Couple togetherness
Adhuri Khamoshiyan

Summary: खामोशियों के पार लौट आया प्यार

प्यार की कमी नहीं, संवाद की कमी रिश्तों में दीवार खड़ी कर देती है। शालिनी और अंशुल ने तूफ़ान की रात में खामोशियों को तोड़कर अपने रिश्ते को नया जीवन दिया।

Hindi Short Story:शालिनी और अंशुल की शादी को दस साल हो चुके थे। शुरुआत में उनका रिश्ता उतना ही चमकदार था जितना कोई नया रंगीन सपना। पर वक्त के साथ रोज़मर्रा की ज़िम्मेदारियों, काम के दबाव और छोटे-छोटे मनमुटावों ने उनके बीच एक अजीब सी खामोशी ला दी थी।

कभी घंटों बातें करने वाले दोनों अब केवल ज़रूरी चीज़ों पर ही संवाद करते। शालिनी महसूस करती थी कि अंशुल उससे दूर होते जा रहे हैं मानो उनके बीच अदृश्य दीवार खड़ी हो गई हो। बिस्तर पर भी अब वे दोनों सिर्फ दो शरीर थे, जिनके बीच न गर्माहट बची थी न चाहत।

शालिनी ने कई बार पहल करने की कोशिश की, पर अंशुल हर बार काम का बहाना बनाकर टाल देते। उनके बीच की दूरी अब केवल मानसिक ही नहीं, शारीरिक भी हो चुकी थी। घर में सब कुछ व्यवस्थित था, पर दिलों में एक गहरी अव्यवस्था फैली हुई थी।

एक दिन मौसम अचानक बिगड़ गया। शहर में तेज़ बारिश, तूफ़ानी हवाएँ और बिजली का गुल होना जैसे माहौल को और भारी बना रहा था। शालिनी ने खिड़कियाँ बंद करते हुए देखा कि अंशुल बरामदे में खड़े बाहर झांक रहे थे। उनके चेहरे पर भी वैसी ही बेचैनी थी जैसी भीतर माहौल में थी।

अचानक एक ज़ोरदार बिजली कड़की। घर के बाहर लगे पेड़ की एक बड़ी डाल टूटकर गाड़ी पर गिर गई। तेज़ आवाज़ से शालिनी डरकर चीख पड़ी। वह लड़खड़ाती हुई अंशुल की तरफ दौड़ी। अंशुल ने सहजता से उसे अपने सीने से लगा लिया।

कुछ पल के लिए दोनों चुपचाप एक-दूसरे की धड़कनों को सुनते रहे। उस खामोशी में अचानक पुराने दिनों की गर्माहट लौट आई। शालिनी की आँखें भीग गईं।

“कब तक हम ऐसे रहेंगे, अंशुल?” शालिनी की आवाज़ भर्रा गई।
अंशुल ने उसकी ओर देखा, फिर नज़रें झुका लीं।
“मुझे लगता था तुम मुझसे दूर हो गई हो… तुम्हें मेरी ज़रूरत नहीं रही,” उन्होंने धीरे से कहा।
शालिनी का दिल कसक उठा। “और मुझे लगता था कि तुम्हें मेरी परवाह ही नहीं रही।”

दोनों को अचानक अहसास हुआ कि दूरी का कारण एक-दूसरे की बेरुख़ी नहीं, बल्कि अधूरी बातें थीं, अनकहे डर थे। वर्षों से जमा हुए संदेह और खामोशियाँ उनके बीच दीवार बन चुकी थीं।

तूफ़ान बाहर और भीतर दोनों जगह था, लेकिन उस रात उन्होंने एक-दूसरे से सचमुच बातें कींलंबे समय बाद। शालिनी ने अपने डर, अकेलेपन और चाहत को शब्दों में ढाला। अंशुल ने भी अपनी थकान, काम के दबाव और असुरक्षाओं को पहली बार साझा किया।

बिजली अभी भी गुल थी। मोमबत्ती की हल्की रोशनी में दोनों आमने-सामने बैठे थे। पर इस बार उनके बीच खामोशी बोझ नहीं, बल्कि सुकून थी।

धीरे-धीरे अंशुल ने शालिनी का हाथ थामा। उसकी उँगलियों में वही गर्माहट थी जो कभी उनके रिश्ते की पहचान थी। उन्होंने शालिनी को अपने पास खींच लिया। बरसों की दूरी उस आलिंगन में जैसे पिघल गई।

सुबह जब बारिश थमी तो खिड़कियों से छनकर आती धूप ने घर को नया सा उजास दिया। शालिनी रसोई में चाय बना रही थी और अंशुल अख़बार उठाए दरवाज़े पर खड़े थे। दोनों ने एक-दूसरे को देखा और हल्की मुस्कान साझा की।

वह मुस्कान साधारण नहीं थी। उसमें टूटे रिश्ते को फिर से जोड़ने की ताक़त थी।

रिश्तों में दूरी अक्सर प्यार की कमी से नहीं, बल्कि संवाद की कमी से आती है। शालिनी और अंशुल ने यह समझ लिया था कि खामोशियाँ अगर लम्बी हो जाएँ, तो दीवार बन जाती हैं। और जब दीवार गिरती है, तो प्यार एक बार फिर उतनी ही मजबूती से लौट आता है।

राधिका शर्मा को प्रिंट मीडिया, प्रूफ रीडिंग और अनुवाद कार्यों में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव है। हिंदी और अंग्रेज़ी भाषा पर अच्छी पकड़ रखती हैं। लेखन और पेंटिंग में गहरी रुचि है। लाइफस्टाइल, हेल्थ, कुकिंग, धर्म और महिला विषयों पर काम...