Hindi Motivational Story
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Hindi Motivational Story: रिशा ने शादी के बाद एक संयुक्त परिवार में खुद को पूरी तरह ढाल लिया था। चार बेटे और दो बेटियों की मां शान्ता जी अत्यंत प्रसन्न थी अपने तीसरे बेटे सुहास की शादी इतने बड़े घराने में करवाने के बाद।
उन्हें कुछ लोगों ने कहा भी था कि…
” लड़की तो देख लो पता चले बड़े घराने के चक्कर में लंगड़ी लूली लड़की उठाकर ले आए फिर जिंदगी भर उसके इलाज में सारा पैसा लगाते रहना पड़ेगा। कहीं लालच मंहगा ना पड़ जाए।”

शांता जी ने साफ कह दिया था…
” लड़की जैसी भी हो बस बड़े खानदान की खूब पैसे वाले बाप की बेटी होनी चाहिए। पैसों के आगे सारे ऐब छुप जाते हैं।”
  ये बात उन्होंने उन लोगों का मुंह बंद करने के लिए ही कही थी जो उसे अपने बेटे सुहास की शादी रिशा से नहीं होने देना चाहते थे बल्कि वो तो खुद चाहते थे कि बड़े घर की बेटी उनके घर की बहू बने।

वैसे तो शांता जी ने रिशा को  एक बार किसी रिश्तेदार की शादी में देखा था तब से ही वो उन्हें अपने बेटे सुहास के लिए पसंद आ गई थी। उसका स्वभाव उसे बहुत ही सौम्य लगा था और बहुत ही संस्कारी लगी थी रिशा उन्हें।
जिस तरह शादी में वो सबका स्वागत कर रही थी और दौड़ दौड़ कर सारे काम संभाल रही थी। शांता का दिल जीत लिया था रिशा ने।
वहीं से आकर शांता जी ने लड़की और उसके खानदान के बारे में पूरी जांच पड़ताल की थी। सुहास और रिशा की कुंडलियों का मिलान हुआ और छतीस के छतीस गुण मिल
गए थे।
 वैसे देखा जाए तो आजकल लड़के लड़की की कुंडली मिलाने के साथ साथ सास बहू की कुंडली अवश्य मिलानी चाहिए। दोनों के गुण मिल गए तो परिवार में सुख शांति बनी रहेगी। वरना लड़का बेचारा तो मां और पत्नी के बीच चकरघिन्नी बन जाता है। मां को लगता है कि बेटा जोरू का गुलाम बन गया और बहु को लगता है बेटा मम्माज़ बॉय है और मां के आंचल से ही चिपका रहता है।

खूब सामान दिया था रिशा के मायके वालों ने उसकी शादी पर। शान्ता जी का तो पूरा घर ही भर गया था दहेज के सामान से। पर सामान से ज्यादा वो खुश थीं रिशा को देखकर।

रिशा का रंग सांवला था और वो साधारण नैन नक्श वाली वो एक साधारण सी लड़की थी। उसे ना तो भारी साड़ी और गहने पहनने का शौक था और ना ही सजने संवरने में उसकी रुचि थी।

जो भी कोई शांता के घर आता नई बहू को देखने के लिए यही कहता…
” कैसी बहू ले आई है शांता अपने बेटे के लिए। सिर्फ पैसों के लालच में ही तूने अपने बेटे की शादी इस लड़की से की है जो देखने में इतनी बदसूरत है। बेटा जिंदगी भर इसके साथ कैसे निभाएगा ये जरा भी नहीं सोचा।”

वो ऐसे लोगों को ऐसा ही जवाब देती
” मेरी बहू है आप क्यों हाय तौबा कर रहीं हैं। सुंदर बहुएं लाकर आपने ही क्या पा लिया हमेशा तो आपके घर से लड़ाई झगडे की आवाज आती रहती है।”
वो लोग अपना सा मुंह लेकर वहां से चली जातीं।

रिशा रूपमती और सुंदर तो नहीं थी पर गुणवती और पढ़ी लिखी लड़की थी। अगर चाहती तो वो भी मंहगे ब्युटी प्रोडक्ट इस्तेमाल करके अपने रंग रूप को निखार सकती थी पर उसे तो अपने गुणों को निखारने से ही समय नहीं मिलता था। वो हमेशा कुछ नया सीखने की कोशिश करती और ज्ञान प्राप्त करने के लिए किताबें पढ़ा करती।

घमंड तो उसमें रत्ति मात्र नहीं था कि वो बड़े घर की बेटी है उसके पिता करोड़ पति हैं। उनका अपना सोने चांदी का व्यवसाय है। अपने पिता की इकलौती संतान है वो।

सूती साड़ी और सिर पर आंचल रखे घर का सारा काम बड़ी निपुणता से निपटाती। सबकी पसंद का खाना बनाती । सासू मां के पैरों में तेल लगाती उनके बाल बांधती। सारे घर के कपड़े धोना सुखाना और प्रेस करना सब बहुत ही खुशी से करती। काम करते वक्त भी हमेशा उसके चेहरे पर प्रसन्नता छाए रहती।

रात को सबके खाने के बाद रसोई समेट कर ही सोने जाती।
सुहास अक्सर उससे कहता…
” रिशा तुम थोड़ा आराम भी कर लिया करो। दिन भर काम करती रहती हो  इस तरह तो बीमार पड़ जाओगी। कहो तो एक कामवाली के लिए बात करता हूं। तुम्हें तो घर में बिल्कुल काम करने की आदत नहीं थी। तुम्हारे यहां तो चार चार नौकर हैं और यहां तुम खुद नौकरानी सी बनी रहती हो।”

“ऐसा क्यों कहते हैं आप? अपने घर के काम करने से कोई नौकरानी थोड़े ही बनता है। मुझे अच्छा लगता है अपने हाथों से खाना बनाना और साफ सफाई करना आप सबका ध्यान रखना। घर पर सारा दिन बैठ कर करूंगी भी क्या?”

“तुम्हारे आने के बाद से तो दोनों भाभियों ने काम करना बिल्कुल छोड़ ही दिया है। पूरे घर का काम तुम अकेले ही संभाल रही हो। ऐसा कब तक चलेगा?”

उसकी दोनों जेठानी बात बात पर अक्सर उसका मज़ाक उड़ाया करती और ऐसा दिखाती जैसे उसे कुछ आता ही नहीं वो बड़े शहर से आई है पढ़ी लिखी है और अमीर बाप की बेटी है तो वो दोनों उससे बड़ा चिढ़ती क्योंकि कहीं वो सासू मां की लाडली बहू ना बन जाए।

 वैसे भी जब से रिशा यहां ससुराल आई थी सासू मां बात बात पर उन दोनों के मायके को लेकर ताना मार ही दिया करतीं थीं कि…
” तुम्हारे मायके से तो कुछ नहीं आया।  रिशा के पापा ने ये दिया वो दिया…। इतने बड़े बाप की बेटी होकर देखो कितना काम करती है और तुम दोनों सिर्फ अनाज की दुश्मन बनी बैठी हो।”

शांता जी के सबसे छोटे बेटे की जब शादी हुई तो रिशा मन ही मन सोचा करती कि उसकी देवरानी नीता तो पढ़ी लिखी और नौकरी करती है तो वो समझदार होगी।
 नीता के पिता बहुत गरीब थे। उसने बचपन से गरीबी ही देखी थी पर यहां ससुराल में आकर शांता जी का इतना बड़ा घर और उसमें सभी सुख सुविधाओं का सामान देख वो खुद की किस्मत पर इतराने लगी।
नीता का रहन सहन देख कर लगता वो बहुत बड़े घर से आई है। उसमें दिखावा कूट-कूट कर भरा हुआ था। नौकरी करती थी तो घमंड से  रहा करती थी अपना पूरा वेतन अपने माता पिता को ही दिया करती थी और ससुराल में ऐसी दिखाती जैसे की उसी के पैसों पर ये घर चल रहा है।

नीता भी बाकी दोनों  बड़ी जेठानियों की तरह घर के काम में किसी तरह की मदद नहीं करती थी। उसमें लाज लिहाज नाम की चीज जरा भी नहीं थी। वो खाना खाकर अपने जूठे बर्तन भी रिशा के मांजने के लिए छोड़ देती।

बात बे बात पर उससे झगड़ा करती।
” आज लंच में रोटियां कम पड़ गई।  कैसी सब्जी बनाई है। अपना काम आप सही से नहीं करती हैं।”
 जबकि रिशा नीता से ज्यादा पढ़ी लिखी थी और बड़े बाप की बेटी थी फिर भी उसे ना तो कभी अपनी शिक्षा पर घमंड हुआ और ना ही कभी अपने बाप के पैसों पर घमंड था।

सुहास ने जब देखा घर का काम बहुत ज्यादा हो रहा है और अकेले रिशा ही सारा दिन काम में लगी रहती है। उसकी देवरानी जेठानी कोई काम में मदद नहीं करती है तो उसने एक कामवाली को रख दिया जिसका नाम था सरिता।

 अब तीनों सरिता से सिर्फ अपने काम करवाती और ना तो उसे झाड़ू पोछा बर्तन करने देती बस उसके साथ बैठकर भी रिशा की ही चुगलियां करती।

शांता जी को भी अब यह सब अखरने लगा था। वह रिशा को समझाती…
“बहु तुम्हारे शांत स्वभाव के कारण ही तुम्हारी देवरानी जेठानियों ने तुम्हारी ऐसी हालत कर रखी है। तुम्हें बोलना चाहिए इस तरह चुप नहीं रहना चाहिए। किस चीज की कमी है तुम्हारे पास जो तुम उनसे डरती हो?”

“मां जी मैं डरती नहीं हूं। मैं तो बस घर में शांति बनाए रखना चाहती हूं।”

एक दिन सरिता बहुत ज्यादा बीमार पड़ गई और वो शांता जी की तीनों बहुओं का कोई काम नहीं कर पा रही थी। नीता ने तो साफ कह दिया था कि…
” इसे अब काम पर रखने की  कोई जरूरत नहीं है। जब यह मेरे कमरे में झाड़ू पोछा भी नहीं करेगी और मेरे कपड़े नहीं धोएगी  तो यहां नहीं रहेगी। मैं दूसरी कामवाली को रख लूंगी।मुझे ऑफिस जाना होता है। आपकी तरह दिन भर घर में तो बैठी नहीं रहती। शाम को ये मुझे घर में नहीं दिखनी चाहिए।”

“बीमार तो कभी भी कोई भी हो सकता है ऐसे में इसे काम से निकालना सही नहीं है।” रिशा ने कहा तो तीनों एक साथ बोली…
” बड़े घर की बेटी हो… नौकरानी के बिना काम नहीं चलेगा।”

दोनों बड़ी बहू जो पहले हमेशा रिशा की चुगलियां सरिता से करती रहती थी अब उसे घृणा से देखने लगी।

 रिशा उसे डॉक्टर के पास ले गई और उसका इलाज करवाया। दवाई परहेज का पूरा ध्यान रखा। करीब 15 दिन उसकी खूब सेवा की।
सरिता की आंखें भर आई।
” संझली भाभी मैं तो आपका कोई काम नहीं करती थी और हमेशा आपको बुरा समझती थी जैसा मुझे तीन भाभियां बोलती थी आप बहुत फुहड़ हैं गरीब घर से आईं हैं तभी ऐसे साधारण कपड़े पहनती हैं और झल्ली बनी रहती हैं। पर आप तो मन की बहुत ही अमीर है। आपके कारण ही मेरी जान बच पाई वरना ऐसी हालत में मैं अपने गांव भी नहीं जा सकती थी। और मेरे मां-बाप मेरा इलाज भी नहीं करवा पाते।”

रिशा ने साबित कर दिया था कि असली अमीरी मन से होती है जरूरतमंदों की मदद करना और परिवार को एक जुट बनाए रखना असली अमीरी है सिर्फ पैसों का शो ऑफ करना और बड़ी-बड़ी बातें करना अमीरी नहीं होती।

उसकी दोनों जेठानी और देवरानी भी अपनी सभी चालें चलकर हार गई  और रिशा की अच्छाई के आगे उनकी सारी चालाकियां धरी की धरी रह गई।

शांता जी ने साफ कह दिया कि उनकी संपत्ति पर सिर्फ उनके बेटे सुहास और बहू रिशा का ही अधिकार है।  तुम तीनों अपना अपना देख लो और मेरा यह घर छोड़ दो। मैं सिर्फ रिशा बहू और सुहास बेटे के साथ रहूंगी ।
इतना सुनकर उन्होंने शांता जी के पैर पकड़ लिए और रिशा से माफी मांगी।
” हमें माफ कर दो हमने तुमको बहुत सताया है।  तुम चाहती तो तुम इस घर को छोड़कर जा सकती थी या हमें इस घर से निकाल सकती थी पर तुमने कभी पैसों का घमंड नहीं किया हमारी ही मति मारी गई थी जो हम तुम्हारे साथ इतना बुरा व्यवहार करते थे।”
“दीदी आपको अपनी गलती का एहसास हुआ यही बहुत बड़ी बात है हम सब एक साथ मिलकर ही रहेंगे।”