Anaam Rishta
Anaam Rishta

Hindi Short Story: गाडी दो घंटे लेट नई दिल्ली स्टेशन पर पहुंची। मुझे 10 बजे तक इंटरव्यू के लिए गंतव्य स्थान पर पहुंच जाना था। दिल्ली मेरे लिए नयी थी। घडी पर नजर फेंकी। सुबह के आठ बज रहे थे। जल्दी जल्दी स्टेशन के रेस्टिंग म में  खुद को फ्रेश किया। कपड़े  बदले निकल पडे।
 मेट्रो स्टेशन की तरफ। लेागों से पूछ कर मैंने अपना टिकट टोकन बाराखंभा के लिए लिया। पूछने पर पता चला कि राजीव चौक पर बदलना होगा। जैसे ही मेट्रो आयी मैं तपाक से अंदर घुसा। काफी भीड थी। मैंने  किसी तरह अपने लिए थोडी जगह बनायी। मैंने देखा एक युवती बार— बार मेरी तरफ देखी जा रही थी। मुझे संकोच हो रहा था। जब मैंने किसी यात्री से राजीव चैक के बारे में पूछा तो उस युवती ने बेझिझक मुझे अगले स्टेशन पर उतरनें के लिए कहा।
जैसे ही मैं उतरा मेरे पीछे पीछे वह भी आ गयी।
‘‘नये आये हो?”
जी? हौले से मुस्कुराया।
‘‘ब्लू लाइन की मेट्रो पकडनी होगी।’’उसने समझाया। अब ब्लू लाइन क्या होती है?उसने मेरे चेहरे बनते बिगडते भावों का पढ लिया।
‘मुझे भी उधर ही जाना है।’’
उसका साथ मिला तो मेरे जान में जान आयी। सिर्फ एकबार का झंझट था। बाद में तो मैं सब समझ ही जाउंगा। बातों के बीच उसने मेरे यहां आने का प्रयोजन पूछ लिया। मैंने बिना लागलपेट के बता दिया। वह मंद मंद मुस्कुराने लगी।
बाराखंभा स्टेशन आया तो उसने इशारे से मुझे उतरने के लिए कहा। अब हम दोनों साथ— साथ बाहर की तरफ निकलने लगे। एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी कि यह युवती मुझपर इतनी मेहरबान क्यों है? अंजान शहर में किसी पर क्या भरोसा? मुझे वह एक पढी लिखी सभ्य युवती लगी। जो न चाहते हुए भी मुझे भरोसा करने के लिए विवश कर दिया। एक बात मैंने गौर किया कि उसने मेरा साथ छोडा नहीं। यह थोडा संदिग्ध लगा। उस समय मैं यह जानकर चकित रह गया कि उसे भी वही  इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था।
‘पहले क्यों नहीं बताया?’’
‘‘मैं तुम्हें सरप्राइज देना चाहती थी।’’ वह हंसी। इंटरव्यू खत्म होने के बाद उसने मुझे कॉफी का आफर दिया। अब वह मेरे लिए नयी नहीं थी। ऐसा लगा जैसे  हम एक दूसरे को वर्षो से जानते थे। मेरी सारी झिझक खत्म हो चुकी थी। कॉफी के चुस्कियों के बीच हम देानेां के बीच एक अनाम रिश्ता बन चुका था।
‘‘तुम्हारा नाम पूछना भूल गयी।’’
‘‘प्रभात।’’ उसने खुद की अपना नाम बताया।
‘‘प्रभा।”
‘‘वाह क्या कंबिनेशन है।’’मेरे मुख से निकला। वह हंस पडी। जितनी देर वह मेरे साथ रही हम दोनों एकदूसरे के बारे में बात करते रहे।
‘‘मेरे पिता नहीं है।’’ प्रभा का कंठ बिंध गया।  मैं भी भावुक हो गया।
‘‘यह नौकरी मेरे लिए बेहद जरूरी है।”
‘‘मुझे पूरा विश्वास है कि आपकेा नौकरी जरूर मिल जाएगी।’’उसके आंखो का कोर भींगा हुआ था। इसके बावजूद उसके अधरों ने चंचला नहीं छोडी।
‘‘मेरी गाडी का वक्त हो रहा था।’’ मैं उठने लगा।
‘‘मैं आपको किस हक से रोक सकती हूं?‘‘प्रभा के चेहरे पर फीकी मुस्कान तिर गयी। प्रभा मेरे दिल में गहराई तक उतर चुकी थी। भरे कदमों के साथ मैं स्टेशन की तरफ बढने लगा।