खूबसूरत सपने-गृहलक्ष्मी की कहानियां: Khoobsurat Sapne Kahani
Khoobsurat Sapne Kahani

Khoobsurat Sapne Kahani: सभी लड़कियों की तरह मेरे मन में भी कितने अरमान दबे हुए थे, कि मेरी शादी बड़ी धूमधाम से होगी ।
पापा मुझे अपनी राजकुमारी कहा करते थे हमेशा, तो शादी के समय मैं सच में एक राजकुमारी की तरह ही खूब सजाई जाऊंगी। मुझे अच्छे से ब्यूटी पार्लर में ले जाया जाएगा जहांँ मेरा मेक ओवर कर मुझे खूबसूरत बनाया जाएगा। पर पहले प्रतियोगिताओं में सफलता प्राप्त कर सिविल सर्विस के लिए चुनी जाऊंँ।
माना कि मैं साधारण नैन नक्श वाली सांँवली लड़की हूंँ, पर सपने देखने का तो सबका समान अधिकार है।
सपने कहाँ जानते हैं कि मैं दिखने में कैसी हूंँ वह तो बिना पूछे बिना बताए आ जाते हैं आँखों में… कभी खुली पलकों में तो कभी बंद पलकों में।
मेरे आंँखों में तैरते सपने मेरे भविष्य को लेकर शायद मेरे ही अपनों की आंँखों में चुभने लगे थे।

एक शाम कॉलेज से पूरा दिन थक कर आने के बाद जब मैं अपने कमरे में आई और घड़े से पानी निकाल पीने के बाद आंँख बंद कर थोड़ी देर आराम करने के लिए बैठी ही थी, कि दूसरे कमरे से आती आवाजें मुझे परेशान करने लगी । मैं उठकर रसोईघर में चली गई। भईया भाभी के कमरे से ही ये आवाजें आ रही थी, लग रहा था जैसे बर्तन और सामान पटके जा रहें हैं।
भाभी की आवाज से लगा वो मेरा ही नाम बोल रही है…
“सलोनी… सलोनी… सलोनी…
जब देखो इस घर में सब उसका ही नाम रटते रहते हैं सभी लोग। आपके माँ बाप तो मेरे हर काम में मीन-मेख निकालते हैं और सिर्फ उसकी तारीफ करते रहते हैं। बहुत हो गया अब मैं तंग आ गई हूँ आपके परिवार वालों से। आप बस मेरी बुआ जी के देवर से उसकी शादी करवा दो और अपने मम्मी-पापा को भी गाँव या किसी आश्रम में भेज दो। मुझसे नहीं हो रहा है अब सबकी सेवा करना।”

भाई की कांपती हुई आवाज आ रही थी…
“क्या बात कर रही हो नैना, मेरी बहन और मम्मी-पापा बोझ नहीं है जो अपनी बहन को उस नशेड़ी को सौंप दूं और मम्मी पापा को गांँव छोड़ आऊं।”

“तो ठीक है… आप मुझे ही मायके छोड़ आईए और यह जो अपनी होने वाली संतान है उसे आज ही मैं खत्म करने डॉक्टर के पास चली जाऊंगी।”

भईया कह रहे थे…
” नहीं… नहीं नैना…ऐसा कुछ मत करो …
ठीक है नैना तुम जैसा चाहती हो वैसा ही होगा…
पर तुम हमारी होने वाली संतान को कुछ नुकसान नहीं पहुंचाओगी। बहुत प्यार करता हूँ तुमसे और अपने इस बच्चे के लिए बहुत से सपने देखे हैं, उन सपनों को मत तोड़ो… मुझसे दूर मत जाओ।
सलोनी की शादी वहीं होगी और तुम्हारी सारी बात मानी जाएगी उसकी शादी के बाद हम मम्मी पापा को तीर्थ यात्रा के बहाने किसी आश्रम में छोड़ आएंगे। अब तो खुश हो जा नैना। जैसा तू चाहती है वैसा ही होगा। पर अब यह घर छोड़ कर मायके जाने की जिद्द मत करना।”

गैस पर रखी मेरी चाय खोल रही थी और खोल रहा था मेरे अंदर गुस्सा और भाई की लाचारी पर उठ रही थी खीझ।
भाभी जिसे आए अभी कुछ महीने ही हुए हैं वो हमें ही हमारे घर से निकालना चाहा रहीं हैं और भाई उसका साथ देने को तैयार हैं।
मेरे रंग रूप का मजाक उड़ाती थी तो मैं हँस कर टाल देती थी। पर मैं अपने मांँ-पापा का अपमान नहीं सह सकती। पापा की नौकरी छूटने के बाद मांँ ने रात दिन एक कर सिलाई बुनाई से इस घर को जोड़ा हमें पढ़ाया लिखाया और आज पापा बीमार हैं बिस्तर से उठ नहीं सकते तो उन्हें अपने ही घर से बाहर करने की तैयारी कर रहे हैं भईया भाभी।
भाभी की बुआ का देवर जब पहली बार हमारे घर आया तो उसका वो गंदा स्पर्श आज भी याद है उसकी आंँखों में दिखता वो बहशीपन… जिसे सोचकर ही घिन आती है। उम्र में काफी बड़ा है मुझसे ।
उसकी पत्नी उसकी बुरी आदतों के कारण ही उसे छोड़कर चली गई। मैं ऐसे इंसान से हरगिज शादी नहीं कर सकती और अपने मम्मी-पापा को बेसहारा नहीं छोड़ सकती। भाई अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ सकता है पर मैं नहीं।
खौलती हुई चाय को गैस से उतारा और कप में छानकर एक घूंट उस कड़वी चाय को पीकर मैंने मन ही मन एक निर्णय लिया और जलती गैस पर हाथ रख अपने आप से प्रतिज्ञा की कि मैं अपने माता-पिता की जीवन भर सेवा करूंगी और कभी शादी नहीं करूंगी। चाहे इसके लिए मुझे जीवनभर संघर्ष करना पड़े। शादी के नाम से ही अब चिढ़ होने लगी थी कि कहीं मैं भी शादी के बाद नैना भाभी की तरह ही ना हो जाऊँ और सिर्फ अपनी आजादी और स्वार्थ पूरा करना चाहूँ।

मेरी माँ, पापा के लिए पानी लेने रसोईघर में आई मुझे देखकर पूछा, “सल्लू कब आई पता ही नहीं चला। जरा आंँख लग गई थी। अच्छा चाय बना रही है तो मेरे और पापा के लिए भी बना दे।
अरे! कुछ बोलती क्यों नहीं?”
उन्होंने जब मेरे पास आकर देखा तो मुझे अपने सीने से लगा लिया।
“यह क्या कर रही है गैस बंद करते हुए बोली। मेरी बच्ची क्या हुआ? किसी ने कुछ कहा तुझसे?”
“नहीं माँ…”
बस इतना कहकर मैं अपने आंँसूओं को रोक नहीं पाई।
माँ ने मेरे हाथ पर घी मला और मेरी आंँखों से आए आंँसुओं को अपने आंँचल से पोंछा।

मैंने सुबकते हुए कहा…
“मांँ मेरी नौकरी लग गई है दूसरे शहर में। आप समान पैक करना शुरू कीजिए। हम पापा का इलाज बड़े अस्पताल में करवाएंगे। मुझे सरकारी क्वार्टर मिल रहा है,अब आप दोनों मेरे साथ ही रहेंगे।”

अगले दिन ही मैं माँ-पापा के साथ पटना से दिल्ली जाने वाली ट्रेन में थी।

पापा को गुजरे हुए पच्चीस साल हो गए और माँ आज भी मेरे साथ रहतीं हैं और अभी भी कहतीं हैं बिटिया शादी कर ले, मेरे जाने के बाद तू अकेली पड़ जाएगी। मैं अपनी प्रतिज्ञा पर कायम हूँ अब पचास साल की उम्र में शादी कहकर मैं माँ के गले लिपट जाती हूँ।भाई भाभी ने कभी हमारी खोज खबर नहीं ली। वो खुश हैं अपनी दुनिया में और मैं अपनी माँ के साथ खुश हूँ, अपने पैरों पर खड़ी हूँ। दिल्ली शहर में अपना खुद का मकान भी बना लिया हैं जिस पर अपनी माँ सुधा के नाम का नेमप्लेट लगाया है।

पापा की राजकुमारी को भले राजकुमार ना मिला इस जीवन में पर वो दूसरों की गुलामी भी करने को मजबूर नहीं है ।क्या हुआ जो दुल्हन नहीं बनी श्रृंगार नहीं किया पर अपने सपनों को खूब सजाया। आज आई पी एस सलोनी सिंन्हा की बहादुरी की खबरें रोज पेपर में छपती हैं। सच मायनों में मेरी की गई प्रतिज्ञा के कारण ही यह संभव हो पाया। उस समय अगर मैं भईया भाभी के कहे अनुसार उस आदमी से शादी करती तो आज जहाँ जिस मुकाम पर हूँ, वहाँ ना होती यह सलोनी पापा की राजकुमारी अपने खूबसूरत सपनों को अंजाम न दे पाती।