल नहीं किया करता, हजारी। आज मैं अपनी बेटी का प्रस्ताव ले कर आया हूं।’ पानी पी कर लाखा ने कहा।

‘कहां लाखा बंजरा और कहां मैं हजारी…मखौल ही तो हुआ? हुक्के को लाखा की तरफ फेर कर हजारी ने कहा।

‘बिरादरी की बेटी तो बिरादरी के बेटे के संग ही फेरे लेती है, भाई हजारी।’ हूक्के की घूंट मार कर लाखा ने संजीदगी से कहा।

‘सौ हजार इकट्ठे होने से लाख बनता है जी…मैं तो पूरा एक हजार भी कहां हूं और थारे को तो पूरी बिरादरी ने लाखा बना रखा है बाकी के निन्यानवे कहां से आए? रिश्ते नाते तो बराबर वालों से ही निभते हैं। कहां जार्ज पंजम के ताज वाला खनखनाता रुपया और कहां डबली पैसा, लाखा जी? हजारी ने ऊपरी मन से कहा।

मैं तेरी तिजोरी के साथ रिश्ता जोड़ने नहीं आया, भाई तेरा छोरा ही लाखों में एक है। बाकी निन्यानवे को वह पूरे करके तेरे को भी लाखा बना रहा है। लाखा वणज करता है। अगर घाटे का सौदा होता तो मैं यहां झांकता भी नहीं। सारी बातें परख परख कर ही तो आया होगा लाखा बंजारा?’ लाखा ने अपनी कमजोरी उजागर कर दी।

‘यह बात है तो मखौल वाले हाथों से बाहर हो कर बात करूं, लाखा जी?’ हजारी ने थोड़ा खुलासा कर कहा।

‘क्यूं नहीं। रिश्ता जोड़ते समय तो खुलकर ही बात होनी चाहिये। वरना रिश्ते का आधार कमजोर रहता है जो आगे चलकर रिश्ते में दरार डाल देता है।’ लाखा बोला।

‘तो बोलो।’ हजार ने खुश होकर कहा। जो मेरा है वह सब कुछ उसका है। लाखा ने खुलासा किया।

‘लाखा, एक हजार फिर सोच लो। दिया हुआ वचन निभाना बड़ा कठिन हुआ करता है। मैं नहीं चाहता कि तुम मेरे द्वार पर आकर परेशानी में पड़ो।’ हजारी ने लाखा का मन टटोला।

‘लाखा तो वचन निभाने के कारण ही लाखा बना है। लाखा वचन भी सोच कर देता है। और भला अपनी लाड़ली के लिए लाखा क्या लोभ करेगा? जो मेरा है वह सब कुछ तो उसका है। लाखा ने ऊंची आवाज में कहा।

‘तो पीओ हमारे बेटे के हाथ से दूध का बखोरा।’ हजारी ने प्रस्ताव मानते हुए कहा।

‘आया ही इस वास्ते हूं भाई दूध पी कर ही चलूंगा।’ लाखा कह कर हंसा और साथ खड़े लड़के के हाथ से दूध पकड़ कर पीने को हुआ।

‘चलन को मत भूलो लाखा जी, दूध पीने से पहले लड़के को पुचकारना होता है। हजारी कहकर खिलखिलाया।

‘चलन भी निभाऊंगा-पहले बखोरा तो ठीक से थामलूं। लो रख दिया सिर पर हाथ।’ लड़के के सिर पर हाथ रखकर लाखा ने ठहाका लगाया।

‘तो टीके पर अपना कुत्ता ही भेज देना और कुछ नहीं।‘हजारी ने संजीदगी से कह दिया।

‘और कौन है फूलवती का टीका लाने वाला- हमारा शेरू ही तो उसका भाई है। वही तो टीका लेकर आएगा।’ कहकर लाखा ने फिर ठहाका मारा।

‘लाखा जी, फिर शेरू वापिस नहीं जायेगा हमारा हो जायेगा, कहकर हजारी ने लाखा पर बज्रपात कर दिया।

‘भाई भी कभी बहन के घर रहता है? मखौल छोड़, ठोस बात कर।’ लाखा ने बड़ी संजीदगी दिखाई।

‘लाखा जी, हमारी तो यही ठोस है शेरू हमारा हो जायेगा।’ कहकर हजारी ने जमीन पर आंखें गाड़ लीं।

‘हजारी, शेरू मेरी दौलत नहीं है भाई, मेरा बेटा है लाखा ने कहना चाहा।

‘तो फिर शेरू को छोड़ कर बाकी सब कुछ भेज देना।’ हजारी ने फिर बिजली गिरा दी।

लाखा बंजारा था जो बणज करें जिनसों को एक स्थान से मोल लेकर दूसरे स्थान पर बेच दें लाखा उसका नाम नहीं था- बिरादरी द्वारा ही उपाधि थी क्योंकि उसके पास लाख रुपये थे। सिक्का भी जार्ज पंजम के ताजवाला शुद्ध चांदी का था। इससे बढ़कर उसके पास एक और दौलत थी – उसका शेरू। शेरू नाम उसके पालतू कुत्ते का था। ये शेरू दूर दूर तक मशहूर था। बल्कि लाखा को लोग ‘शेरू आला बंजारा’ से ही जानते थे।

लाखा उस समय होगा कोई 16 बरस का। मां बाप अगले लोक जा चुके थे। लाखा एक साधारण बंजारे के घर जन्मा था। बाप का अपना बणज नहीं था। किसी दूसरे बिरादरी भाई के काम में हाथ बंटाता था। यही काम लाखा करने लगा था। ऐसे लोगों को बंजारा बिरादरी किसी भी गिनती में नहीं रखती थी। इसलिये लाखा भी किसी गिनती में नहीं था।

पोष का महीना था। सर्दी अपने पूरे गुस्से में थी। लाखा अपने मालिक की जिनस को 20 गधों पर लाद कर एक वन से गुजर रहा था। सूर्य उदय में अभी 3 घंटे बाकी थे- एक पहर का तड़का था। रास्ते में पड़े कुत्ते के एक छोटे से पिल्ले को गधे की लात लगी तो वह बिलखने लगा। लाखा ने पिल्ले को उठा कर अपनी ओठी चादर के भीतर गोद में दुबका लिया पिल्ले को गर्मी तो मिली ही थी परन्तु लाखा के दुलार ने उसे शान्त कर दिया। परन्तु लाखा स्वयं अशान्त हो गया। वह चलता चलता सोचता रहा ये इतना छोटा, इतनी सर्दी में अपनी मां से बिछुड़ कर इतनी दूर रास्ते पर क्यूं आया बियाबान में? यही विचारते आठ कोस का रास्ता तय हो गया। भठयारी की सराय आ गई। वहां काफिला रुका। वहां से गर्म दूध लेकर पिल्ले को पिलाया। दूध पी कर ऐसा लगा जैसे पिल्ला कह रहा हो। मुझे मत त्यागना। भठयारी ने लाख समझाया लाखा को-इसे यही पटक जा- कहां उठाए फिरेगा। परन्तु लाखा ने तो पिल्ले की आत्मा की आवाज सुन ली थी सुनी ही नहीं बल्कि अपनी आत्मा में बैठा लिया था। पिल्ला सदा के लिए उसका हो गया और वह भी पिल्ले का हो गया। लाखा के मालिक ने पिल्ले को साथ-साथ रखना अपने काम में बाधा जान कर उसे फेंक देने की सलाह बार-बार दी गई। परन्तु लाखा ने साफ कर दिया – चाहो तो आप मेरे को फैंक दो। मगर मैं इस को कतई नहीं फैकूंगा। हां एक बात जरूर हुई कि उस खेप में मालिक को आशा से दोगुणा लाभ हुआ था। यह विचार आने पर मालिक ने पिल्ला त्यागने का जिक्र तक नहीं किया। ज्यों-ज्यों पिल्ले को लाखा के साथ रहते समय बीतता गया। मालिक का व्यापार चमकता गया। व्यापार की बढ़ोत्तरी ने लाखा की तन्खा में भी बढ़ोतरी करा दी। कुछ समय बीत जाने पर मालिक ने उसे व्यापार में

आधे का साझा बना लिया। कुछ बरसों के बाद लाखा ने अपना व्यापार शुरू कर दिया। व्यापार की सफलता ने ही बंजारा बिरादरी ने उसे लाखा की उपाधि प्रदान कर दी।

लोगों का ऐसा मानना था कि यह सब इस कुत्ते के कारण घट रहा है। पिल्ले के भीतर कोई देवता वास कर रहा है तथा उसी देवता के आशीर्वाद के कारण लाखा फलफूल रहा है। पिल्ला शेरू कहलाने लगा था। शेरू कमाल का समझदार था। अपनी समझदारी के कारण ‘बंजारे का कुत्ता’ दूर-दूर तक जाना जाने लगा था। लाखा व शेरू एक जान हो चुके थे। लाखा ने समधी को शेरू देने की बजाय अपना सारा धन देना स्वीकारना इस बात का मुंह बोलता सबूत तो है। इस घटना ने तो इस मानव व पशु की जोड़ी को पचास कोस के क्षेत्र में सराहा जाने लगा था। पशु के लिये इतना बड़ा त्याग। बात सुन कर ही लोग आश्चर्य चकित हो जाते थे।

लाखा फिर खाका बन गया था। सभी को भरोसा था कि अपने कुत्ते के कारण खाका फिर लाखा बन जायेगा। स्वयं लाखा ने भी आशा का दामन नहीं छोड़ा था। परन्तु कन्धे पर उठाने वाले पहलवान को एड़ी कैसे लगा सकता है। पैर तो हवा में लटके हैं। व्यापार के लिये पूंजी चाहिए। जिस आदमी ने काबुल की किशमिश का, तेहरान के छुवाहरों का तथा जावा के गोला गिरी का थोक व्यापार किया हो वह भला क्या अब लटकण पहोचीयां बेचेगा? इतनी बड़ी रकम कहां से आए? उधार कौन दें? गिरवी धरने को भी लाखा के पास कुछ नहीं था। दो रात लाखा को नींद नहीं आई। विचारों में ही चारपाई पर करवटें बदलता रहा। शेरू ने मालिक का हाल भांप लिया। वह मालिक की चारपाई के पास आया तो मालिक के दिमाग में बिजली सी कौंधी। ‘उसे ऐसा लगा जैसे शेरू कह रहा है मालिक मैं हूं न। फिर चिंता कैसी, मेरे को गिरवी रख कर धन

उधार ले लो और लग जाओ पहले की तरह बणज करने।

भला, मालिक इस विचार को कैसे मानता? उसे तो क्रोध आया और शेरू को प्यार का थप्पड़ मारते कहा ‘तू मुझे क्यों नरक में धकेलने की सलाह दे रहा है। कोई बेटे को भी गिरवी रखा करता है क्या?’ ऐसे विचार को ही छदम दर्जे की गिरावट समझा लाखा ने। परन्तु पशु इसे अपना धर्म समझ कर अपने प्रस्ताव पर अड़ गया क्या बुरे समय पर मालिक को सहयोग देना हर प्राणी का दायित्व नहीं? अन्नजल त्याग कर पड़ा रहा। पूरे चार दिन बीत गए। अब लाखा क्या करें? शेरू की चिन्ता उसे खाए जा रही थी। रात को चारपाई पर पड़ा पड़ा इसी विचार में घिरा था। आधी रात को उसके मस्तिष्क में फिर बिजली कौंधी, रे मूर्ख ये मर गया तो त क्या कर लेगा। गिरवी सामान तू को तो धन वापिस करके वापिस लिया जा सकता है। ये आखिरी मौका है धन लो और अपना व्यापार करो शेरू की बात मान लो।

शेरू बीस कोस दूर भूमणशाह की हवेली पर रहने लगा। सौ रुपये के बदले। जब लाखा रूपये लेकर चला था तो शेरू की तरफ देख कर कहा था। बेटा मेरी आबरू का ख्याल रखना। नए मालिक का वफादार रहना। देखना मेरी नाक मत कटवा देना। बेटे ने भी हां में सिर हिला कर बाप की तसल्ली कर दी थी। फिर दोनों ने एक दूसरे से आंखें बंद कर ली थीं। यह एक ऐसा क्षण था जो किसी दुश्मन की जिन्दगी में भी न आए। दौलत में खेलता बन्दा अपने दिल के टुकड़े को किसी अनजान को देकर विदा हो रहा था। कितना उद्वेलित होगा वह बाप जिसने इस प्राणी को अपनी सारी दौलत के बदले देना भी नहीं स्वीकारा था और आज केवल सौ रुपये उसकी लाखों की दौलत से भी ज्यादा वजनदार हो गए थे।

बाप बेटे से जुदा हुए एक बरस बीत गया था। बरस नहीं यह तो पूरा युग था। शायद ही कोई रात होगी जब सोते समय बाप को बेटा और बेटे को बाप की याद न आई हो। ये कैसी मजबूरी कि ऐसे दो प्राणी जिनके प्राण एक हो गए हों इतने दिनों से एक दूसरे से दूर रह रहे थे। बाप अपना सारा तुजर्बा धन कमाने में लगा रहा था ताकि जल्दी से जल्दी बेटे को छुड़वा ले और बेटे को पल पल यह चिन्ता सता रही थी कि कहीं उसके आचरण से बाप के नाम को बट्टा न लग जाये। नये मालिक की वफादारी ही उस का लक्ष्य बन गया था। इस किस्से की चर्चा दूर-दूर तक होने लगी थी। बंजारा और उसका चमत्कारी कुत्ता हर गांव में हूक्के पर बैठे लोगों की बात बन गया था। लोग इसे पिछले जन्मों का रिश्ता मान कर इस जन्म में वफादारी से निभाने का ईष्वरीय आदेश मानते थे।

लाखा ने कर्ज लेने के दो महीने बाद ही हर महीने दस रुपये बचा कर शेरू के खाते में जमा करना शुरू कर दिया था। अब तक पूरे 90 रुपये जमा हो गए थे। बस अगले महीने ही शेरू फिर से उसका हो जायेगा। सोचना मात्र ही लाखा को वह खुशी प्रदान करता था जो सारी दुनिया का सारा धन भी दे सकने में असमर्थ था। इतने दिनों से एक दूसरे को दूर से भी नहीं देखा था। जो माणस बलख व बुखारा को दूर नहीं समझता था। वह बीस कोस पर, झूमण शाह की हवेली को बहुत ही दूर समझ कर अपने मन की परीक्षा लेने से बचता रहा। ये न हो की बेटे को देख कर ‘बाप’ या बेटे में वचन पर डटे रहने में कहीं कमजोरी आ जाये। भला बेवफाई बर्दाश्त कैसे हो? ऐसा हो जाने से तो सारा खेल ही बिगड़ जाये।

आप सोचिये कि जब दो प्राणी इस जुदाई का एक एक पल गिन गिन कर काट रहे हों, उनका ये एक वर्ष कैसे बीता होगा। अब तो मंजिल नजदीक थी। अगले महीने शेरू अपने मालिक के पास होगा। वे फिर से दोनों साथ साथ रहेंगे। भूमणशाह का कर्जा चुकता कर के जब शेरू घर लाया जायेगा तब बड़ी दावत होगी। दावत में बंजारा बिरादरी के सारे लाखा आएंगे हजारी जिसके कारण उनकी यह गत हुई है, भी तो आएगा। हां भूमण शाह भी दावत में आएगा। कितनी शाबाशी मिलेगी शेरू को इस बहादुर व समझदार बेटे ने बाप को विपत्ति से उभार लिया सभी की जबान पर होगा।

भूमणशाह इलाके का बड़ा सेठ था। शेरू के आ जाने से उसके धन में भारी बढ़ोत्तरी हुई। इस खुशी में परिवार को साथ लेकर हरिद्वार की हर की पौड़ी में स्नान करने सावन की पूर्णिमा को चला गया। जब मियां घर नहीं, हमें किसी का डर नहीं वाली कहावत भूमणशाह के नौकरों ने पूरी कर दी। सारे के सारे घोड़े बेच कर सोने लगे थे। मगर शेरू तो शेरू था सारी रात भौंकता भौंकता हवेली का चक्कर काटता रहता। शेरू का इस तरह भौंकना पहरेदारों को रास नहीं आ रहा था। नींद हां मीठी नींद में खलल जो पड़ता था। आवश्यकता ईजाद की जननी होती है। शेरू के भौंकने का भी हल ढूंढ लिया। शाम को पहरेदार ने शेरू को अपने पास बुला कर बहुत ही लाड़प्यार दिखाते, उसको नशे की गोली खिला दी। ऐसा करने से शेरू का भौंकना बंद और चौकीदार के खर्राटे शुरू। अगली ही रात, इस परिस्थिति का लाभ उठा कर चोर हवेली में घुस गए। शेरू ने लाख भौंकना चाहा मगर भौंक नहीं सका। वह चुपके से एक चोर के पास गया और उसकी टांग को काटने का प्रयत्न किया मगर उस का मुंह ही ठीक ढंग से नहीं खुला। अब शेरू करे तो क्या करें? वह सोते हुए पहरेदार की तरफ भागा और अपने पंजों से काम लेकर उसे जगाया। पहरेदार की मीठी नींद भंग हो जाने के कारण इतना क्रोधित हुआ कि अपनी लाठी का भरपूर वार शेरू पर कर दिया। वह बेहोश होकर चित्त पड़ गया। जब उसे होश आया तब तक चोर अपना काम पूरा करके चल दिये थे। शेरू, लंगड़ाता लंगड़ाता छिपता छिपाता चोरों के पीछे हो लिया। चोरों ने बियाबान में जा कर सारा धन एक भारी वृक्ष के नीचे गाड़ दिया तथा अपने अपने ठिकानों को चले गए।

जब तक शेरू हवेली वापिस पहुंचा तब तक भूमणशाह भी वापिस लौट गया था। जब सेठ ने अपने को पूरी तरह से लुटा पाया तो दोनों हाथ माथा पकड़कर बैठ गया। अब तक शेरू को नशे का असर बेअसर हो चुका था। वह आगे बढ़ा और साहूकार की धोती पकड़ कर खेंचने लगा। सेठ कुत्ते का इशारा समझ गया। नौकरों को साथ लेकर शेरू के पीछे-पीछे हो लिया। यह तमाशा देख कर दूसरे लोग भी साथ चल पड़े। जंगल तक पहुंचते पहुंचते वहां बड़ी भीड़ जुड़ गई। शेरू ने अपने पंजों से धन छिपे स्थान को कुरदेना शुरू कर दिया। फिर तो दूसरे लोग भी वहीं खुदाई करने लग गए। जब सारा धन वहां पर गढ़ा मिला तो सबके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। भूमणशाह ने शेरू को गोद में बैठा लिया और उसके मुखड़े को चूम-चूम कर जोर से बोला वाह शेरू बचा लिया। मुझे मेरा रोम-रोम तेरा ऋणी रहेगा। आज से तू आजाद सीधा अपने मालिक के पास जा कर यह खुशखबरी दे दे। उसे अपनी गोद से उतारने से पहले उसके गले में एक सोने की चैन डाली और चेन में कागज पर लिख दिया। मेरा कर्जा पूरा हो गया शेरू अब आजाद है।

शेरू झूमता व इठलाता अपने मालिक की तरफ दौड़ पड़ा उधर मालिक सौ रुपये की न्योली सील कर अपनी कमर के साथ बांध, किराये के रथ पर सवार हो कर अपने शेरू को आजाद कराने चल पड़ा था। वह रथवान को रथ तेज भगाने की रट लगा रहा था। वैसे उसका मन भूमणशाह की हवेली के कई चक्कर लगा आया था मगर बैल तो बैल थे अपनी चाल ही तो चल सकते थे। उस का मन जल्दी से जल्दी शेरू से लिपटने को मचल रहा था। अगर लाखा का कोई बेटा होता तो क्या वह शेरू वाला काम कर सकता था। शेरू के कारण वह लाखा बना शेरू के कारण उसे कर्ज मिला फिर से बंजारा बना।

शेरू न होता तो कैसा बणज और कैसा लाखा। ऐसी दावत दूंगा कि बंजारा बिरादरी की सात पीढ़ियां याद रखेंगी। शेरू का नाम दुनिया में गुंजेगा।

इन्हीं विचारों में लाखा भूमणशाह की हवेली तक की मंजिल की तरफ बढ़ता जा रहा था। अचानक उस की तन्द्रा टूटी। उसने सामने जो देखा उसे देख कर अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। उसने अपनी आंखों पर कई बार हाथ फेरा मगर सामने का दृश्य भरोसे के लायक था ही नहीं। सामने से शेरू आ रहा था। यह देख कर लाखा के तनबदन में आग लग गई। रथ से नीचे छलांग लगा कर अपनी लाठी को पना कर शेरू की तरफ लपका। वह क्रोध के कारण अपना मानसिक संतुलन खो बैठा था। उसके मुख से निकला कटवा दी मेरी नाक आँखिर है तो पशु ना। खाक में मिला दी मेरी भगती। आंखे बंद करके शेरू पर टूट पड़ा। शेरू चौथावार नहीं झेल सका। उसके पैर आसमान की तरफ हो गए। प्राण पखेरू उड़ गए। मगर उसकी मुख मुद्रा बयान कर रही थी। मालिक ये तुमने क्या किया। हां तुम्हारे कहे अनुसार वफादारी निभा कर ही तुम से विदा हो रहा हूं।

जब बंजारे का क्रोध सातवें आसमान से धरती पर लौटा तो बेटे के गले में बंधा रुक्का पढ़ कर बरबस उसके मुंह से निकला-हाए, बेटा मैंने ये क्या किया।

लाखा 12 बरस जीया जरूर मगर उठते बैठते सोते जागते पश्चाताप का भारी बोझ ढोता रहा। हाए, बेटा मैंने क्या किया, हर सांस के साथ निकला। और आखिरी सांस पर भी निकला-हाए, बेटा, मैंने ये क्या किया। भूमणशाह ने सागवन – वही स्थान जहां शेरू ने अन्तिम सांस ली थी, उसे शाही सम्मान के साथ दफना दिया और समाधि बनवा दी। माघशुदी दसमी को वहां बड़ा मेला लगता है। भूमणशाह की पांचवी पीढ़ी समाधि पर माथा टेकने आती है। लोग इसे बफादारी का किस्सा बयाँ करते नहीं थकते।

ये कहानी ‘दिल को छू लेने वाली कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंDil Ko Chhoo Lene Wali Kahaniyan (दिल को छू लेने वाली कहानियाँ)