होली-दहन के लिए शास्त्रों में जो विधि बतलायी गयी है, उसके अनुसार इस कार्य के लिए अग्नि, सूतिका-गृह या किसी चांडाल के घर से लाई जानी चाहिए। इसके बाद अगले दिन किसी चांडाल का स्पर्श करना, प्राचीन ग्रंथों में अत्यन्त शुभ माना गया है। भविष्य-पुराण के अनुसार प्राचीन युग में होली के दिन यज्ञ संपन्न करके वेदज्ञ ब्राह्मण, नट और नर्तकियों के आपसी हंसी-मजाक का आनन्द लिया करते थे। प्राचीन मान्यता के अनुसार हास्य-वार्ता, घूलि-वंदन तथा अछूत-स्पर्श के अभाव में होली पर्व अधूरा रह जाता है।

मानवीय समानता तथा मस्ती भरे होली के पर्व ने अन्य धर्मावलम्बियों को भी बेहद आकर्षित और प्रभावित किया, जिससे वे लोग भी इसके रंगों में रच गए। कुछ ने दूर से इसका आनन्द लिया तो कुछ इसके फुहारों में कूदकर मस्ती के आलम में खो गए। अनेक मुसलमान बादशाह भी होली के दीवाने रहें। मुगल काल में अकबर के शासन के समय होली ने राजमहलों में प्रवेश किया और उसके बाद यदि औरंगजेब को अपवाद के रूप में छोड़ दें तो संपूर्ण मुगल शासनकाल में होली बड़े उत्साह के साथ राजमहलों में मनाई जाती रही।

आगरा के लालकिले में जोधाबाई के महल के सामने पत्थर का एक बहुत बड़ा कुंड है। जहांगीर के जन्म के समय इसे सम्राट अकबर ने बनवाया था। होली के दिन इसी कुंड में रंग घोला जाता था और अकबर अपने परिजनों तथा महल में रहने वाले अन्य सभी लोगों के साथ होली खेलता था। राजदरबार में भी होली का माहौल रहता था। इस दिन जमकर रंग भरी पिचकारियां छलकतीं, इत्र-सुगन्ध बिखरता और उड़ता हुआ गुलाल संपूर्ण वातावरण को रंगीला बना देता।

जहांगीर द्वारा मनाई जाने वाली होली का विस्तृत विवरण हमें ‘तजुक-ए-जहांगिरी’ नामक ग्रन्थ में पढ़ने को मिलता है। एक समकालीन चित्रकार अबुल हसन द्वारा बनाए गए एक चित्र में भी जहांगीर और नूरजहां को होली का आनन्द लेते हुए दिखलाया गया है। यह चित्र लंदन के पुस्तकालय में रखा हुआ है। रंग और गुलाल के अतिरिक्त होली के दिन नृत्य और गायन के कार्यक्रम भी खूब जमते थे।

शाहजहां भी होली की मस्ती में पूरी रुचि लेता और रंग और गुलाल के साथ पूरे उत्साह से उसमें भाग लेता। इस दिन अनेक सामन्त और राजा आगरा के किले में आते और बादशाह के साथ होली खेलते। पीपल मंडी से महाराज जसवन्त सिंह का जुलूस चलता और जयसिंहपुरा से राजा जयसिंह का जुलूस किले की तरफ बढ़ता। रास्ते में सभी हिन्दू-मुसलमानों के साथ होली खेलते और अठखेलियां करते हुए जब ये जुलूस किले के अन्दर प्रवेश करते तो रंग और गुलाल से इनका स्वागत किया जाता। स्वयं शाहजहां भी इसमें शामिल होता। तानसेन का दामाद लाल खां इस अवसर पर होली गाता और उस समय की प्रसिद्ध नर्तकी ‘किन्नरी’ नृत्य करती। लोग मस्ती में वाह-वाह करके झूम उठते।

मुहम्मद शाह रंगीला ने होली को नई चमक-दमक दी। वह चांदी की पिचकारी से होली खेलता और चांदी की तश्तरी में गुलाल रखकर दूसरों पर फेंकता। उसके साथ होली खेलने मे बेगमों और दासियों के अतिरिक्त अन्य परिजन और दरबारी भी भाग लेते।

मुगल शासन काल में होली के अवसर पर मनोरंजन के अन्य अनेक कार्यक्रम भी जनता द्वारा आयोजित किए जाते थे, जिनमें स्वांग का विशेष स्थान था। इन स्वांगों में शासन के विभिन्न अधिकारियों, यहां तक कि स्वयं बादशाह का भी मजाक बनाया जाता था। लेकिन इन सब बातों का बुरा नहीं माना जाता था। इस दिन हंसी-मजाक की पूरी छूट थी। किसी भी प्रकार का नशा करने पर अवश्य प्रतिबन्ध रहता था। कोई भी व्यक्ति नशा करके होली नहीं खेल सकता था।

होली के शौकीनों में नवाब वाजिद अली शाह का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उनके यहां फूलों से तैयार किए गए रंगों से होली खेली जाती और गुलाब-जल तथा इत्र के फव्वारे निरंतर चलते रहते, जिससे संपूर्ण वातावरण सुगन्ध से महकता रहता।

मुगल शासन काल के अंतिम बादशाह, बहादुरशाह जफर शायर थे और होली के दीवाने भी। अंग्रेजों द्वारा डाली जाने वाली अनेक बाधाओं के बावजूद, बहादुरशाह जफर बड़े उत्साह और आत्मीयता के साथ होली मनाते और उसमें हिन्दू-मुसलमान सभी, बिना किसी साम्प्रदायिक भेदभाव के बड़े उत्साह के साथ शामिल होते। बहादुरशाह जफर ने होली पर बृज भाषा में अनेक गीत भी लिखे। ऐसे ही गीत का एक अंश यहां प्रस्तुत है-

क्यों मो पै रंग की मारी पिचकारी

देखों कुंवर जी दूंगी मैं गारी।

बहुत दिनन में हाथ लगे हो

कैसे जाने दूं

मैं पगवा तो सौं हाथ पकड़ कर लूं। 

बहादुरशाह जफर प्रबल राष्ट्रभक्त और 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के सर्वोच्च सेनापति भी थे। देश की दुर्दशा से वे बेहद दुखी थे। इसी दुर्दशा का वर्णन उन्होंने होली की पृष्ठभूमि पर इन शब्दों में किया-

हिन्द में कैसी फाग मुचोरी जोराजोरी।

फूल का तख्त हिन्द बना था

केसर की सी क्यारी।

कैसो फूटो भाग्य हमारे

लुट गयी जान हमारी॥

लुट गयी सब फुलवारी॥

गोलन के गुलाल बनायो

तोपन की पिचकारी।

उडेरी हमारो मुख पर

ऐसी तक तक मारी॥

शोर दुनिया में मचोरी॥

मियां तानसेन भी अक्सर होली पर अपने ही लिखे गीतों को गाया करते थे। इनमें प्राय: बादशाह जलालुद्दीन अकबर का भी नाम होता था। ऐसा ही एक गीत यहां प्रस्तुत है-

होली खेले ई बनेगी, रूसैं अब न बनेंगी।

मेरो कहो तू मानि नवेली जब जा रंगमें सनेगी।

कई बेर आय गई तू, नाही मानत ऊंची करि ठोड़ी मोहें तनेगी।

साहि जलालुदीन फगुआ दीजै आपु तैं आप मनेगी।

मुसलमान कवयित्री बेगम ताज को उनकी कृष्ण भक्ति के कारण मुस्लिम मीरा कहकर पुकारा जाता है। उन्हीं बेगम ताज ने होली का वर्णन इन शब्दों में किया-

राग रंग गहगड़ मच्यो री, नन्दराय दरबार।

गाय खेलि हंसी लीजिए, फाग बड़ो त्योहार।

तिन में मोहन अति बने, नाचत हैं सब ग्वाल।

बाजे बहु विधि बाज हीं, रुंज मुरज डफ ताल॥

मुरली मुकुट विराजहिं, कटि पर बांधे पीत।

नृत्यत आवत ताज के प्रभु, गावत होरी गीत॥

एक मुसलमान कवयित्री द्वारा रचे हुए इस गीत का ओज भी हमारे यहां बड़े-बड़े मन्दिरों में होली के अवसर पर बड़े प्रेम से गाया जाता है।

वृन्दावन में रसीली होली की मस्ती का वर्णन रसखान ने इन शब्दों में किया है-

फागुन लाग्यो सखी जब तें

तब तें बृज मंडल धूम मच्यौ है।

नारि नवेली बचै नहीं एक

विसेष इहै सबै प्रेम ऊंच्यो है।।

सांझ सकारे कही ‘रसखान’ सुरंग

गुलाल लै खेल रच्यौ है।

को सजनी निलजी न भई

अरु कौन भटु जिहिं मान बच्चौ है॥

जातीय और साम्प्रदायिक सद्भाव का यह तत्त्व आज भी होली-पर्व के साथ जुड़ा हुआ है। होली पर रंग डालने या गुलाल लगाने वाले की जाति की तरफ शायद ही कोई ध्यान दिया जाता हो। ध्यान दिया जाता है केवल उसकी भावना की तरफ, जिसमें अपनत्व भी हो सकता है और शरारत भी। होली के दिन घर से बाहर निकलने वाला प्रत्येक व्यक्ति समान होता है, चाहे वह अपने वर्ग या जाति की दृष्टि से कितना ही छोटा या बड़ा क्यों न हो। छुआछूत की भावना तो इस दिन कहीं रह ही नहीं पाती।

होली पर गाए जाने वाले गीतों में और उनके साथ प्रस्तुत किए जाने वाले नृत्यों में केवल पुराने और नए मुसलमान कवियों के शब्द ही नहीं होते, बल्कि अनेक स्थानों पर विशेषत: ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में मुसलमान, गायन और नृत्य के इन कार्यक्रमों में उत्साह के साथ भाग भी लेते हैं। होली-पर्व के समारोहों में अनेक स्थानों पर ख्याति प्राप्त मुस्लिम गायकों या व्यावसायिक मुस्लिम गायकों को बड़े सम्मान के साथ आमंत्रित भी किया जाता है और बड़ी रुचि के साथ उनसे होली सुनी जाती है। होली खेलने में भी हिन्दू-मुस्लिम सहयोग की घटनाएं अक्सर देखने और सुनने को मिलती हैं। होली खेलने के सामान (पिचकारी, डोलची, गुलालघोटा आदि) के निर्माताओं मे तो मुसलमानों की संख्या काफी अधिक है ही। राजस्थान के कोटा जिले के मिर्जापुर गांव में होली को ‘नहाण उत्सव’ का नाम दिया गया है और इस अवसर पर आयोजित होने वाले स्वांग, नाटक, नृत्य तथा गायन आदि में मुसलमान जिस तरह काफी बड़ी संख्या में भाग लेते हैं, उससे यह पता लगता ही नहीं कि यह पर्व केवल हिन्दुओं का है। इसका राष्ट्रीय और धार्मिक सद्भाव वाला स्वरूप ही उभरकर सामने आता है।

होली के इस स्वरूप को निरंतर आगे बढ़ाते रहने के लिए आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम होली के प्रेम, मित्रता और आपसी सद्भाव वाले मूल स्वरूप को आंखों से ओझल न होने दें। सब के साथ प्रेम और मित्रता का व्यवहार करें तथा वैसे ही व्यवहार की उनसे अपेक्षा करें। यदि कहीं कोई परंपरा कटुता और शत्रुता फैलाती हो, तो उसे तत्काल समाप्त कर देना आवश्यक है। 

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