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एक कप चाय

एकाएक पापा को लॉन में बैठ चाय पीते हुए देख मन मयूर नाच उठा… एक-एक घूंट जो वो चाय का पी रहे थे, देख इतनी तृप्ति और सुुकून महसूस हो रहा था कि अन्तर्मन की खुशी शब्दों में बयां ही नहीं कर सकती।

कुछ ही महीने पहले की ताई, चाची, मामी, मौसी की सम्मिलित आवाजें और उनके चेहरे अनायास ही दिखाई देने लगे। मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए उनके स्वर गुंजते हुए से प्रतीत होने लगे। ‘अरे! ये तू क्या करने जा रही है, अपने पापा को पुनर्विवाह मत करने देना, पापा तेरे नहीं रहेंगे। अपने ही घर में पराई हो जाएगी। सब कुछ छिन जाएगा बेटा, तेरा प्यार कम हो जाएगा। जो भी थोड़े-बहुत दिन है कट जाएंगे, पर फिर शादी मत होने देना वगैरा-वगैरा…! हां कहते बहुत डर सा लग रहा था, जैसे इस ‘हां से मेरा सब छिन जाएगा, सारे अधिकार सारा प्यार, लगाव…! फिर भी दिल की सुनते हुए ‘हामी भरी क्योंकि मैंने उनकी मन:स्थिति को समझा था और बेटी होने के नाते सिर्फ और सिर्फ मैं ही अहसास कर सकती थी।

पापा खुश हों या कोई टेंशन में, उन्हें एक कप चाय चाहिए चाहिए होती थी, एक-एक घूंट पीते हुए अपने आप से बातें करते हुए हर सुख या दुख अपने में समा लेते थे। जीवन खुशियों से भरपूर था, पर अचानक बीमारी के बाद मां का चले जाना ऐसा रिक्त स्थान हो गया, जो कभी भर नहीं सकता था। पीड़ा, जो कम नहीं हो सकती थी, किन्तु जिन्दगी तो हम सबको बितानी ही थी, पापा ने हम भाई-बहनों की जिम्मेदारी लेते हुए मां का भी प्यार देना शुरू कर दिया। उनकी यही कोशिश थी कि बच्चों को मां की याद न आए।

अकेले रहने में समस्या थी, तो हमें संयुक्त परिवार में रिश्तेदार के घर रहना पड़ा और तब पापा ने काम पर जाना शुरू किया। ऑफिस से शाम को टाइम पर लौट आते तो जब सबकी चाय बनती, पापा ले लेते किन्तु कभी जल्दी या लेट हो जाएं तो चाय मांगने में सकुचाहट सी उनकी आवाज में होती थी, कभी ज्यादा ही देर हो जाती तो चाय बनाने को कहने पर ताईजी या चाची उनकी इच्छा जानते हुए भी चाय न बनाने का बहाना खोज ही लेतीं, अब चाय का समय नहीं है खाना ही खा लेना… वही आपके लिए ठीक रहेगा।

मां के सामीप्य की वेदना हमसे ज्यादा तो उनको थी। सुख-दुख की, मन की बात समझने वाला संगी साथी उनका कोई नहीं था, पर मुझे तो अपनी उम्र के अनुसार बस यही समझ आता था कि उनकी खुशी की खातिर ऐसा दिन कब आएगा कि बिना समय देखे जब मन करे, उनके मन माफिक ‘एक कप चाय मिल जाए और मन की सारी बातें करते एक-एक घूंट आराम से पीते जाएं। तभी खुशी की बूंदें मुझे अपने गालों पर गिरती महसूस हुई, लगा कि जितनी बह सकती हों, बहने दूं क्योंकि मैने उन्हें बिना वक्त देखे ही मां को आवाज लगाते हुए सुन लिया था। जरा एक कप चाय और देना..

हां, अभी लाई बस! दो मिनट..। 

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