गुप्त धन - गृहलक्ष्मी की कहानियां

तब संन्यासी ने अपनी झोली से कपड़े में लिपटा रुई से बने काग़ज पर लिखा एक लेख निकाला। काग़ज़ लंबा था, जन्म-पत्री के समान लिपटा था। संन्यासी ने उसको ज़मीन पर फैला दिया। हरिहर ने देखा, उसमें बने नाना प्रकार के चक्रों में अनेक प्रकार के सांकेतिक चिह्न अंकित थे, और सबके नीचे एक लंबी तुकबंदी लिखी हुई थी, जिसका आरंभ इस प्रकार था‒

पाये धरे साधा।

रा नाहि देय राधा।।

शेषे 1 दिल 2 रा।

पागोल छाड़ो पा।।

तेंतूल बटेर कोल 3,

दक्षिण याओ 4 चले।।

ईशानकोणे ईशानी

कहे दिलाम 5 निशानी। इत्यादि

हरिहर ने कहा, “बाबा, मैं तो कुछ भी नहीं समझा।”

संन्यासी बोले, “पास रख लो, देवी की पूजा करो। उनके प्रसाद से तुम्हारे वंश में कोई-न-कोई इस लिखावट को समझ सकेगा। उस समय वह इतना ऐश्वर्य पाएगा, जिसकी जग में तुलना नहीं।”

हरिहर ने मिन्नत करके कहा, “बाबा, क्या समझा न देंगे?”

संन्यासी ने कहा, “नहीं, साधना द्वारा समझना होगा।”

इसी समय हरिहर का छोटा भाई शंकर आ पहुँचा। उसको देखकर हरिहर ने चटपट लेख छिपाने की चेष्टा की। संन्यासी ने हँसकर कहा, “बड़े होने के रास्ते का दुःख अभी से शुरू हो गया। किन्तु छिपाने की आवश्यकता नहीं है। कारण, इसका रहस्य केवल एक ही व्यक्ति जान सकेगा। हज़ार प्रयत्न करने पर भी और कोई उसे नहीं जान पाएगा। तुममें से वह व्यक्ति कौन है, यह कोई नहीं जानता। अतएव इसे सबके सामने निर्भय खोलकर रख सकते हो।”

संन्यासी चले गए। किन्तु हरिहर उस काग़ज़ को छिपाकर रखे बिना न रह सका। कहीं और कोई इससे लाभान्वित न हो जाए, कहीं उसका छोटा भाई शंकर इसका फल-भोग न कर ले, इसी आशंका से हरिहर ने इस काग़ज़ को कटहल के काठ के एक बक्स में बंद करके अपनी आराध्य देवी जयकाली के आसन के नीचे छिपा दिया था। प्रत्येक अमावस्या की अर्धरात्रि को देवी की पूजा करके एक बार वह उस काग़ज़ को खोलकर देखता, काश देवी प्रसन्न होकर उसको अर्थ समझने की शक्ति दे दें।

कुछ दिन से शंकर हरिहर से विनती करने लगा था, “भैया, एक बार अच्छी तरह मुझे वह काग़ज़ देख लेने दो न!”

हरिहर ने कहा, “धत् पगले, वह काग़ज़ क्या अब धरा है। वह पाखंडी संन्यासी काग़ज़ में कुछ चीलबिलौआ बनाकर झाँसा दे गया था‒मैंने उसे जला डाला है।”

शंकर चुप रह गया। सहसा एक दिन शंकर घर में दिखाई नहीं दिया। उसके बाद से वह लापता रहा।

हरिहर का सारा काम-काज नष्ट हो गया‒गुप्त ऐश्वर्य का ध्यान वह क्षणभर के लिए भी न भूल सका।

मृत्यु-काल आ पहुँचने पर संन्यासी के दिए हुए उस काग़ज़ को वह अपने बड़े लड़के श्यामपद को दे गया।

यह काग़ज़ पाने पर श्यामापद ने नौकरी छोड़ दी। जयकाली की पूजा और एकाग्रचित्त से इस लेख के पाठ की चर्चा में उसका संपूर्ण जीवन कैसे बीत गया। इसका उसे पता भी न चला।

मृत्युंजय श्यामापद का बड़ा लड़का था। पिता की मृत्यु के पश्चात् वह संन्यासी के दिए हुए इस गुप्त लेख का अधिकारी हुआ। उसकी अवस्था उत्तरोत्तर जितनी ही ख़राब होती जाती थी, उतने ही आग्रह से उस काग़ज़ के प्रति उसका सारा ध्यान एकाग्र होता जाता। तभी गत अमावस्या की रात को पूजा के पश्चात् वह लेख नहीं दिखाई पड़ा‒संन्यासी भी कहीं अंतर्धान हो गया।

मृत्युंजय ने कहा, “उस संन्यासी को छोड़ने से काम न चलेगा। सारा पता उसी से मिलेगा।”

यह कहकर वह घर छोड़कर संन्यासी की खोज में निकला। एक वर्ष रास्तों में घूमते ही बीत गया।

गाँव का नाम धारागोल था। वहाँ मोदी की दुकान पर बैठा मृत्युंजय तंबाकू पी रहा था और अन्यमनस्क भाव से अनेक बातें सोच रहा था। कुछ दूरी पर मैदान की बग़ल से एक संन्यासी जा रहा था। पहले तो मृत्युंजय का ध्यान उधर नहीं गया, थोड़ी देर बाद सहसा उसे लगा, जो आदमी जा रहा था, यह वही संन्यासी है। झटपट हुक़्क़ा रखकर मोदी को आश्चर्य में डाल, एक दौड़ में वह दुकान से बाहर निकल गया। किन्तु, वह संन्यासी दिखाई नहीं दिया।

उस समय संध्या का अँधेरा हो गया था। अपरिचित स्थान में वह संन्यासी की खोज करने कहाँ जाए, यह निश्चय न कर सका। लौटकर दुकान पर आकर मोदी से पूछा, “यह जो सघन वन दिख रहा है, वहाँ क्या है?”

मोदी ने कहा, “किसी समय यह वन शहर था, किन्तु अगस्त्य मुनि के शाप से वहाँ के राजा-प्रज्ञा सब महामारी में मर गए। कहा जाता है, वहाँ खोजने से आज भी बहुत धन-रत्न मिल सकता है; किन्तु दिन-दोपहरी में भी कोई उस वन में जाने का साहस नहीं कर पाता। जो गया वह फिर कभी नहीं लौटा।”

मृत्युंजय का मन चंचल हो उठा। सारी रात मोदी की दुकान में चटाई पर लेटा वह मच्छरों के मारे अपने अंगों को चपेटता रहा और उस वन की बात, संन्यासी की बात, उस खोए हुए लेख की बात सोचता रहा। बार-बार पढ़ने के कारण वह लेख मृत्युंजय को प्रायः कंठस्थ हो गया था, इसलिए अनिद्रा की इस अवस्था में उसके मस्तिष्क में बस यही घूम रहा था‒

पये धरे साधा।

रा नाहिं देय राधा।।

शेषे दिल रा।

पागोल छाड़ो पा।।

सिर भन्ना गया, इन पंक्तियों को वह किसी भी प्रकार अपने मन से न निकाल सका। अंत में भोर वेला में जब उसे ज़रा झपकी आई, तब स्वप्न में इन चार पंक्तियों का अर्थ उसे अत्यंत सहज प्रतीत हुआ। ‘रा नाहिं देय राधा’ अर्थात् ‘राधा’ का ‘रा’ न रहने से ‘धा’ रह गया‒‘शेषे दिल रा’ अर्थात् ‘धारा’ हो गया‒‘पागोल छाड़ो पा’, ‘पागोल’ का ‘पा’ छोड़ देने से ‘गोल’ बाक़ी रहा‒अर्थात् सब मिलकर ‘धारागोल’ हुआ‒इस जगह का नाम तो ‘धारागोल’ ही है।

Leave a comment