Story in Hindi: डॉक्टर अनिरुद्ध देसाई, शहर के जाने माने दिल के सर्जन थे। बहुत नाम था उनका। आज वो बेंगलुरु में एक कॉन्फ्रेंस के लिए आए थे और रात को उन्हें एक मीटिंग के लिए चैनेई पहुंचना था। वो दोपहर को ही चैनेई के लिए रवाना हो गए।
पर रास्ते में बारिश प्रारंभ हो गई। और हाईवे तक जाम लग गया।
“ओहो! ये क्या हो गया? मेरा मीटिंग में पहुंचना बहुत ज़रूरी है। कुछ करो ड्राइवर।” डॉक्टर अनिरुद्ध व्याकुल होते हुए बोले।
“साहब आगे से एक कच्चा रास्ता है जो हमें इस ट्रेफिक से बचा सकता है। अगर आप… कहें तो… चलें उस पर।” ड्राइवर ने अपनी राय दी।
डॉक्टर अनिरुद्ध को बहुत उत्सुकता थी पहुंचने की तो उन्होंने फटाफट बिना कुछ सोचे हां कर दी।
अब उनकी गाड़ी उस संकीर्ण से रास्ते से होकर गुज़र रही थी। बारिश थी कि थमने का नाम ही नहीं ले रही थी।
अचानक बारिश और तेज हो गई। ड्राइवर के लिए गाड़ी चलाना मुश्किल हो गया था। वो बार-बार डॉक्टर अनिरुद्ध से वहीं कहीं रुकने को कहता रहा। पर डॉक्टर अनिरुद्ध मन बना कर बैठे थे कि आज वो हर हालत में मीटिंग में शरीक होकर ही रहेंगे।
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तभी एक संकीर्ण से सुनसान रास्ते पर गाड़ी का टायर पंचर हो गया।
“अरे! ये क्या हो गया?” डॉक्टर अनिरुद्ध ने पूछा।
“साहब, मैं आपको बोल रहा था कि पीछे कहीं गांव में रुक जाते हैं। पर आप तो ज़िद्द पर अड़े थे। अब देख लो अंजाम।” ड्राइवर ने थोड़ा तल्ख होते हुए कहा।
“अब इस मुसीबत से कैसे निपटें ये सोऐचो।” डॉक्टर अनिरुद्ध ने कहा।
ड्राइवर ने इधर-उधर नज़र घुमाई। उसे कुछ दूर खेतों के बीच एक झोपड़ी दिखाई दी। उसमें हल्की सी रौशनी हो रही थी। वह उत्साहित होकर बोला,”साहब, वो देखिए। कुछ दूर पर एक झोंपड़ी है। वहां चलते हैं।”
डॉक्टर अनिरुद्ध के पास और कोई चारा नहीं बचा था। इसलिए वो गाड़ी से उतर कर ड्राइवर के पीछे-पीछे चल पड़ा।
झोंपड़ी के पास पहुंच वहां झांक कर देखा तो दरवाज़ा खुला था। वह दोनों अंदर घुस गये। अंदर का नज़ारा हृदय को रुला देने वाला था।
जगह-जगह झत से पानी टपक रहा था। जिसके लिए जगह-जगह मटके लगा रखे थे। एक टूटी-फूटी चारपाई पर एक छोटा बालक सो रहा था। एक छोटा सा स्टोव था जिसके आसपास कुछ बर्तन पड़े थे। एक बुजुर्ग महिला भगवान की मूर्ति के आगे कुछ मंत्रों का उच्चारण कर रही थी।
डॉक्टर अनिरुद्ध आश्चर्य चकित रह गए। इतनी गरीब अवस्था में भी ये महिला भगवान का स्मरण कर रही है।
उसने उस महिला का ध्यान अपनी ओर खींचने केे लिए थोड़ा सा खांसा।
महिला ने उसे इशारे से चारपाई पर बैठने को कहा। पर डॉक्टर अनिरुद्ध वहीं खड़े रहे। वो सोए हुए बच्चे को नींद से उठाना नहीं चाहते थे।
प्रार्थना खत्म करने के बाद वह महिला उठीं और डॉक्टर अनिरुद्ध के पास आकर बोली,”आप बैठिए ना। बारिश बहुत ज़ोर से हो रही है। शायद गाड़ी फंस गयी होगी आपकी।”
“जी, आप ठीक कह रही हैं। बारिश खत्म होने तक मैं यहां रुक… सकता हूं?” डॉक्टर अनिरुद्ध ने हिचकिचाते हुए पूछा।
“बिल्कुल, कोई समस्या नहीं है साहब। आप यहां चारपाई पर बैठ कर आराम करें। साहब, मेरे पास आपको खिलाने के लिए… इस समय कुछ नहीं है… मैं…” वह बुज़ुर्ग महिला बोली।
“आप परेशान ना हों। मुझे कुछ नहीं चाहिए।” डॉक्टर अनिरुद्ध ने कहा।
तभी चारपाई पर लेटा छोटा बच्चा अचानक खांसने लगा। बुज़ुर्ग महिला उसकी तरफ बढ़ी और उसकी पीठ थपथपाने लगी।
डॉक्टर अनिरुद्ध तुरंत उसके पास गये और बोले,”क्या हुआ है इस बच्चे को।”
वह बुज़ुर्ग महिला आंखों के आंसू पोंछते हुए बोली,”साहब, ये मेरा पोता है। दो साल से ये बिमार है। पिछले साल इसके मां-बाप सड़क हादसे का शिकार हो चल बसे। तब से इसकी बिमारी का सारा भार मुझ पर आ गया।”
“पर इसे हुआ क्या है?” डॉक्टर अनिरुद्ध ने पूछा।
“साहब इसके दिल में छेद है। और बड़े गांव के डॉक्टर ने इसे शहर ले जाकर इलाज कराने को कहा था।”
“तो आप लेकर गयी क्या इसे?” डॉक्टर अनिरुद्ध ने उसकी माली हालत देख अचरज में पूछा।
“साहब, कैसे ना जाती। अपनी मां का कंगन जो मेरे पास उसकी आखरी निशानी था उसे बेच मैं इसे लेकर गयी। पर वहां के डॉक्टर लोग बोले कि इसका इलाज केवल एक ही डॉक्टर कर सकता है। पर उसके लिए मुझे इसे लेकर दिल्ली जाना पड़ेगा और खर्चा भी बहुत बताया। अब साहब मैं कहां से लाती इतना पैसा। मैंने बहुत महीनों तक उन डॉक्टर बाबू को खत भी लिखे कि वो मेरे पोते का इलाज का कोई उपाय बताएं। पर आज तक कोई जवाब नहीं मिला। कल ही अपनी तरफ से आखरी ख़त डाल कर आई हूं। अब तो डाक टिकट भी खत्म हो गई और हिम्मत भी। पर रोज़ अपने अराध्य देव के आगे प्रार्थना करती हूं कि कोई चमत्कार हो जाए और मेरा पोता बच जाए।” वो बुजुर्ग महिला अपने देव की तरफ़ हाथ जोड़ते हुए बोली।
“क्या नाम है उस डॉक्टर का जो इसका इलाज कर सकता है?” डॉक्टर अनिरुद्ध ने पूछा।
“कोई…अनि… अनिरुद्ध… हां अनिरुद्ध देसाई हैं।” वह बोलीं।
डॉक्टर अनिरुद्ध चौंक गए। उन्होंने मुस्कुराते हुए उस बच्चे के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,”आज आपके अराध्य देव ने आपकी पुकार सुन ली अम्मा। मैं ही डॉक्टर अनिरुद्ध देसाई हूं।”
वह बुज़ुर्ग महिला अपने कानों पर विश्वास नहीं कर पाई। खुशी के मारे उसकी आंखों से आंसू बह निकले। वह हाथ जोड़ती हुई अपने भगवान के चरणों में नतमस्तक हो गई। और उनका शुक्रिया अदा करने लगी।
फिर वह एकाएक मुड़ी और बोली,”साहब,पर मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं….आप बिना पैसों के…?”
“आप उसकी चिंता ना करें अम्मा। अब आपका पोता मेरी ज़िम्मेदारी है। आज आपकी भगवान पर श्रद्धा देख मुझ जैसे नास्तिक इंसान की आस्था भी भगवान में बढ़ गई। अब समझा कि क्यों आज मैंने ड्राइवर के बार-बार आग्रह करने पर भी उसे आगे बढ़ते रहने को कहा। आपकी भगवान पर अटूट श्रद्धा मुझे खींचकर यहां ले आई। अब कल हम सब दिल्ली चलेंगे और मैं इसका इलाज शुरू कर दूंगा।” डॉक्टर अनिरुद्ध ने कहा।
उस बुज़ुर्ग महिला ने उसका शुक्रिया किया और फिर से भगवान की अराधना में लग गयी। उसका डाला हुआ आखरी ख़त आखिरकार एक चमत्कार के रूप में सामने आया। भगवान ने इतने महीनों बाद सही पर उसके ख़त के जवाब में डॉक्टर को ही उसके पास भेज दिया। इच्छा शक्ति के आगे भगवान को भी झुकना पड़ता है।
