छोटी बच्ची थी, तब मेरी दुनिया बहुत प्यारी और रंगीन थी। मैं गुड़ियों से खेलती, पेड़ पर झूला झूलती और हर बात पर हँस पड़ती थी। पर एक दिन ऐसा आया, जब मुझे बहुत डाँट पड़ी और मैं रो पड़ी — लेकिन वही दिन मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी सीख बन गया।
मैं उस समय चौथी कक्षा में पढ़ती थी। मुझे चित्रकला बहुत पसंद थी। किताबों में फूल, तितलियाँ और सुंदर-सुंदर आकृतियाँ बनाना मुझे अच्छा लगता था। एक दिन स्कूल में टीचर ने कहा, “कल अपनी पसंद की चीज़ का चित्र बनाकर लाना।” मैं बहुत खुश थी। रात भर सोचती रही कि क्या बनाऊँ।
अगले दिन मैं जल्दी उठी और टेबल पर बैठकर रंग निकाल लिए। तभी मम्मी ने कहा, “पहले नाश्ता कर लो, फिर चित्र बनाना।” पर मुझे तो बस रंग भरने की जल्दी थी। मैंने कहा, “बस दो मिनट,” और बिना कुछ खाए रंगों में खो गई।
रंग भरते-भरते मेरे हाथ से पानी की बोतल गिर गई, जिससे मम्मी का नया मोबाइल भीग गया। वो मोबाइल उन्होंने बड़ी मुश्किल से खरीदा था। मम्मी रसोई से भागी आईं, देखा कि मोबाइल खराब हो गया है। गुस्से में बोलीं, “तूने फिर सुनी नहीं बात! हमेशा मनमानी करती है!”
और उन्होंने मेरे गाल पर हल्का सा थप्पड़ मारा।
मैं रो पड़ी। मुझे लगा मम्मी अब मुझसे प्यार नहीं करतीं। मैं कमरे में जाकर दरवाज़ा बंद कर रोने लगी। तभी थोड़ी देर बाद मम्मी अंदर आईं। उन्होंने मेरा सिर सहलाया और कहा, “बेटा, मैंने तुझे इसलिए नहीं मारा कि मोबाइल खराब हो गया, बल्कि इसलिए कि तू अपनी बातों को नज़रअंदाज़ करती है। जब हम बड़ों की बात नहीं सुनते, तो बाद में पछताना पड़ता है।”
मैं चुप रही, आँसू पोंछे और धीरे से बोली, “मम्मी, अब मैं आपकी बात हमेशा मानूँगी।”
मम्मी मुस्कुराईं, बोलीं, “यही मेरी प्यारी बच्ची है।”
अगले दिन मैंने स्कूल में ‘माँ’ का चित्र बनाया — जिसमें माँ के आँचल में बच्चा छिपा हुआ था। जब टीचर ने पूछा, “बेटा, यह चित्र किस भावना को दर्शाता है?”
मैंने कहा, “यह माँ का प्यार है, जो डाँट में भी छिपा होता है।”
सारी कक्षा तालियाँ बजाने लगी। उस दिन मैं समझ गई कि माँ की डाँट में भी अपनापन छिपा होता है। वो हमें गिरने नहीं देतीं, बस संभालने का तरीका अलग होता है।
धीरे-धीरे मैं बड़ी होती गई, पर वो दिन कभी नहीं भूली। जब भी कोई मुझे टोके या डाँटे, मैं मुस्कुरा देती हूँ — क्योंकि अब मुझे पता है, जो हमें सुधारता है, वही सच्चा अपना होता है।
आज जब मैं खुद जिम्मेदार बन चुकी हूँ, तो समझ पाती हूँ कि एक थप्पड़ में जो सिखाई थी, वो किसी किताब में नहीं मिलती। अगर उस दिन मम्मी नहीं डाँटतीं, तो शायद मैं कभी अपनी गलती समझ नहीं पाती।
माँ-बाप की डाँट हमें तोड़ती नहीं, बल्कि गढ़ती है। जीवन में गिरना बुरा नहीं, पर अपनी गलती से सीखना ही असली जीत है।
प्यार हमेशा मीठे शब्दों में नहीं मिलता, कभी-कभी सख्ती के रूप में भी वही प्यार हमें सही रास्ता दिखाता है।
