Summary: क्या आप भी बच्चे की हर जिद पूरी करते हैं? जानिए इसका खतरनाक असर
हर ज़िद पूरी करने से बच्चे में धैर्य, मेहनत और आत्मनिर्भरता जैसे गुण विकसित नहीं हो पाते और वह निराशा सहने में कमजोर हो सकता है।
समय पर प्यार के साथ ‘ना’ कहना ही बच्चों को मानसिक रूप से मजबूत और जिम्मेदार बनाता है।
How to Handle Stubborn Child: बचपन वह उम्र होती है, जब बच्चे अपनी इच्छाओं और भावनाओं को समझना और व्यक्त करना सीख रहे होते हैं। उस समय वह अपनी इच्छाओं को बस पूरा करना चाहते हैं, बेशक उसके लिए उन्हें ज़िद ही क्यों ना करनी पड़े। लेकिन मुद्दा यह है कि क्या बच्चों की ज़िद माननी चाहिए? बच्चों का ज़िद करना आम बात है, लेकिन उनकी हर ज़िद पूरी करना आम नहीं है। अगर आप अपने बच्चों की सभी ज़िद मान लेते हैं तो इसका उन पर तथा उनके भविष्य पर गलत प्रभाव पड़ता है।
बच्चों के ज़िद का कारण
ध्यान आकर्षित करना: जब बच्चों को यह समझ आने लगता है कि उनके चिल्लाने या रोने पर आप उनकी तरफ ध्यान देते हैं, तथा आप उन्हें चुप कराने के लिए उनकी बात मान लेते हैं तो वह ऐसा बार-बार करते हैं।
ज्यादा लाड-प्यार: शुरुआत में हम बच्चों को उनके एक बार मांगने पर उनकी सब इच्छाएं पूरी कर देते हैं। ऐसा करने से समय के साथ उनकी इच्छाएं और मांग बड़ी हो जाती हैं जो हम पूरा नहीं कर पाते। तब यह बच्चों की ज़िद के रूप में हमारे सामने होती है।
बड़ों का अनुकरण: बच्चों में अनुकरण की प्रवृत्ति बहुत अच्छी होती है जो वह अपने आसपास देखते हैं, वही वह सीखते हैं और फिर ज़िद करते हैं।
नकारात्मक प्रभाव
बच्चों की सभी ज़िद पूरी की जाए या उनके हर ज़िद के सामने झुका जाए तो इसके कई नकारात्मक प्रभाव बच्चों पर देखने को मिलते हैं। जैसे;

धैर्य की कमी: माता-पिता या परिवार में किसी के द्वारा भी बच्चों को उनकी पसंद की चीज तुरंत मिल जाए तो समय के साथ उन में धैर्य की कमी आ जाती है। क्योंकि उनकी हर मांग तुरंत पूरी करने की वजह से उनमें संयम की भावना का विकास बाधित होता है। धैर्य की कमी के कारण बड़े होकर उन्हें काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
मेहनत से बचाना: जब बच्चों को माता-पिता बिना किसी प्रयास के उनकी इच्छाओं को पूरा कर देते हैं तो ऐसा करना उनकी आदत में शामिल हो जाता है। और वह बड़े होकर भी हर चीज तुरंत बिना किसी प्रयास के पाना चाहते हैं तथा मेहनत करने से वह सदा बचते हैं।
आत्मनिर्भरता में कमी: हर ज़िद पूरी होने पर बच्चे खुद से कुछ भी करने या पाने का प्रयास नहीं करते बड़े होने पर भी उनकी यह आदत बनी रहती है। वह अपनी जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं। उनके अंदर निर्णय लेने की क्षमता का विकास नहीं हो पता है।
निराशा ना सह पाना: जब आप अपने बच्चों की हर ज़िद मान लेते हैं तो उन्हें ना सुनने की आदत, या ना मिलने की आदत का विकास नहीं होता। बड़े होने पर कोई चीज प्राप्त न कर पाने की हालत में वह उस निराशा को सह नहीं पाते और डिप्रेशन का शिकार होते हैं।
अगर आप चाहते हैं कि आपके बच्चों का भविष्य अच्छा हो। वह बड़े होकर आत्मनिर्भर तथा मानसिक रूप से मजबूत बने, तो आप उनके बचपन में ‘ना’ कहने की आदत डाल लें। आपकी वर्तमान की कठोरता आपके बच्चे के भविष्य को बना सकती है।
