पूजन से पूर्व की तैयारी​

​गणेश चतुर्थी के दिन ब्रह्म मूहर्त में उठकर स्नान आदि से शुद्ध होकर शुद्ध कपड़े पहनें। आज के दिन लाल रंग के वस्त्र पहनना अति शुभ होता है। गणपति का पूजन शुद्ध आसन पर बैठकर अपना मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की तरफ कर के करें।

गणेश चतुर्थी के मौके पर भगवान गणपति की प्रतिमा को घर लाकर हम पूजा की शुरुआत करते हैं। ​इस  दिन भगवान गणेश की प्रतिमा को घर लाना सबसे पवित्र समझा जाता है। जो श्रद्धालु गणेश जी की मूर्ति को चतुर्थी से पहले अपने घर ला रहे हैं, उन्‍हें मूर्ति को एक कपड़े से ढककर लाना चाहिए और पूजा के दिन मूर्ति स्‍थापना के समय ही इसे हटाना चाहिए। घर में मूर्ति के प्रवेश से पहले इस पर अक्षत जरूर डालना चाहिए। स्‍थापना के समय भी अक्षत को आसन के निकट डालना चाहिए। साथ ही, सुपारी, हल्‍दी, कुमकुम और दक्षिणा भी वहां रखनी चाहिए।

​​पूजा के लिए जरूरी सामग्री- गणपति की मूर्ति को घर में स्‍थापित करने के समय सभी विधि विधान के अलावा जिन सामग्री की जरूरत होती है, वो इस प्रकार हैं। जैसे लाल फूल, दूर्वा, मोदक, नारियल, सुपारी, पान, लाल चंदन, धूप, अगरबत्‍ती और आरती की थाली।​

​कैसे करें पूजन?  ​

गणपति मूर्ति की पूजा करने के लिए सबसे पहले एक आरती की थाली में अगरबत्‍ती-धूप को जलाएं। इसके बाद पान के पत्‍ते और सुपारी को भी इसमें रखें। इस दौरान मंत्र ‘ऊं गं गणपतये नम:’ का जाप करें  तथा एकाग्रचित्त से सर्वानन्द प्रदाता सिद्धिविनायक का ध्यान करें। फिर श्रद्धा और भक्तिपूर्वक उनके इक्कीस नाम लेकर इक्कीस पत्ते समर्पित करें। उनके प्रत्येक नाम के साथ ‘नम:’ जुड़ा हो। वे इक्कीस नाम और पत्ते इस प्रकार हैं-

‘सुमुखाय नम:-‘ कहकर शमीपत्र अर्पित करें। ‘गणधीशाय नम:’ कहकर भंगरैया का पत्ता, ‘उमापुत्राय नम:’ कहकर बिल्वपत्र, ‘गजमुखाय नम:’ कहकर दूर्वादल, ‘लम्बोदर नम:’ कहकर बेरका, ‘गजमुखाय नम:’ कहकर धतूरे का पत्ता, ‘वक्रतुण्डाय नम:’ कहकर सेम का, ‘गुहाग्रजाय नम:’ कहकर अपामार्ग का, ‘एकदन्ताय नम:’ कहकर वनभंटा या भटकटैया का, ‘हेरम्बाय नम:’ कहकर सिन्दूर (सिन्दूर पूर्ण या सिन्दूर वृक्ष का) ‘चतुर्होत्रे नम:’ कहकर अशमातपत्र या कदलीपत्र, ‘विनाकाय नम:’ कहकर आक का, ‘कपिलाय नम:’ कहकर अर्जुन का, ‘वटवे नम:’ कहकर देवदारु का, ‘भालचन्द्राय नम:’ कहकर मरुआ का, ‘सराग्रजाय नम:’ कहकर गान्धारी पत्र और ‘सिद्धिविनायकाय नम:’ कहकर केतकी पत्र प्रीतिपूर्वक समर्पित करें। इससे श्रीगणेश जी अत्यंत प्रसन्न होते हैं।

​पंचामृत से श्री गणेश को स्नान कराएं तत्पश्चात केसरिया चंदन, अक्षत, दूर्वा अर्पित कर कपूर जलाकर उनकी पूजा और आरती करें। उनको मोदक के लड्डू अर्पित करें। उन्हें रक्तवर्ण के पुष्प विशेष प्रिय हैं। श्री गणेश जी का श्री स्वरूप ईशाण कोण में स्थापित करें और उनका श्री मुख पश्चिम की ओर रहे।

संध्या के समय गणेश चतुर्थी की कथा, गणेश पुराण, गणेश चालीसा, गणेश स्तुति, श्रीगणेश सहस्रनामावली, गणेश जी की आरती, संकटनाशक गणेश स्तोत्र का पाठ करें। अंत में गणेश मंत्र ‘ऊं गणेशाय नम:’ अथवा ‘ऊं गं गणपतये नम: का अपनी श्रद्धा के अनुसार जाप करें। यदि कोई पुजारी इसे अंजाम दे रहे हों तो दक्षिणा भी अर्पित करें।

गणेशजी की पूजा सांयकाल के समय की जानी चाहिए। पूजन के पश्चात् नीची नजर से चंद्रमा को अर्घ्य देकर ब्राह्मïणों को भोजन कराकर दक्षिणा भी देनी चाहिए। नीची नजर से चंद्रमा को अर्घ्य देने का तात्पर्य है जहां तक संभव हो इस दिन (भाद्रपद चतुर्थी को) चंद्रमा के दर्शन नहीं करने चाहिए। इस तिथि की रात्रि में चन्द्र दर्शन का निषेध है। चंद्र दर्शन करने वाले मिथ्या कलंक के भागी होते हैं।

क्यों न देखें चंद्रमा को?

मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा के दर्शन करने से कलंक का भागी बनना पड़ता है, क्योंकि एक बार चंद्रमा ने गणेश जी का गजमुख व लंबोदर रूप देखकर उनका मजाक उड़ाया था, गणेशजी ने चंद्रमा को श्राप दे दिया कि आज से जो भी तुम्हें देखेगा उसे मिथ्या कलंक लगेगा, लेकिन फिर चंद्रमा द्वारा माफी मांगने व श्राप मुक्त करने के अनुरोध पर वर्षभर में एक दिन भाद्रपद की शुक्ल चतुर्थी को चंद्र दर्शन से कलंक लगने का विधान बना। इस दिन चांद के दर्शन करने से भगवान श्रीकृष्ण को भी मणि चोरी का कलंक लगा था।

विशेष काम- इस दिन अपने घर, दुकान, फैक्टरी आदि के मुख्य द्वार के ऊपर तथा ठीक उसकी पीठ पर अंदर की ओर गणेश जी का स्वरूप अथवा चि‍‍त्रपट जरूर लगाएं। ऐसा करने से गणेश जी कभी भी आपके घर, दुकान अथवा फैक्टरी की दहलीज पार नहीं करेंगे तथा सदैव सुख-समृद्धि बनी रहेगी। कोई भी नकारात्मक शक्ति घर में प्रवेश नहीं कर पाएगी।  

अपने दोनों हाथ जोड़कर स्थापना स्थल के समीप बैठकर किसी धर्म ग्रंथ का पाठ रोजाना करेंगे तो शुभ फल मिलेगा। सच्‍चे मन और शुद्ध भाव से गणपति की पूजा करने से बुद्धि, स्‍वास्‍थ्‍य और संपत्ति मिलती है। 

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