Hindi Kahani: ” लक्ष्मी! चंदा बुआ की हालत अच्छी नहीँ है,चाहो तो आकर देख जाओ, तुम्हीं को बार-बार याद करती हैं” महेश से अपनी छोटी बहन से कहा।
टेलीफोन पर ये सुनकर, दूसरे शहर के कॉलेज में पढ़ रही लक्ष्मी का मन अपनी बुआ से मिलने को छटपटा उठा।
जब पहुँची तो सीधे उनके मन्दिरवाले कमरे में गयी ,बुआ ने उसका हाथ अपने कमज़ोर हाथों में थाम लिया ,बाकी घरवालों के लिये उनके मन में कोई आत्मीयता न थी।
चंदा बुआ का परिचय उसके लिए इतना ही था कि उन्हें जन्म से देखती आ रही थी घर में, वो बालविधवा जो थीं।
चार भाइयों के बीच अकेली बहन,जिसका विवाह सोलह वर्ष की आयु में कर दिया गया था।
द्विरागमन के बाद ही पति की रहस्यमय बुखार से मौत हो गयी ,और अपशकुनी कहकर बुआ को उनके क़ीमती बक्से के साथ सदा के लिये मायके भेज दिया गया।
लंबी ,गौरवर्णा और सुन्दर चन्दा बुआ का रूप चंद्रमा के समान था और उनकी बदकिस्मती उसका कलंक।
बुआ मन्दिर की सेवा के बाद अपने कमरे में अकेली रहा करती थीं,घर की सभी महिलाओं और बुआ के मध्य अघोषित सी दूरी थी।
पर बच्चों को छूट थी उनसे नेह लगाने की क्योंकि हवेली में उनके हिस्से और गहनों पर सबकी नज़र जो थी।
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बुआ के कमरे में हवन पूजन की सुगन्ध ख़ूब रहती और रात को उनके कमरे में जाने की मनाही हुआ करती।
हाँ लक्ष्मी बेरोकटोक उनके पास चली जाती थी, कभी व्यंजनों की शौकीन बुआ अपना अब रूखा सूखा भोजन ख़ुद बनातीं।
बर्तन माँजने को उन्हें एक सेवक श्यामल ज़रूर मिला हुआ था, जो उनके ज़रूरी बाहर के काम किया करता था।
एक रात बड़ा हँगामा सुना उसने ,जब श्यामल को बुआ के कमरे से निकलते देखा गया था।
उस रात के कुछ दिन बाद तक बुआ के बदन पर नीले दाग के निशान उसने देखे।जैसे किसी ने उन्हें बहुत मारा हो।
अगले दिन से कई महीनों तक हवेली में झगड़े की आवाज़ें आतीं रहीं ,उन बातों का केंद्र बिन्दु होतीं बुआ।
बहुत पहले सफ़ेद साड़ी पहनने वाली बुआ अब गेरुआ से लबादे में रहतीं थीं,सँसार के लिये स्वपाकी,विरक्त सन्यासिनी जिनका जीवन अब देवी माँ की सम्पत्ति था।
उनके मन्दिर नुमा कमरे में देवी की विशाल मूर्ति थी,सत्संग भी करतीं पर खातीं रूखा सूखा, सबकुछ उनके लिये निषिद्ध था।
बचपन मे तो कुछ समझ में नहीं आया पर बड़े होने पर समझ आया कि क्योँ उसका कमरा और बुआ का कमरा सटा हुआ था और बीच में खिड़की का क्या रहस्य था?
उनपर नज़र रखने के लिये….
लक्ष्मी धीरे-धीरे यह जरूर समझने लगी थी कि जमाने के लिये रूखी बुआ उतनी रूखी भी न थीं
एक रात कॉलेज की परीक्षा की तैयारी लक्ष्मी की आँख खुली तो पाया बुआ के कमरे में रोशनी है,बुआ ने ढ़िबरी की रोशनी में अपने सारे ज़ेवर पहनकर रखे हुए थे।
देवी को दिखाने वाले दर्पण में देखने के कुछ देर बाद उसने सब वापस पहले सा कर दिया।
उसे खिड़की से टुकुर -टुकुर ताकते देखा ,तो कातरता से बोलीं किसी से इस बारे में कुछ कहना मत.
हाय बुआ !अगर तुम माँ की तरह तैयार रहो तो कितनी सुन्दर लगोगी,ये गेरुआ झिंगोला मत पहना करो।
“कैसी देवी माँ की तरह लग रही हो ,फिर तुम पर तो देवी भी आती हैं,तो उन्ही की तरह रहा करो न ,”उसने सरलता से कहा।
उसे बुआ, देवी आने के कारण गाँववालों की तरह बड़ी शक्तिशाली लगती थीं।
आज वही बुआ मरणासन्न पड़ी हुई थीं,बुआ ! उसने स्नेह से कहा।
आ गयी बिटिया,
हाँ वो चिंतातुर होकर बोली ।
तू मेरी अँतिम इच्छा पूरी करेगी हाँ बुआ बताओ वो जल्दी से बोली।
तू रात को मेरे लिये शाही थाली ले आना होटल से,पर कोई देख न पाये।
जन्म भर रूखा -सूखा फलाहार करने वाली बुआ का यह आदेश अजीब था।
उसने ऐसा ही किया ,जिन्दगी भर तरसी बुआ ने पेट भरकर खाया।
फिर बोलीं देवी जिस आसन पर विराजित हैं,उसके नीचे गुप्त तिजोरी है,उसमें मेरे जेवर हैं और बक्से में मेरी बनारसी साड़ी,आज मुझे दुल्हन जैसा सजा दे तू।
“”पर बुआ वो तो चोरी हो गये थे ?
,न री !उन्हें कैसे खोने देती ,वो मेरी जिजीविषा हैं।
मद्धम रोशनी और उस उपेक्षित कमरे में यूँ भी कोई आता न था।
लक्ष्मी ने बुआ को पहली बार अपने हाथों से वह लबादा उतारकर सजाया ,बुआ ने दर्पण में खुद को देखा,
फिर बोलीं ,स्त्री पति के जाने से कम,उसका श्रृंगार और प्रेम छीने जाने से अधिक मर जाती है,अब सब पहले जैसा कर दे।
फिर बुआ ने लक्ष्मी के हाथों में ज़ेवर की पोटली रखते हुए ,”ये तुम्हारा”..
“बिटिया ये देवी का आगमन तो अपने आसपास घूमते भेड़ियों के लिये जलती लकड़ियों का अलाव भर है।”
“भेड़िये? कहाँ हैं भेड़िये बुआ”?,”
वो रहस्योद्घाटन करते हुए बोलीं,जँगल के नहीं…. समाज के तुझे पता है ,उस रात कमरे में मेरे बिसेसर चाचा और पुजारी घुस आये थे।
दोनोँ को मेरी देह, ज़ेवर और ये जमीन का हिस्सा चाहिये था और पुजारी बनता समाजमें मुझे चरित्रहीन घोषित करनेवाला, कुछ पैसों के बदले ।
लक्ष्मी की आँखे कौतूहल से फैलती चली गयीं,उसने थूक गटकते हुए कहा…
” फिर?”
हम इंसानों से पशु अच्छे… जिनमें सिर्फ़ नर-मादा का नाता होता है,रिश्तों का कपट नहीं ।
श्यामल के कानों में उनकी बात पड़ गयी थी,उसे मुझसे सच्चा प्रेम था सो उनकी की नीयत से , उसने मुझे सतर्क कर दिया।
ज़ेवर तो मैंने गायब कर दिये ,कुछ दिन बाद वही दोनोँ मेरे पास पास आये थे ,पर मैं डरी नहीं उनका मुकाबला किया।
बलात्कार की कोशिश में असफल उन लोगों ने मुझे घरवालों के आगे ही चरित्रहीन सिद्ध करने की कोशिश की
उस रोज़ त्रिशूल पकड़कर मैंने देवी आने का अभिनय किया ….
सबके कुछ भेद खोले फि,उनके तन पर मेरे द्वारा छोड़े बचाव के निशानों के भी,
समाज से वे अपराधी सिद्ध कर दिये।
समाज अपने अशुभ से डरता है,और इस तरह देवी के अलाव में मैँ निर्विघ्न जीवित रह गयी।
फिर आज क्यो?
आपने जन्मभर का नियम खंडित कर दिया।
सुना है ….कोई इच्छा बाकी रह जाये,तो मोक्ष नहीं मिलता और मुझे मोक्ष चाहिये।
कहकर उन्होंने साँसों के साथ मुट्ठी में बन्द श्यामल का प्रेमपत्र मुक्त कर दिया।
