Atrangi Mahilao ka Satrangi Suchna
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Hindi Vyangya: नकी दुनिया में बहू पर शक, सास पर अविश्वास, पर बाबामौलाना पर पूर्ण विश्वास की वारंटी होती है, जो ‘पाप और दु:ख दूर’ करने के नाम पर पर्स से पैसा दूर कर देते हैं।

अतरंगी स्त्रियों का भी अपना एक अनोखा देश-दुनिया होता है। इन्हें ससुर, पति, जेठ, देवर या
ननदोई से कभी कोई शिकायत नहीं होती। शिकायत होती है तो सिर्फ स्त्रियों से! बेचारी जब बहू बनती हैं, तो अच्छी सास नहीं मिलती। जब सास बनती हैं, तो अच्छी बहू नहीं मिलती। ननद बनें तो आदर्श भाभी दुर्लभ और भाभी बन जाएं तो सुयोग्य ननद का सौभाग्य नहीं मिलता।
भूमिका बदलती जाती है, शिकायत स्थिर रहती है।
अतरंगी स्त्रियां सचमुच बहुत भोली होती हैं। इतनी भोली कि अगर कोई बाबा जी कह दे- ‘बेटी, तेरे दुखों का कारण शनि नहीं, तेरी सास है।’ तो अगले ही दिन सास के दरवाजे पर लाल धागा बांधकर
नींबू-मिर्च का झूमर लटका दें! इनकी दुनिया में बहू पर शक, सास पर अविश्वास, पर बाबा-मौलाना पर पूर्ण विश्वास की वारंटी होती है, जो ‘पाप और दु:ख दूर’ करने के नाम पर पर्स से पैसा दूर कर देते हैं।
अतरंगी नारियां भले ही चारदीवारी में बंधी रहें, पर इनका सूचनातंत्र दुनिया की तेजतम एजेंसियों को चुनौती दे सकता है। मोसाद और नारद मुनि के सूचना तंत्र से भी तीव्र। रोटी भले ही थोड़ी कम फुलाएं, पर खबरें इतनी फुला देती हैं कि पूरा मोहल्ला अफवाहों से तपा रहता है। भोजन में नमक-मिर्च देना भले भूल जाएंगी, बातों में नमक-मिर्च लगाना कभी नहीं भूल सकती। किसके घर कौन आया, कौन गया, किसकी बिजली कटी, किसका टिकट कटा, किसने किससे फोन पर कितनी देर बात की, किसका किससे टांका लगा, बिना मोबाइल डाटा अथवा बिना 5जी नेटवर्क के ये सारी
‘लाइव अपडेट’ इनके 1250 ग्राम के मस्तिष्क में सुरक्षित रहती हैं। अतरंगी स्त्रियों की नेटवर्क-कनेक्टिविटी इतनी मजबूत है कि रेल, बस, सत्संग, शॉपिंग मॉल, मंदिर आदि हर जगह अपनी
जैसी किसी मासूम अतरंगी स्त्री को ढूंढ़ ही लेती हैं।

इनके लिए मंदिर अथवा धार्मिक सत्संग सिर्फ आस्था केंद्र नहीं पूरे इलाके की सूचना-एजेंसी होता है। जहां तिलक से ज्यादा ‘टिप्पड़ियों’ लगती हैं। मुंह पर भले ही ‘बाल कांड, सुंदर काण्ड’ हो, पर मन में
संपूर्ण मुहल्ला कांड बसा होता है। धार्मिक सत्संगों के दौरान इधर मंच से कथा वाचक का प्रवचन शुरू हुआ नहीं कि, उधर पंडाल के अंदर इनका पर-निंदा पुराण प्रारंभ हो जाता है। ऐसे आयोजनों में अतरंगी स्त्रियों द्वारा शिव-पार्वती के परिवार का सजीव चित्रण से ज्यादा शर्माइन, गुप्ताइन और
मिश्राइन की बहुओं का चरित्र-चित्रण मन से किया जाता है। तालियां कम बजती हैं, दूसरों की बहू-बेटियों की ‘खबरें’ ज्यादा बजती हैं। औसत बुद्धि वाले प्राणी इसे ‘चुगली’ कह सकते हैं, लेकिन ये इसे
‘सूचना अदान-प्रदान’ का पवित्र कार्य मानती हैं।

मंदिरों में इनके मुख से ‘जय-जयकार’ कम, ‘अरे बहन, फलां की बहू के बारे में सुना आपने?’ ज्यादा सुनाई देता है। धार्मिक प्रवचन समाप्त होते ही इनका सामाजिक गपशप ‘खैर छोड़िए, हमें क्या!’, ‘आप तो जानती हैं, हमें आदत नहीं इधर का बात उधर करने की।’ ‘कसम है आपको, किसी से कहिएगा नहीं!’ आदि पवित्र और मर्यादित वाक्यों के साथ पूर्ण होता है। अंतत: मुख पर ‘राम-राम’ और मस्तिष्क में ‘पड़ोसन-वृतांत’ लिए ये अपने-अपने घर को प्रस्थान करती हैं। बहरहाल ऐसे आयोजनों में अतरंगी स्त्रियों को धार्मिक ज्ञान मिले न मिले, किंतु गारंटी है कि मोहल्ले की कम से कम तीन नई
खबरें अथवा लोकल करेंट अफेयर्स साथ लेकर ही अपने घर वापस लौटती हैं।

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