गृहलक्ष्मी की कहानियां

महामाया और राजीव लोचन दोनों का नदी किनारे एक भग्नमंदिर में साक्षात्कार हुआ।
महामाया ने बिना कुछ बोले अपनी स्वाभाविक गंभीर दृष्टि कुछ भर्त्सना के भाव से राजीव पर डाली। उसका आशय यह था कि “तुम किस साहस से आज असमय ही मुझे यहां बुला लाए हो। मैं अब तक तुम्हारी सब बातें सुनती चली आई हूं, इसी से तुम्हारा दुस्साहस बढ़ गया है?”

राजीव एक तो हमेशा महामाया से कुछ सहमा-सा रहता, उस पर इस दृष्टिपात ने उसे भारी विचलित कर दिया। दो-चार बातें सजाकर कहने को सोचा था, उस आशा को उसी क्षण तिलांजलि देनी पड़ी। पर अविलंब इस मिलन का कोई एक कारण न दिखाने से भी नहीं चलेगा, इससे जल्दी से कह बैठा, “मेरा कहना है कि यहाँ से भागकर हम दोनों विवाह कर लें”‒राजीव के कहने का जो उद्देश्य था, यह बात उसने ठीक ही जता दी, पर जो भूमिका मन-ही-मन तय कर आया था उसका कुछ भी नहीं हुआ। बात बिलकुल नीरस और निरलंकार थी, यहाँ तक कि सुनने में भी कुछ विचित्र-सी लगी। ख़ुद कहकर वह ख़ुद ही हक्का-बक्का रह गया‒और दो-चार बातें जोड़कर उसको कुछ मृदु बना देगा, इसकी सामर्थ्य भी न रही। नदी किनारे भग्न-मंदिर में इस मध्याह्न बेला में महामाया को बुला निर्बोध व्यक्ति ने बस इतना ही कहा, “चलो, हम विवाह कर लें।”

महामाया कुलीन घराने की कुमारी थी। आयु चौबीस वर्ष। जैसी भरी उम्र, वैसा ही भरा सौंदर्य। जैसे शरत्कालीन धूप की तरह कच्चे सोने की प्रतिमा हो‒धूप जैसी ही दीप्त तथा नीरव और उसकी दृष्टि दिवालोक के समान उन्मुक्त और निर्भीक।

उसके पिता नहीं हैं, बड़े भाई हैं‒नाम है भवानीचरण चट्टोपाध्याय। भाई-बहन क़रीब-क़रीब एक ही प्रकृति के हैं‒मुँह में शब्द नहीं, किन्तु चेहरे पर ऐसा तेज़ है, जो दिन के दोपहर के समान चुपचाप दहकता रहता है। लोग भवानीचरण से बिना कारण ही डरते।

राजीव परदेसी है। यहाँ की रेशम कोठी के बड़े साहब उसे अपने साथ लाए थे। राजीव के पिता इन साहब के कर्मचारी थे; उनकी मृत्यु के बाद उनके कम उम्र के पुत्र के भरण-पोषण का भार स्वयं लेकर उसे बचपन में ही वामन हाटि की कोठी में ले आए हैं। बालक के साथ केवल उसकी स्नेहशीला बुआ रहती थी। ये भवानीचरण के पड़ोस में रहते थे। महामाया राजीव की बाल्य-सखी थी और राजीव की बुआ के साथ उसका गहरा स्नेह-बंधन था। राजीव की उम्र बढ़ते हुए सोलह, सत्रह, अठारह यहाँ तक कि उन्नीस हो चली, फिर भी बुआ के अनेक अनुरोध के बावजूद विवाह करना नहीं चाहता। साब बंगाली लड़के की ऐसी असाधारण बुद्धि का परिचय पाकर अत्यंत प्रसन्न हुए; सोचा, लड़के ने उन्हें ही अपने जीवन की आदर्श भूमि बनाया है, साहब अविवाहित थे। इस बीच उसकी बुआ की भी मृत्यु हो गई।

इधर अपनी क्षमता से कहीं अधिक व्यय के अलावा महामाया के लिए भी अनुरूप कुल-संपन्न पात्र नही लिख रहा था। उसकी भी कुमारी आयु बढ़ने लगी।

पाठकों को कहना न होगा कि परिणय बंधन जिस देवता का कार्य है, यद्यपि वे इस नर-नारी युगल के प्रति अब तक किसी विशेष अरुचि का प्रदर्शन नहीं करते आ रहे हैं; लेकिन प्रणय-बंधन का भार जिन पर है, उन्होंने इतने दिन समय नष्ट नहीं किया। वृद्ध प्रजापति जब ऊँघ रहे थे, युवा कंदर्प तब पूरी तरह सजग होकर विराज रहे थे।

भगवान कंदर्प का प्रभाव भिन्न व्यक्तियों पर भिन्न रूप में प्रकट होता है। राजीव उनकी प्रेरणा से दो-चार मन की बातें कहने का अवसर ढूँढता रहता, महामाया उसे वह अवसर नहीं देती‒उसकी निस्तब्ध गंभीर दृष्टि राजीव के व्याकुल हृदय में एक प्रकार की भीति का संचार कर देती।

आज सैकड़ों बार सिर की क़सम देकर राजीव महामाया को इस भग्न-मंदिर में लाने में सफल हुआ। इसलिए सोचा था, जितना कुछ कहने को है, आज सब कह डालेगा, उसके बाद कदाचित् आमरण सुख नहीं तो आजीवन मृत्यु। जीवन के ऐसे एक संकट की घड़ी में राजीव ने बस इतना ही कहा, “चलो, तब विवाह कर लें।” और उसके बाद विस्मृत-पाठ छात्र के समान हक्का-बक्का हो चुप रह गया। राजीव इस प्रकार का प्रस्ताव करेगा, महामाया को जैसे ऐसी आशा नहीं थी। बहुत देर तक इसलिए वह चुप्पी साधे रही।

मध्याह्न वेला की कई अनिर्दिष्ट करुण ध्वनियाँ हैं, वे सब इस निस्तब्धता में फूटने लगीं। वायु में मंदिर का अर्ध-संलग्न भग्न द्वार रह-रहकर अत्यंत मृदु मंद आर्त्त स्वर के साथ धीरे-धीरे खुलने और बंद होने लगा। मंदिर के गवाक्ष में बैठा कबूतर बक…बकम् बोलता, बाहर सेमल वृक्ष की शाखा पर बैठा कठफोड़वा एकरसता में ठक्-ठक् शब्द करता, सूखे पत्तों के ढेर में से गिलहरी सर-सर शब्द करती दौड़ जाती, अचानक एक गर्म हवा का बगूला-सा उठता और मैदान की ओर से आकर सारे पेड़ के पत्तों में झर्-झर् उठता और सहसा नदी का जल जमकर टूटे घाट की सीढ़ियों पर छलात्-छलात् स्वर से टकराता रहता। इन सारे आकस्मिक अलस शब्दों के बीच बहुत दूर तरुतल से एक चरवाहे की वंशी में ग्रामीण सुर बज रहा है। राजीव महामाया के मुख की ओर ताकने का साहस न कर मंदिर की दीवार के सहारे खड़ा एक तरह से शांत स्वप्नविष्ट के समान नदी की ओर ताक रहा है।

कुछ देर बाद मुँह फेरकर राजीव ने और एक बार भिक्षुक के भाव से महामाया के मुँह की ओर ताका। महामाया ने सिर हिलाकर कहा, “नहीं, यह नहीं हो सकता।”

महामाया का सिर जैसे ही हिला राजीव की आशा भी वैसे ही भूमिसात् हो गई। क्योंकि राजीव यह अच्छी तरह जानता था, महामाया का सिर महामाया के अपने नियमानुसार ही हिलता है; और किसी में सामर्थ्य नहीं कि उसे उसके मत से विचलित करे। प्रबल कुलाभिमान महामाया के वंश में कितने काल से प्रवाहित हो रहा है‒वह क्या कभी भी राजीव के समान अकुलीन ब्राह्मण से विवाह के लिए राज़ी हो सकती है। प्यार करना एक बात और विवाह करना दूसरी बात। जो भी हो, महामाया ने समझा, उसके ही विवेकहीन व्यवहार से राजीव का दुस्साहस बढ़ा है। उसी क्षण वह मंदिर छोड़कर जाने को तैयार हो गई।

राजीव ने परिस्थिति समझकर जल्दी में कहा, “मैं कल ही इस शहर से चला जा रहा हूँ।”

महामाया ने पहले सोचा ऐसा भाव दिखाएगी ‘इस ख़बर से मुझे क्या करना’, लेकिन दिखा न सकी। पैर उठाने पर भी पैर नहीं उठे। ‒शांत भाव से पूछा, “क्यों?”

राजीव ने कहा, “मेरे साहब की यहाँ से सोनापुर की कोठी में बदली हो रही है, मुझे भी साथ ले जा रहे हैं।”

महामाया बहुत देर तक चुप रही। सोचकर देखा, दोनों के जीवन की गति दो ओर है‒एक व्यक्ति को जीवन भर नज़रबंद नहीं रखा जा सकता है। इसीलिए बंद होंठों को थोड़ा-सा खोलकर बोली, “अच्छा।” जो बहुत कुछ गहरी दीर्घ निश्वास-सा सुनाई पड़ा।

केवल इतनी बात कहकर महामाया फिर जाने को तैयार हो रही थी कि इतने में राजीव चौंककर बोला, “चाटुर्ज्या महाशय!”

महामाया ने देखा, भवानीचरण मंदिर की ओर आ रहे हैं; वह समझ गई उन्हें उनकी ख़बर मिल गई है। राजीव ने महामाया पर आई विपदा की संभावना देख मंदिर की टूटी दीवार को फाँदकर बाहर जाने की चेष्टा की। लेकिन महामाया ने बलपूर्वक उसका हाथ पकड़ अटकाए रखा। भवानीचरण ने मंदिर में प्रवेश किया‒केवल एक बार मौन निस्तब्ध भाव से दोनों पर दृष्टिपात किया।

महामाया राजीव की ओर देखकर अविचिलित भाव से बोली, “राजीव, मैं तुम्हारे ही घर जाऊँगी। तुम मेरी प्रतीक्षा करना।”

भवानीचरण चुपचाप मंदिर के बाहर आए, महामाया ने भी निःशब्द भाव से उनका अनुमगन किया‒और राजीव हक्का-बक्का खड़ा रहा, जैसे उसे फाँसी का हुक्म हुआ हो।

उसी रात भवानीचरण ने एक चेली1 लाकर महामाया से कहा, “यह पहनकर आओ।” महामाया पहन आई।

फिर कहा, “मेरे साथ चलो।”

भवानीचरण का आदेश, यहाँ तक कि संकेत की भी कभी किसी ने अनसुनी नहीं की। महामाया ने भी नहीं।

उसी रात दोनों नदी किनारे श्मशान की ओर चले। शमशान घर से अधिक दूर नहीं था। वहाँ गंगा यात्री के कमरे में एक वृद्ध ब्राह्मण मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था। उसी की खटिया के पास दोनों जा खड़े हुए। कमरे के एक कोने में पुरोहित ब्राह्मण उपस्थित था, भवानीचरण ने उसे इशारा दिया। वह अविलंब शुभानुष्ठान का आयोजन कर तैयार खड़ा हो गया; महामाया ने समझा इसी मुमूर्षु के साथ उसका विवाह होना है। उसने लेशमात्र भी आपत्ति प्रकट नहीं की। दो निकटवर्ती चिताओं के प्रकाश में अंधकार प्रायः कमरे में मृत्यु-यंत्रणा की आर्तध्वनि के साथ अस्पष्ट मंत्रोच्चारण मिश्रित कर महामाया का विवाह हो गया।

जिस दिन विवाह हुआ, उसके दूसरे दिन ही महामाया विधवा हो गई। इस दुर्घटना में विधवा ने तनिक भी शोक का अनुभव नहीं किया‒और राजीव भी महामाया के अकस्मात् विवाह-समाचार से जैसा वज्राहत हुआ था, वैधव्य-संवाद से वैसा नहीं हुआ। यहाँ तक कि किंचित् प्रसन्नता का अनुभव करने लगा। किंतु, वह भाव अधिक देर तक स्थायी नहीं हुआ और एक दूसरे वज्रघात ने राजीव को बिल्कुल धराशायी कर दिया। उसे समाचार मिला, श्मशान में आज भारी धूम मची है। महामाया सती होने जा रही है।

पहले ही उसने सोचा, साहब को ख़बर देकर उनकी सहायता से इस अत्यंत निष्ठुर घटना का बलपूर्वक विरोध करेगा। फिर स्मरण आया, साहब आज ही बदली का आदेश पाकर सोनापुर रवाना हो गए हैं‒राजीव को भी साथ ले जाना चाहा था, किन्तु राजीव एक महीने की छुट्टी लेकर रुक गया।

महामाया ने उससे कहा है, “तुम मेरे लिए प्रतीक्षा करना।” इस बात को वह किसी भी तरह भूल नहीं सकता। अभी एक महीने की छुट्टी ली है, आवश्यक होने पर दो महीने, फिर तीन महीने‒और अंत में साहब का काम छोड़कर द्वार-द्वार भिक्षा माँगकर खाएगा, फिर भी जीवन-भर प्रतीक्षा करना छोड़ेगा नहीं।

राजीव जब पागल के समान दौड़ता आया तो आत्महत्या या और कुछ करने की सोच ही रहा था, उसी समय संध्याकाल में मूसलाधार वर्षा के साथ एक प्रलय झंझा उपस्थित हुई। ऐसा झंझावात कि राजीव को लगा, सिर पर घर टूट पड़ेगा। उसने पाया कि बाह्य-प्रकृति में भी उसके अंतर के अनुरूप एक महाविप्लव उपस्थित हुआ है, तब जैसे वह कुछ शांत हुआ। उसे लगा, सारी प्रकृति ने उसकी ओर से किसी प्रकार का प्रतिविधान करना आरंभ कर दिया है। वह स्वयं जीवन-शक्ति प्रयोग की इच्छा मात्र करता किन्तु कर नहीं सकता था, प्रकृति आकाश-पाताल घेरकर उतनी शक्ति प्रयोग कर काम कर रही हैं।

इतने में बाहर से किसी ने ज़ोर से दरवाज़ा ठेला। राजीव ने जल्दी से खोल दिया। गीले वस्त्रों में किसी स्त्री ने कमरे में प्रवेश किया, लंबे घूँघट में उसका पूरा चेहरा ढँका था। राजीव ने उसी क्षण उसे पहचान लिया, वह महामाया थी।

उसने उच्छ्वसित स्वर में पूछा, “महामाया, तुम चिता से उठकर आई हो?”

महामाया ने कहा, “हाँ। लेकिन राजीव, मैं अब वह नहीं रही, मेरा सब कुछ बदल गया है। केवल मन से ही मैं वही महामाया हूँ। अभी भी कह दो, अब भी मैं अपनी चिता में लौट सकती हूँ।”

मृत्यु के हाथ से लौटाकर पाना ही पर्याप्त है; तब और सब तुच्छ जान पड़ता है। राजीव ने जल्दी से कहा, “तुम्हारी जैसी इच्छा, वैसे ही रहना‒मुझे छोड़कर चली गई तो मैं बचूँगा नहीं।”

महामाया ने कहा, “तब अभी चलो‒तुम्हारे साहब जहाँ बदली होकर चले गए हैं, वहीं चलें।”

घर में जो कुछ था, सब छोड़कर राजीव महामाया को लेकर उस आँधी में बाहर निकला। ऐसी आँधी कि खड़ा होना तक मुश्किल‒आँधी के वेग में कंकड़ उड़कर आते और फेंके गए छर्रे के टुकड़े के समान शरीर को भेदने लगते। सिर पर पेड़ के टूट गिरने के भय से पथ छोड़कर दोनों खुले मैदान में से होकर चलने लगे। वायु का वेग पीछे से आघात करता। जैसे आँधी-प्रलय से दो प्राणियों को छीन कर प्रलय की ओर उड़ाकर लिये जा रही है।

पाठक, आप इस कहानी को बिलकुल काल्पनिक या अलौकिक न मान लें। जब सह-मरण प्रथा प्रचलित थी, तब ऐसी घटनाएँ अकसर घटित होती सुनी जाती थीं।

महामाया के हाथ-पैर बाँधकर उसे चिता में समर्पण कर यथासमय अग्नि प्रयोग किया गया था। अग्नि भी धू-धूकर प्रज्ज्वलित हो उठी, इतने में प्रचंड आँधी और मूसलाधार वर्षा शुरू हो गई। जो दाह करने आए थे, उन्होंने जल्दी से गंगायात्री के कमरे में आश्रय ले द्वार बंद कर लिया। वर्षा में चितानल को बुझते देर न लगी। इस बीच महामाया के हाथ का बंधन भस्म हुआ और उसके दानों हाथ मुक्त हो गए। असह्य दाह-यंत्रणा में एक भी शब्द न उच्चरित कर महामाया ने उठ-बैठ पैर के बंधन खोले। उसके बाद, स्थान-स्थान पर जले वस्त्र-खंड शरीर में लपेट नग्नप्रायः महामाया चिता से उठकर पहले अपने घर आई। घर में कोई भी नहीं था, सभी श्मशान में गए हुए थे। दीया जलाकर साड़ी पहनकर महामाया ने एक बार दर्पण में मुख देखा। फिर उस दर्पण को ज़मीन पर पटककर एक बार जाने क्या सोचा। उसके बाद चेहरे पर लंबा घूंघट खींच पास ही राजीव के घर जा पहुँची। उसके बाद की घटना पाठक से छिपी नहीं है।

महामाया अब राजीव के घर में है, लेकिन राजीव के जीवन में सुख नहीं। अधिक नहीं, दोनों के बीच केवल एक घूँघट मात्र का व्यवधान है। लेकिन वह घूँघट मात्र मृत्यु के भीतर की निस्तब्धता द्विगुणित दुःसह लगती। वह जैसे एक मृत्यु द्वारा आवृत हो वास कर रहा है। यह निस्तब्ध मृत्यु राजीव के जीवन को आलिंगन कर प्रतिदिन जैसे विशीर्ण करने लगी। राजीव इसके पहले जिस महामाया को जानता था उसे भी खोया और उसकी उस शैशव सुंदर स्मृति को जो उसने अपने संसार में सँजोकर रखा था‒यह घूँघटावृत में हमेशा पास में रहकर भी नीरव भाव से उसमें बाधा देने लगी। राजीव सोचता, मनुष्य-मनुष्य के बीच स्वभावतः यथेष्ट व्यवधान है‒विशेषतः महामाया पुराण-वर्णित कर्ण के समान सहज कवच-धारिणी हो उठी है; उसने अपने स्वभाव के चारों ओर एक बार जन्म लेकर फिर एक और आवरण ले आई है। निरंतर बग़ल में रहकर भी वह इतनी दूर चली गई है और राजीव जैसे उसे अपनी पहुँच में नहीं पाता‒केवल एक मायावेष्टन के बाहर बैठ अतृप्त तृषित हृदय से इस सूक्ष्म‒साथ ही, अटल रहस्य-भेदन की चेष्टा कर रहा है‒नक्षत्र जैसे प्रतिरात्रि निद्राहीन निर्निमेष नत नेत्र से अंधकार निशीथिनी को भेद करने के प्रयास में निष्फल निशि-यान करता रहता है।

ऐसे ही इन दो संगीहीन एकल प्राणियों ने कितने दिन साथ ही बिताए।

एक दिन की बात है। वर्षाकाल में शुक्लपक्ष दशमी की रात में बादल छँटा और प्रथम चाँद दिखाई पड़ा। निस्पंद ज्योत्सना रात्रि सुप्त पृथ्वी के सिरहाने जगी बैठी रही। उस रात को निद्रा त्यागकर राजीव भी अपनी खिड़की पर बैठा था। ग्रीष्म क्लिष्ट वन से एक सुगंध और झिल्ली का श्रांतरव उसके कमरे में आकर प्रवेश कर रहा था। राजीव देख रहा था, अंधकार तरुश्रेणी के प्रांत में शांत सरोवर एक मार्जित चाँदी के पत्तर के समान चमचमा रहा था। ऐसे समय में मनुष्य स्पष्ट ही ऐसी कोई बात सोचता है या नहीं, कहना कठिन है। केवल उसका सारा अंतःकरण किसी एक ओर प्रवाहित होता रहता है‒वन के समान एक गंधोच्छ्वास देता है, रात्रि के समान एक झिल्ली ध्वनि करता है। राजीव ने क्या सोचा, मालूम नहीं, किन्तु उसको लगा, जैसे आज सारे पूर्व के नियम टूट गए हैं। आज वर्षा रात्रि ने अपना मेघवरण खोल फेंका है और आज की यह निशीथिनी उस काल की उस महामाया के समान निस्तब्ध सुंदर और सुगंभीर दीख रही है। उसका संपूर्ण अस्तित्व उस महामाया की ओर एक साथ धावित हुआ।

स्वप्नचालित के समान उठकर राजीव ने महामाया के शयन-कक्ष में प्रवेश किया। महामाया तब सो रही थी।

राजीव पास जाकर खड़ा हुआ‒मुख झुकाकर देखा‒महामाया के मुख के ऊपर ज्योत्स्ना आ पड़ी थी। किन्तु, हाय, यह क्या! वह चिर-परिचित मुख कहाँ! चितानल शिखा अपनी निष्ठूर लेलिहान रसना द्वारा महामाया के बायें हिस्से में किया दंश सौन्दर्य एकदम चाटकर अपनी भूख के अवशेष छोड़ गई है।

राजीव चौंक उठा था, लगता है शायद एक अव्यक्त ध्वनि भी उसके मुख से निकली होगी। महामाया चौंककर जाग उठी; सामने राजीव। उसी क्षण घूँघट खींच शय्या छोड़ एकदम उठ खड़ी हुई। राजीव ने समझा अब वज्राघात होने को ही है। वह ज़मीन पर गिरा और पैर पकड़ कर कहा, “मुझे क्षमा करो।”

महामाया एक भी शब्द न बोल, क्षण-भर के लिए पीछे न मुड़, घर से बाहर निकल गई। राजीव के घर में फिर उसने प्रवेश नहीं किया। फिर कहीं उसका पता न लगा। वह क्षमाहीन चिरबिदाई का नीरव क्रोधानल राजीव के सारे जीवन पर सुदीर्घ दग्ध चिह्न छोड़ गया।

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