उस दिन रविवार था। बुढ़िया को गाय का गोबर नहीं मिला। अत: वह अपना घर न लीप सकी। उस दिन उसने भोजन नहीं बनाया, न भगवान को भोग लगाया और न स्वयं भोजन किया। रात्रि में वह निराहार ही सो गई। रात्रि में भगवान ने उसे स्वप्न में दर्शन दिये और भोजन न बनाने तथा भोग न लगाने का कारण पूछा। बुढ़िया ने कहा, गोबर नहीं मिला अत: आपका भोग नहीं लगा सकी। भगवान ने उससे कहा, हे माता मैं आपसे बहुत प्रसन्न हूं। मैं आपकी ऐसी गाय देता हूं जो सब इच्छाओं को पूरा करती है। मैं निर्धन को धन और बांझ स्त्रियों को पुत्र  देता हूं तथा अन्त समय में मोक्ष देता हूं। स्वप्न में वरदान देकर भगवान अर्न्तध्यान हो गयें।

प्रात:काल जब बुढ़िया माता की आंख खुली तो उसने देखा कि आंगन में एक अति सुन्दर गाय तथा बछड़ा बंधे हुये हैं। गाय और बछड़े को देखकर बुढ़िया अत्यन्त प्रसन्न हुई। उसने उनको घर के बाहर बांध दिया तथा वहीं उनके खाने के लिये चारा डाल दिया। बुढ़िया के यहां गाय-बछड़ा बंधा देखकर पड़ोसन को बहुत ईर्ष्या हुई। जब उसने देखा कि गाय ने सोने का गोबर दिया है तो उसने वह उठा लिया और उसकी जगह अपनी गाय का गोबर रख दिया। वह प्रतिदिन ऐसी ही करती।

एक दिन संध्या समय बड़ी जोर की आंधी आई। बुढ़िया आंधी के भय से अपनी गाय तथा बछड़ा घर के भीतर बांध लिये। प्रात:काल उठकर उसने देखा कि गाय ने सोने का गोबर दिया है। यह देखकर उसके आश्चर्य की सीमा नहीं रही। अब वह गाय घर के भीतर बांधने लगी। जब पड़ोसन को सोने का गोबर उठाने को नहीं मिला तो ईर्ष्या व डाह से जलकर उसने राजा से शिकायत कर दी।

उसकी बात सुनकर राजा ने अपने कर्मचारियों को वृद्धा के घर से गाय-बछड़ा खोलकर लाने का आदेश दिया। राजा के कर्मचारी गाय खोल कर ले गये। वह बहुत रोई चिल्लाई पर उसकी किसी ने नहीं सुनी। वह गाय के वियोग में भोजन नहीं कर सकी।

राजा गाय को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। लेकिन प्रात:काल जब वह सोकर उठा तो उसने देखा कि सारे महल में गोबर ही गोबर भरा हुआ है। भगवान ने रात्रि में राजा के स्वप्न में कहा, हे राजा गाय वृद्धा को लौटा देना। इसी में तुम्हारी भलाई है। उसके रविवार के व्रत से प्रसन्न होकर मैंने यह गाय उसे दी थी। राजा की तुरन्त आंख खुल गई। फिर वह सो नहीं सका। प्रात: होते ही राजा ने वृद्धा को महल में बुलाकर बहुत से धन के साथ सम्मान के साथ गाय-बछड़ा लौटा दिया तथा अपने कार्य के लिये क्षमा मांगी। तथा उसकी पड़ोसन को बुलाकर उचित दंड दिया। राजा स्वयं रविवार का व्रत करने लगा तथा उसने अपनी प्रजा को भी रविवार का व्रत करने का आदेश दिया। 

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