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Heart Touching Story: एक बार सम्राट अकबर ने अपने नवरंग संगीत सम्राट तानसेन से कहा – ‘तानसेन, तुम अपने गुरु स्वामी हरिदास का बहुत गुणगान करते हो, किसी दिन हमें भी उनसे मिलवाओ।’

तानसेन ने कहा – ‘जहांपनाह, आप उनसे भेंट करके क्या करेंगे।’ अकबर ने अधिक हट की तो एक दिन दोनों स्वामीजी के पास पहुंचे। स्वामीजी कुटिया के बाहर भजन-पूजन में तल्लीन थे। अब स्वामीजी पूजा से उठे तो बादशाह ने कहा – ‘स्वामीजी, तानसेन के मुख से आपकी चर्चा सुनकर आपके दर्शन की इच्छा से मिलने चला आया। यह एक तुच्छ भेंट लाया हूं, स्वीकार करेें।’ अकबर ने इत्र की एक शीशी भेंट करनी चाही।

स्वामीजी ने उत्तर दिया – ‘हम तो साधु हैं, हमें इन चीजों से क्या लेना? हम तो लल्ला (भगवान कृष्ण) की भक्ति करते हैं।’ यह कहते हुए स्वामी जी ने शीशी वहीं जमीन पर उलट दी। अकबर को क्रोध आया और आश्चर्य भी हुआ, लेकिन शांत रहे और तानसेन के साथ वापस आ गये। लौटते समय तानसेन ने लल्ला के मंदिर के दर्शन की इच्छा की। जैसे ही उन दोनों ने मंदिर के प्रांगण में कदम रखा उसी इत्र की महक से सारा वातावरण महका हुआ था। लल्ला की मूर्ति के कपड़ों से इत्र की बूंद भी टपक रही थी। बादशाह अकबर स्वामी हरिदास जी के प्रति नतमस्तक हो गये।

ये कहानी ‘दिल को छू लेने वाली कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंDil Ko Chhoo Lene Wali Kahaniyan (दिल को छू लेने वाली कहानियाँ)