Mere Hamsafar Banoge
Mere Hamsafar Banoge

Hindi Motivational Story: शाम का धुंधलका दिल्ली के आकाश को आलिंगन कर रहा था। मेट्रो की नीली लाइन, शहर की साँसों-सी, धीरे-धीरे सरक रही थी। अक्षत खिड़की के पास बैठा, अपने विचारों के सागर में डूबा था। उसकी आँखें बाहर की चमकती रोशनी पर टिकी थीं, पर मन कहीं और भटक रहा था। राजीव चौक स्टेशन पर मेट्रो रुकी, और उसकी तंद्रा टूटी। उसने एक कप कॉफी मँगवाई, जिसकी गर्माहट ने ठंडी हवा को कुछ मुलायम किया।
तभी उसकी नज़र प्लेटफॉर्म पर ठिठकी। एक युवती, सौंदर्य की साकार मूर्ति-सी, बैसाखी के सहारे धीरे-धीरे मेट्रो की ओर बढ़ रही थी। लंबे, रेशमी केश, आँखें झील-सी गहरी, सलवार सूट में लिपटी वह मासूमियत, मानो चाँदनी धरती पर उतर आई हो। मेट्रो ने गति पकड़ी, तो अक्षत का दिल बेचैन हुआ। वह दरवाजे के पास पहुँचा, “जल्दी आइए, मैं दरवाजा रोकता हूँ!” उसने उसका बैग उठाकर अपनी सीट पर रखा। संयोग ऐसा कि सुनयना की सीट 105 थी, अक्षत की 104 के ठीक बगल में।
“मैं सुनयना, नोएडा से। एक अनाथ आश्रम चलाती हूँ। द्वारका के मंदिर दर्शन को जा रही हूँ,” उसने अपनी मखमली आवाज़ में कहा। अक्षत ने जवाब दिया, “मैं अक्षत, गाजियाबाद का शिक्षक।” सुनयना की कहानी दिल को छू गई। बचपन में एक कार दुर्घटना ने उसके माता-पिता छीन लिए, और उसका एक पैर अपाहिज हो गया। चाचा-चाची ने पहले उसे अपनाया, फिर बोझ समझकर अनाथ आश्रम छोड़ दिया। अब वही आश्रम उसका परिवार था। उसकी आँखों में दर्द और हिम्मत का अनोखा मेल था।बारिश की बूँदें मेट्रो की खिड़की पर नाचने लगीं। अक्षत ने खिड़की बंद की और दो कप कॉफी मँगवाई। सुनयना की आँखों में छिपे आँसू देख उसने रुमाल थमाया।
 “आपके परिवार में कौन है?” सुनयना ने पूछा।
“बस माँ और मैं। पिताजी दस साल पहले चले गए,” अक्षत ने कहा, उसकी आवाज़ में माँ के लिए प्रेम झलक रहा था।
मेट्रो रुकी, सुनयना ने अपना टिफिन खोला, और अक्षत को सैंडविच ऑफर किया। उसकी सादगी और गरिमा ने अक्षत के मन में एक तूफान सा उठा दिया। वह कुछ कहना चाहता था, पर शब्द गले में अटक रहे थे। आखिरकार, जब मेट्रो उसके स्टेशन के करीब पहुँची, उसने हिम्मत बटोरी। “सुनयना जी, मेरा स्टेशन आने वाला है। मैं शिक्षक हूँ, माँ के लिए एक छोटा-सा घर बनाया है। मैं चाहता हूँ… आप मेरी हमसफर बनें। आप मेरे लिए बोझ नहीं, मेरी ताकत हैं। मेरी माँ को आप जैसी सहेली मिलेगी, और मेरा अधूरा जीवन आपके साथ पूरा होगा। आपके आश्रम का भार भी मैं उठाना चाहता हूँ।”
सुनयना की आँखें विस्मय से भर गईं। “मैं अपाहिज हूँ, अक्षत जी। आप दया कर रहे हैं? मैं आपका प्रस्ताव ठुकराती हूँ।”
अक्षत का दिल डूबा, पर उसने हार नहीं मानी। “आप मेरे लिए पूर्ण हैं। मेरे जीवन को सार्थक करें।”
सुनयना चुप रही, उसकी आँखें जवाब तलाश रही थीं।
अक्षत का स्टेशन आ गया। वह भारी मन से उतरने लगा, मानो कुछ अधूरा छूट रहा हो। तभी एक नरम स्पर्श ने उसका हाथ थामा। सुनयना थी, उसकी आँखों में आँसू और एक अनकही स्वीकृति। “क्यूँ मेरे हमसफर, मुझे छोड़ कहाँ जाओगे? क्या तुम मेरे सदा के हमसफर बनोगे?”
उसकी आवाज़ में जादू था।अक्षत की आँखें खुशी से चमक उठीं। “हाँ, सुनयना जी!” उसने कहा, और दोनों की मुस्कान में एक नई मंजिल की रोशनी झलकने लगी। मेट्रो की भीड़ में, दो अजनबी दिल एक-दूसरे के लिए धड़क उठे। यह सफर खत्म हुआ, पर उनके जीवन का एक अनमोल सफर शुरू हो चुका था, जो हर पल को प्रेम और साथ की रोशनी से भर देगा।

शाम का धुंधलका दिल्ली के आकाश को आलिंगन कर रहा था। मेट्रो की नीली लाइन, शहर की साँसों-सी, धीरे-धीरे सरक रही थी। अक्षत खिड़की के पास बैठा, अपने विचारों के सागर में डूबा था। उसकी आँखें बाहर की चमकती रोशनी पर टिकी थीं, पर मन कहीं और भटक रहा था। राजीव चौक स्टेशन पर मेट्रो रुकी, और उसकी तंद्रा टूटी। उसने एक कप कॉफी मँगवाई, जिसकी गर्माहट ने ठंडी हवा को कुछ मुलायम किया।
तभी उसकी नज़र प्लेटफॉर्म पर ठिठकी। एक युवती, सौंदर्य की साकार मूर्ति-सी, बैसाखी के सहारे धीरे-धीरे मेट्रो की ओर बढ़ रही थी। लंबे, रेशमी केश, आँखें झील-सी गहरी, सलवार सूट में लिपटी वह मासूमियत, मानो चाँदनी धरती पर उतर आई हो। मेट्रो ने गति पकड़ी, तो अक्षत का दिल बेचैन हुआ। वह दरवाजे के पास पहुँचा, “जल्दी आइए, मैं दरवाजा रोकता हूँ!” उसने उसका बैग उठाकर अपनी सीट पर रखा। संयोग ऐसा कि सुनयना की सीट 105 थी, अक्षत की 104 के ठीक बगल में।
“मैं सुनयना, नोएडा से। एक अनाथ आश्रम चलाती हूँ। द्वारका के मंदिर दर्शन को जा रही हूँ,” उसने अपनी मखमली आवाज़ में कहा। अक्षत ने जवाब दिया, “मैं अक्षत, गाजियाबाद का शिक्षक।” सुनयना की कहानी दिल को छू गई। बचपन में एक कार दुर्घटना ने उसके माता-पिता छीन लिए, और उसका एक पैर अपाहिज हो गया। चाचा-चाची ने पहले उसे अपनाया, फिर बोझ समझकर अनाथ आश्रम छोड़ दिया। अब वही आश्रम उसका परिवार था। उसकी आँखों में दर्द और हिम्मत का अनोखा मेल था।बारिश की बूँदें मेट्रो की खिड़की पर नाचने लगीं। अक्षत ने खिड़की बंद की और दो कप कॉफी मँगवाई। सुनयना की आँखों में छिपे आँसू देख उसने रुमाल थमाया।
 “आपके परिवार में कौन है?” सुनयना ने पूछा।
“बस माँ और मैं। पिताजी दस साल पहले चले गए,” अक्षत ने कहा, उसकी आवाज़ में माँ के लिए प्रेम झलक रहा था।


मेट्रो रुकी, सुनयना ने अपना टिफिन खोला, और अक्षत को सैंडविच ऑफर किया। उसकी सादगी और गरिमा ने अक्षत के मन में एक तूफान सा उठा दिया। वह कुछ कहना चाहता था, पर शब्द गले में अटक रहे थे। आखिरकार, जब मेट्रो उसके स्टेशन के करीब पहुँची, उसने हिम्मत बटोरी। “सुनयना जी, मेरा स्टेशन आने वाला है। मैं शिक्षक हूँ, माँ के लिए एक छोटा-सा घर बनाया है। मैं चाहता हूँ… आप मेरी हमसफर बनें। आप मेरे लिए बोझ नहीं, मेरी ताकत हैं। मेरी माँ को आप जैसी सहेली मिलेगी, और मेरा अधूरा जीवन आपके साथ पूरा होगा। आपके आश्रम का भार भी मैं उठाना चाहता हूँ।”
सुनयना की आँखें विस्मय से भर गईं। “मैं अपाहिज हूँ, अक्षत जी। आप दया कर रहे हैं? मैं आपका प्रस्ताव ठुकराती हूँ।”
अक्षत का दिल डूबा, पर उसने हार नहीं मानी। “आप मेरे लिए पूर्ण हैं। मेरे जीवन को सार्थक करें।”
सुनयना चुप रही, उसकी आँखें जवाब तलाश रही थीं।
अक्षत का स्टेशन आ गया। वह भारी मन से उतरने लगा, मानो कुछ अधूरा छूट रहा हो। तभी एक नरम स्पर्श ने उसका हाथ थामा। सुनयना थी, उसकी आँखों में आँसू और एक अनकही स्वीकृति। “क्यूँ मेरे हमसफर, मुझे छोड़ कहाँ जाओगे? क्या तुम मेरे सदा के हमसफर बनोगे?”
उसकी आवाज़ में जादू था।अक्षत की आँखें खुशी से चमक उठीं। “हाँ, सुनयना जी!” उसने कहा, और दोनों की मुस्कान में एक नई मंजिल की रोशनी झलकने लगी। मेट्रो की भीड़ में, दो अजनबी दिल एक-दूसरे के लिए धड़क उठे। यह सफर खत्म हुआ, पर उनके जीवन का एक अनमोल सफर शुरू हो चुका था, जो हर पल को प्रेम और साथ की रोशनी से भर देगा।