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कथा-कहानी

आप सोच रहे होंगे कि मेरे सामने वाली खिड़की में कोई चांद का टुकड़ा रहता है। हरगिज नहीं, चांद का टुकड़ा होता तो परेशानी वाली कोई बात ही नहीं थी। मेरे सामने वाली खिड़की में गुप्ताजी का परिवार रहता है। गुप्ता जी, मिसेज गुप्ता, उनका लड़का कमल तथा लड़की नीरू। यह है गुप्ता जी के परिवार की जनसंख्या। मेरे कमरे की खिड़की ठीक उनके कमरे की खिड़की के सामने खुलती है, ऐसे में मुझसे न खिड़की खोलते बनती है और न बंद करते।

 कई बार मन कहता है- जब खिड़की बंद ही करनी थी, तो बनवाई क्यों थी और यदि मकान में खिड़की बन ही गई है तो उसे खोलना क्यों नहीं। सो मैं खिड़की खोलकर बैठा रहता हूं। खिड़की खोलने के पीछे मुख्य आकर्षण मिसेज गुप्ता हैं। स्पष्ट कर दूं कि मिसेज गुप्ता के साथ मेरा ऐसा-वैसा कुछ नहीं है। बस खिड़की खोल कर मिसेज गुप्ता की दिनचर्या देखना मेरी नियति है।मेरी सामने वाली खिड़की के सबसे असहाय पात्र गुप्ता जी हैं जो बेहद दब्बू तथा डरपोक किस्म के इंसान हैं। सदैव दबी जुबान में बात करते हुए मेरी खिड़की कनखियों से देखते रहते हैं। एक-दो बार तो मुझे शक हुआ कि कहीं गुप्ता जी इस बहाने मेरी पत्नी को तो नहीं देखते हैं। परन्तु मेरा यह शक वहम निकला और अनेक गोपनीय ताका-झांकी के बाद यह साबित हो गया कि गुप्ता जी जब स्वयं की पत्नी से ही आंख नहीं मिला सकते तो मेरी दुर्गा से क्या नैन लड़ायेंगे?

गुप्ता जी उम्र में मेरे समकालीन हैं, पैंतीस के आसपास, परन्तु चिंतन ने उन्हें असमय ही चालीस का बना दिया है। चश्मा तो मैं भी लगाता हूं- परन्तु गुप्ता जी के चश्मे का कांच और फ्रेम दोनों मोटे हैं। कपड़े गुप्ता जी भी पहनते हैं, परन्तु ढ़ीले-ढ़ाले मुगलकालीन, जबकि मैं इस मामले में थोड़ा आधुनिक हूं। दाढ़ी मैं भी बनाता हूं- रोजाना, गुप्ता जी सिर्फ रविवार की सुबह। चेहरा गुप्ता जी का भी है, परन्तु रूआंसा-घिघियाया सा, जबकि मेरा मंद मुसकान भरा है। मुझमें और गुप्ता जी में जो सबसे बड़ा साम्य है- वह है पत्नी का, फर्क बस इतना है कि वे पत्नी से डरते हैं, जबकि यहां सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ है।मिसेज गुप्ता परिवार में मातृ प्रधान व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करती हैं तथा गुप्ता जी वर्तमान में पराधीनता व गुलामियत का जीवन जीने को मजबूर हैं। मिसेज गुप्ता सामान्यत: आराम पर जोर देती हैं। बच्चों तथा गुप्ता जी को दिन में पांच-सात बार डांटना सामान्य है। सुबह चाय बनाने की ड्यूटी गुप्ता जी की है, तो रोटियां बनाने की जिम्मेदारी उनकी बालिका की है। बीच में थोड़ा सा हाथ बंटा देंगी तथा उसके बाद कमर दर्द, सिर दर्द अथवा कमजोरी का बहाना करके वे पलंग पर लेट जाती हैं। दर्शनीय दृश्य उस खिड़की में से वह है, जब गुप्ता जी सिर अथवा पैर दबाते हुए अपने भाग्य को कोसते हैं। उनका निरन्तर गहरा सेवाभावी बनना तथा विनयशीलता का आभूषण उनकी शोभा बन विकसित हो रहा है।मिसेज गुप्ता भारतीय नारी समाज को नयी मंजिल, नया अंदाज तथा नयी प्रेरणा देने की दिशा में सक्रिय हैं। एक दिन लगा कि खिड़की ज्यादा दिन खोलना ठीक नहीं है। मेरी पत्नी पर कुप्रभाव पड़ सकता है। अत: खिड़की को ज्यादातर बंद ही रखना चाहिए। कल से उसकी अपेक्षा भी बढ़ जाएं और वह पांव दबाने जैसी सुविधाओं की मांग करने लगे तो सच कहता हूं मैं उसका गला दबा सकूं या नहीं, लेकिन अपना जरूर दबा दूंगा। मिसेज गुप्ता नारी जाति पर अब तक हुए तमाम अत्याचारों का बदला अकेले गुप्ता जी से ले रही हैं।

एक दिन मुझसे रहा नहीं गया, मैंने देखा, गुप्ता जी कमरे में अकेले थे। खिड़की में से मैंने गुप्ता जी से कहा-‘गुप्ता जी, आपने काले तिल चबाये हैं। गुप्ता जी चौंक पड़े, बोले- ‘धीरे बोलो शर्मा जी, मिसेज बाथरूम में नहा रही हैं- सुन लिया तो खिड़की बंद करा देंगी और आप हमारे यहां की दृश्यावलियां देखने को तरस जायेंगे।मुझे सन्निपात हो गया, ठंडा होकर धीरे से बोला- ‘भाई गुप्ता जी, हद हो गई है, अब तो, कल आप मिसेज के कपड़े अलगनी पर सुखा रहे थे, अमां यार अब ज्यादा दिन मैं भी अपनी खिड़की खुली नहीं रख सकता। पत्नी सब कुछ देखती है। कल से उसने भी मिसेज गुप्ता की जैसी हरकतें शुरू कर दीं तो मैं तो बरबाद हो जाऊंगा।गुप्ता जी बोले- ‘भाई, क्या करें? अपनी खिड़कियां बंद रखो, मिसेज गुप्ता से मैंने जब से ‘लव किया, तब हालात काबू में रहे, परन्तु शादी के बाद मेरा ‘ पुरुष मरता ही चला जा रहा है।आज मैं दफ्तर जाते समय पान तक के पैसे मिसेज से मांग कर ले जाता हूं। साइकिल में पंचर हो जाये तो पंचर निकलवाना भी उन्हीं में शामिल हैं। क्या कहें, हालात ‘बंधुआ मजदूरी से भी बदतर हैं। ‘क्या कह रहे हैं आप! परन्तु आप इतने दब कैसे गये हैं? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आप अपने जीवन की नयी शुरूआत करें? ‘जब पानी सिर से गुजर गया, तब तैरने की बात करते हो भाई, अब मैं किसी भी स्थिति में कानून और व्यवस्था अपने हाथ में नहीं ले सकता। वह इसलिए कि कानून की तरह मेरी पत्नी के हाथ और जीभ दोनों बहुत लंबे हैं।

तभी मिसेज गुप्ता की पदचाप सुनाई दी, वे मुंह लटकाकर फैले हुए कपड़ों की तह करने लगे। मैं भी अपनी कुर्सी पर बैठ गया और खिड़की का जायजा लेने लगा। मिसेज गुप्ता बाल झटकने लगी। बाल सुलझाकर गुप्ता जी से पिन मांगा तो गुप्ता जी ने पिन पकड़ाया। इस बीच गुप्ता जी से कभी तौलिया, कभी क्रीम-पावडर की डिब्बियां-पता नहीं, कितनी चीजें मंगाती रही और गुप्ता जी करते गये। मुझे पता नहीं था कि यह सब मेरी पत्नी भी देख रही है, सो वह भृकुटी ताने हुए खिड़की को बंद कर आई और मुझसे बोली- ‘तो यह करते हैं आप। नैन लड़ाने की जुर्रत कैसे की आपने?

मैंने सफाई दी-‘तुम क्या बात कर रही हो दुर्गा? मेरी मिसेज गुप्ता में कोई रुचि नहीं है, मैं तो सिर्फ उनके आक्रामक रुख का दर्शक हूं- फिर मिसेज गुप्ता इतनी सुदर्शन भी नहीं हैं कि मैं उन्हें इस दृष्टि से देखूं। तुम्हें शायद पता नहीं है कि सीन इस समय ‘पीक पर है- खिड़की जल्दी खोलो।

परन्तु मिसेज को शंका के सांप ने डस लिया था, बोलीं- ‘माई डियर हसबैंड, मैं रसोईघर में लगी रहती हूं, इसका मतलब यह कतई नहीं है कि आप सामने वाली खिड़की में देखें।

‘देखो दुर्गा, मजा किरकिरा मत करो। गुप्ता जी अपने कार्यों को इस समय फाइनल रूप दे रहे होंगे, अत: भाई खोलो खिड़की-तुम व्यर्थ में शक कर रही हो। यह तो गनीमत समझो कि सामने-चांद का टुकड़ा नहीं रहता-वरना तुम! पता नही

कितनी उखड़ी-उखड़ी रहतीं। मैंने कहा।बहरहाल, मेरी पत्नी ने उस दिन से हिदायत दी कि अब आगामी पन्द्रह वर्षों यह खिड़की नहीं खुलेगी। उसके पीछे शायद उसका तर्क यह रहा होगा कि पंद्रह वर्ष बाद मैं पचास का हो जाऊंगा तथा मिसेज गुप्ता को देखने की मेरी रुचि तब तक दम तोड़ चुकेगी। मैं परेशान हूं। गुप्ता जी के कमरे की खिड़की खुली रहती है, परन्तु मेरी बंद है। कई बार मैंने हल्की सी खोल कर देखा है तो दृश्य ज्यों के त्यों बरकरार हैं। परन्तु मैं ज्यादा देर तक खिड़की खुली नहीं रख सकता।एक दिन गुप्ता जी ने आवाज लगाई कि शर्मा भाई, खिड़की खोलो तो। मैंने खिड़की खोली-उन्होंने पूछा-‘क्यों भाई आजकल हमारे सामने वाली खिड़की आप बंद क्यों रखते हैं?मैंने कहा- ‘छोडिय़े गुप्ता जी इस बात को, आप अपनी खैरियत सुनाओ। गुप्ताजी रूआंसे हो गये, बोले- ‘तुम्हारा आसरा था-परन्तु तुमने भी खिड़की बंद कर ली। भाई कृपा हो, यदि तुम खिड़की खुली रखो तो। मैं कैसे बताता कि खिड़की का खुला रखना गृह क्लेश का कारण है। मैं बात बदलकर बोला-‘हां..गर्म हवा आती है न, इसलिए मिसेज को पसंद नहीं है। तभी मेरी पत्नी आ गई। उसने आव देखा न ताव झटाक से खिड़की को बंद कर दिया। आज तीन महीने हो गये, मुझे पता ही नहीं है कि मेरे सामने वाली खिड़की में हो क्या रहा है? क्या गुप्ता जी अभी भी वही यातना भुगत रहे हैं? किसी भी बात का कोई उत्तर मेरे पास नहीं है। 

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