Hindi Kahaniya: लॉकडाउन में ज़िन्दगी रुक सी गई थी। सब तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था। कोई बाहर नहीं निकलता था। बुज़ुर्ग दाम्पत्य जो अकेले रहते थे उनकी हालत बहुत ज़्यादा दयनीय थी। घर की चारदीवारी में कैद वो किसी से बात भी नहीं कर पाते थे। किसी को किसी की खबर तक नहीं थी। बच्चे अपने माता-पिता से दूर थे। कोई दूसरे शहर में तो कोई विदेश में। ऐसे में बुज़ुर्ग अपना ख्याल खुद रख रहे थे।
लोगों ने बाहर निकलना और हंसना दोनों ही छोड़ दिया था। सब घर में डर कर बैठ गए थे।
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पर एक घर था जहां रोज़ की तरह हंसी खनकती रहती थी। और ये घर था श्रीमान एवं श्रीमती सक्सेना जी का। वो दोनों बुज़ुर्ग दाम्पत्य रोज़ की तरह ही अपनी दिनचर्या आरंभ करते थे। बस सैर करने बाहर ना जाकर अपनी बालकनी में घूम लेते थे। एक दूसरे का घर कार्य में साथ निभाते लॉकडाउन के दिन काट रहे थे।
“अरे आप क्यों सब्ज़ी काट रहे हैं? लाइए मुझे दीजिए। मैं काट दूंगी। ” सुलोचना जी ने कहा।
“सारी उम्र तुमने काम किया और मैंने आराम। अब आराम करने की बारी तुम्हारी।” विनय जी ने उन्हें प्यार से देखते हुए कहा।
“अच्छा जी! ऐसे नेक ख्याल आपके पहले तो नहीं थे! अब बताओ कि क्या बात है? मैं जानती हूँ कि आपके दिल में कुछ उधेड़बुन चल रही है।” सुलोचना जी बोलीं।
“देखो ना सुलू! जीवन का आजकल क्या भरोसा रह गया है। कौन, कब इस दुनिया को अलविदा कह दे, क्या पता। तो इसलिए मैंने सोचा कि मैं नहीं चाहता कि मेरे जाने के बाद तुम अपनी महिला मंडली को ये कहो कि मेरे सक्सेना साहब तो मेरे साथ काम ही नहीं कराते थे। और…मैं चाहता हूँ कि तुम्हें मेरे जाने के बाद मेरी कमी महसूस हो।” विनय जी ने नम आंँखों से कहा।
“आपको याद करने के लिए मुझे ये सोचने की आवश्यकता नहीं है कि आपने मेरे साथ चाय बनाई कि नहीं, सब्ज़ी काटी की नहीं। आप मेरे साथ उस समय खड़े रहे जब सब मुझे माँ ना बन पाने के कारण सबके ताने सुनने पड़े पर आपने सबको चुप करा दिया और मेरा साथ दिया। ये वजह काफी है आपको याद करने के लिए। और वैसे भी पहले मैं जाऊँगी आप नहीं। मुझे सुहागन ही मरना है।” सुलोचना जी बोलीं।
“ये क्या बात हुई, मुझे भी सुहागन मरना है, मैं पहले जाऊँगा।” विनय जी किसी बच्चे की भांती ज़िद्द करते हुए बोले।
“सुहागन….हा हा हा…औरतें सुहागन मरती हैं आदमी नहीं।” सुलोचना जी हँसते हुए किचन की तरफ बढ़ गईं।
एक दिन अचानक विनय सक्सेना जी की हालत गंभीर हो गई। सांस लेने में तकलीफ़ होने लगी। सुलोचना जी, उनकी धर्मपत्नी ने तुरंत डॉक्टर को फोन किया और एम्बुलेंस का इंतज़ाम करवाया। उन्हें लेकर हॉस्पिटल दौड़ीं।
“विनय जी, आप घबराएं मत। आप ठीक हो जाएंगे।” सुलोचना जी ने एम्बुलेंस में बैठते हुए कहा।
विनय जी ने मुस्कुराते हुए उनकी तरफ देखा और धीरे से बोले, “सुलू सुहागन तो मैं ही जाऊँगा।”
“बस करिए आप। हर समय मज़ाक अच्छी बात नहीं है।” सुलोचना जी ने रोते हुए कहा।
अस्पताल में जांच हुई तो पता चला कि विनय जी कोरोना से संक्रमित हैं। सुलोचना जी घबरा गई। पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। जब विनय जी की हालत थोड़ी सुधरी तो नर्स ने सुलोचना जी को कहा,”मांजी, आप यहांँ कब तक बैठेंगी? आप घर जाइए। आपकी रिपोर्ट भी कल तक आ जाएगी।”
सुलोचना जी की आंँखों में आंँसू थे। उन्होंने नम आंँखों से नर्स को देखा और विनय जी का फोन नर्स को देते हुए बोलीं ,”जब वो ठीक हो जाएंँ तो मेरी विडियो कॉल पर बात करवा देना।”
सुलोचना जी जाते समय डॉक्टर से मिलने गयीं।
“देखिए…हालत तो सही नहीं है। आप एक काम करिए, आप अपने बच्चों को बुलवा लीजिए।” डॉक्टर ने कहा।
“बच्चे….तो नहीं हैं…मतलब हमारे कोई संतान नहीं है। हम दोनों ही एक-दूसरे का सहारा हैं।” सुलोचना जी ने कहा।
“ओह! आप फ़िक्र ना करें। सब ठीक हो जाएगा।” डॉक्टर ने उन्हें तसल्ली दी।
सुलोचना जी घर पहुंच कर विनय जी की सलामती की दुआएं मांगती रहीं।
“ऐसे वक्त में बच्चों का सहारा बहुत बड़ी बात होती है। काश! तब मेरी बात मानकर तुमने और जीजू ने एक लड़का गोद ले लिया होता, तो आज तुम अकेली ना होती सुलोचना।” सुलोचना जी की बड़ी बहन ने दूसरे शहर से फोन पर बात करते हुए कहा।
“आपको पता है दीदी, एक हफ्ता पहले सिन्हा साहब, जो हमारे पड़ोसी हैं, उनका कोविड से निधन हो गया। चार बेटे हैं उनके। दो इंडिया में और दो बाहर। चारों में से कोई नहीं था उनकी अंतिम यात्रा पर। सबकुछ मिसेज सिन्हा ने किया।” सुलोचना जी ने कटाक्षपूर्ण लहज़े में कहा।
“तब भी वही ज़िद्द अब भी वही तेवर। जैसे करना है करो। हम तो कुछ कर नहीं सकते सिवाए दुआ मांगने के।” ये कह उनकी बहन ने फोन रख दिया।
सुबह नर्स ने विडियो कॉल किया और विनय जी का हाल-चाल बताया। फिर उनसे सुलोचना जी की बात करवाई।
एक-दूसरे को विडियो कॉल पर देखते ही दोनों की आंँखें नम हो गईं। “सुलू, तुम ठीक हो ना?”
सुलोचना जी की आंँखों से अनवरत आंँसू बहते चले गए। वो बोलीं, “हॉस्पिटल में आप हैं विनय जी, फिर भी मेरी चिंता कर रहें हैं?”
“तुम्हारी चिंता ना करुंँ तो किसकी करुंँ?” विनय जी थोड़ा मुस्कुराते हुए बोले। फिर एकाएक उदास हो गये और बोले “मैं…वापस ना आया तो? क्या करोगी?”
“विनय जी, अभी आपकी और मेरी कहानी पूरी कहांँ हुई है। आपको आना पड़ेगा। परसों मेरा जन्मदिन है। आज तक आपसे कुछ नहीं मांँगा, आज मांँगती हूंँ। आप मेरे जन्मदिन तक बिल्कुल तंदरुस्त होकर दिखाएंँगे। वादा कीजिए….” सुलोचना जी ने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा।
विनय जी मुस्कुराते हुए बोले, “पहली बार कुछ मांगा है तुमने। कैसे इंकार कर सकता हूं। वादा रहा सुलु!”
सुलोचना जी उनसे बात करने के बाद घंटों उनके साथ बिताए चालीस सालों के साथ को याद करती रहीं। कैसे उन दोनों ने अपने जीवन में आए सभी उतार चढ़ाव को एकसाथ पार किया। इस सफ़र में विनय जी की नौकरी छूटी, सुलोचना जी का भयंकर एक्सीडेंट हुआ, दोनों ने ताउम्र मां-बाप ना बन पाने के कारण बहुत ताने सहे। जीवन में खुशियों के पल भी आए जब उन्होंने मिलकर अपनी कमाई से अपना छोटा सा आशियाना बनाया। दोनों ने ज़िन्दगी भर एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ा। लॉकडाउन से पूर्व दोनों ने मिलकर गरीब बच्चों के लिए एक संस्था खोलने कि निर्णय लिया था जो अभी अधूरा था। सुलोचना जी को पूरा विश्वास था कि वो दोनों मिलकर अपने इस सपने को ज़रुर साकार करेंगे।
सुलोचना जी के जन्मदिवस के दिन सुबह नर्स ने विडियो कॉल किया। उसकी आंखें नम थीं। उसके मुंह से बोल नहीं निकल पा रहे थे। बस वह इतना ही बोल पाई,”अंकल आपसे बात करना चाहते हैं”
जब नर्स ने कैमरा विनय जी की तरफ घुमाया तो सुलोचना जी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। दो तीन डॉक्टर उन्हें घेर के खड़े थे। उनकी सांसें उखड़ रहीं थीं। उन्हें ऑक्सीजन दिया जा रहा था।
सुलोचना जी को देख उन्होंने नम आंँखों से हाथ जोड़ते हुए कहा,”सुलु! जन्म….दिन…. मुबारक….. मैं…. मैं वादा… नहीं…निभा…पाऊं… पाऊंँगा।”
सुलोचना जी किसी मूर्ति के समान जड़वत खड़ीं थीं। उन्हें अपनी आंँखों पे विश्वास नहीं हो रहा था कि उनके जीवन का एकमात्र साथी उनसे दूर जा रहा था। विनय जी की सांसें और तेज़ हो गईं। एकाएक सुलोचना जी ने गुनगुनाना शुरू कर दिया
तू धार है नदिया की
मैं तेरा किनारा हूँ
तू मेरा सहारा है
मैं तेरा सहारा हूँ
आँखों में समंदर है
आशाओं का पानी है
ज़िंदगी और……
तभी हॉस्पिटल में सब शांत हो गया। सारी मशीनें चुप हो गईं। डॉक्टरों ने माफ़ी मांगती आंखों से सुलोचना जी की तरफ देखा। सुलोचना जी की आंखें सिर्फ विनय जी के चेहरे पर थी। वो बोलीं, “विनय….अभी कहानी खत्म नहीं हुई। आप यूं मुझे धोखा नहीं दे सकते। एक तोहफा मांगा था वो भी आपने नहीं दिया।” ये कहते ही वो रो पड़ीं।
तभी टूटी-फूटी मद्धम आवाज़ उनके कानों में पड़ी,
“ज़िन्दगी…और…कुछ भी नहीं ….
तेरी…. मेरी कहानी… है….”
उन्होंने सिर उठाकर देखा तो विनय जी मुस्कुरा रहे थे। वह बोले, “मौत के मुंँह …से …वापस आया… हूंँ, तुम्हें… तोहफा…देने। तुम्हारी एक इच्छा…भी तो पूरी करनी थी…सुहागन बन इस …दुनिया से जाने की। तो कैसे…चले जाता।”
“विनय जी, पूरा जीवन साथ में जिया है हमने, तो यूँ साथ छोड़कर कैसे जा सकते हैं आप? साथ जीने मरने की झूठी कसमें खाईं थीं क्या?” सुलोचना जी रोआंसा होते हुए बोलीं।
विनय जी के चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान थी। सुलोचना जी ने अपने आंसू पौंछते हुए गाना शुरू किया, उनके साथ हॉस्पिटल का बाकी स्टाफ भी गाने लगा,
एक प्यार का नगमा है
मौजों की रवानी है
ज़िंदगी और कुछ भी नहीं
तेरी मेरी कहानी है।।
तभी अचानक फिर से सारी मशीनें शांत हो गईं। विनय जी के चेहरे पर अब भी मुस्कान थी। डॉक्टर ने दर्द भरी आँखों से उनकी तरफ देखा। नर्स उन्हें चेक करने के लिए दौड़ी, पर इस बार विनय सक्सेना सच में इस दुनिया को अलविदा कह चुके थे।
डॉक्टर ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से स्क्रीन पर सुलोचना जी की तरफ देखा। पर उस मंज़र ने वहाँ खड़े पूरे स्टाफ को हिला दिया।
सुलोचना जी भी अब इस दुनिया से विदा ले चुकी थीं। एक मासूम सी मुस्कान अब भी उनके चेहरे पर थी। पार्श्व में वही गीत बज रहा था,
ज़िन्दगी और कुछ भी नहीं….तेरी मेरी कहानी है!!
