ईश्वर का स्वरूप

ईश्वर एक है, भले ही उसकी विवेचना विभिन्न धर्मों में अलग-अलग ढंग से की गई हो। कहीं उसे सातवें आसमान में बताया गया है, कहीं उसकी उपस्थिति कण-कण में बताई गई है। कहीं उसे ‘रसो वैस:’ अर्थात् ‘आनंद का स्रोत’ बताया गया है। कुछ भी हो ईश्वर के नाम उच्चारण से ही मनुष्य की स्वधर्म में रुचि जागृत हो जाती है। भगवान का स्वरूप हमारे हृदय में प्रकाशित होता है। इससे सच्चा आनंद प्राप्त होता है। अब इसी की आगे विवेचना कर रहे हैं।

इस्लाम धर्म-इस्लाम धर्म में ईश्वर को ‘अल्लाह’ के नाम से जाना जाता है। वही कयामत-महाप्रलय का मालिक है। वही अव्वल है, वही आखिर है। वही प्रकट है, वही गुप्त है। वह गुप्त रूप से की गई फुसफुसाहट को भी आसानी से सुन लेता है, समझ लेता है। उसकी इच्छा के बिना संसार की कोई भी गति विधि संपन्न नहीं हो सकती है। कुरान में ‘रब्ब’ शब्द भी देखने को मिलता है, जिसका अर्थ है ‘महान’।

यहूदी धर्म-इस धर्म में ईश्वर को यहोवा के नाम से जाना जाता है। हजरत मूसा इसके धर्म संचालक माने जाते हैं। यहूदियों का दृढ़ विश्वास है कि उनका मसीहा इस धरती पर फिर से अवतरित होगा और धार्मिक वातावरण निर्मित करेगा। यहूदी धर्म में मसीहा का बड़ा महात्म्य है। उसे यूनानी भाषा में प्रोफेट के नाम से जाना जाता है। यहूदियों का मूल ग्रंथ ‘तोरा’ है।

कुंग-फुत्सु-ये चीन के सर्वप्रथम गुरु हैं, इन्हें अंग्रेजी में कन्फ्यूशियस के नाम से जाना जाता है। इनके मतानुसार अपना सुधार ही संसार की सबसे बड़ी सेवा है। उन्होंने नैतिक एवं धार्मिक जीवन को ही ईश्वर का स्वरूप माना है। उनका विश्वास है कि मनुष्य की भौतिकता से परे कोई अदृश्य एवं आध्यात्मिक चेतना अवश्य है जो इसका नियमन एवं नियंत्रण करती है।

ताओ धर्म-इस धर्म के संस्थापक लाओत्से के अनुसार मनुष्य ताओ (ईश्वर) का कोई स्वरूप नहीं बता सकता। उसका कोई नाम नहीं है, जो अपनी भाषा में उसको जानने का प्रयत्न करते हैं वो उससे दूर ही बने रहते हैं। परमशक्ति शब्द व्याख्या से परे है। उसका आदि और अंत नहीं है। सब की उत्पत्ति उसी से होती है, उसकी उत्पत्ति किसी से नहीं होती। वह जन्म-मरन से मुक्त है।

जापान का शिंता धर्म-शिंता धर्म बौद्ध और कन्यफ्यूशियस धर्म से बहुत पहले का है। यह सूर्य का उपासक धर्म है। प्राकृतिक जीवन के प्रति अगाध प्रेम होने के कारण ही उन्होंने अपने इष्टदेव का चयन किया है। सूर्य की देवी को ही वो देवाधिदेव कहकर पुकारते हैं। उनकी मान्यताओं के अनुसार देवी की सेवा के लिए पांच देवता सदैव बने रहते हैं। 

भारत के आदिवासी-सूर्य को ‘सिनका नंद’ कह कर पुकारते हैं और ईश्वर के सदृश सम्मानास्पद कहकर पूजा-उपासना की विधि बनाते हैं, पूजा करते हैं तथा ईश्वरी सत्ता से पूरी तरह सहमत हैं।

ऑस्ट्रेलिया के आदिवासी-इन लोगों का कहना है कि ईश्वर बहुत समय पूर्व इस धरती पर रह चुका है और बाद में अपने स्थान पर चला गया। वहीं बैठकर भूïलोक के निवासियों के कर्मों का निरीक्षण करता है और उसी के अनुसार फल प्रदान करता है।

असीरियन-इन लोगों का ईश्वर ‘असुर’ नाम से प्रख्यात है। उनके मुताबिक जीवन का आधार भौतिक तत्त्व नहीं वरन् इससे परे कोई सत्ता है, वही अविनाशी है। 

गीता-श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, जो जाने-अनजाने किसी भी देवता की पूजा करते हैं वो पूर्णत: परम तत्त्व की ही पूजा करते हैं और भिन्न-भिन्न तरीके से साक्षात्कार करते हैं।

विश्व भर में बेशक कितने ही धर्म व उनके संस्थापक हों लेकिन ईश्वर के प्रति उनके विचार लगभग एक से ही हैं। आइये, विभिन्न धर्मों के मूल को जानें।

जैन धर्म-उसे नमस्कार है जो अनेक में एक है और एक में अनेक है और साथ ही एक और अनेक से परे भी है। वह अद्भुत व अविनाशी है। 

पारसी-इसके अनुसार ईश्वर एक है उसे ‘अहरमज्दा’ के नाम से संबोधित किया जाता है जिसका तात्पर्य है- ‘ज्ञानेश्वर सर्वशक्तिमान परमात्मा।’ पारसी ग्रंथ की गाथा में वर्णन है- ‘उस ईश्वर के अतिरिक्त मैं और किसी को नहीं जानता हूं।’

मिश्र-इनके मुताबिक जीवन की सृष्टि  करने वाला वह अनंत एवं सर्वव्यापी है। उसे आंखों से देखा नहीं जा सकता, वही एक निराकार है जो सब कुछ है। 

बाइबल-इसमें ईश्वर की विशेषताओं का वर्णन इस प्रकार है। मैं ही सबका आदि हूं और सबका अंत भी मैं ही हूं। मैं ही प्रकाश हूं जो सबको प्रकाशित करता हूं। मेरे बिना कोई भी प्राणी हलचल नहीं कर सकता।

बौद्ध धर्म-बौद्ध धर्म अन्य धर्मों से भिन्न है। जहां लोग सुख एवं ऐशो-आराम के लिए हमेशा चिंतित एवं दु:खी रहते हैं वहीं बौद्ध धर्म उस परम सुख को पाने का मार्ग दिखाता है। बौद्ध धर्म दोनों के बीच का मार्ग है। यह धर्म न तो शरीर को कठोर कष्ट देने को राजी है न ही संासारिक सुखों में रम जाने की छूट देता है। यह धर्म मानता है संसार दु:खों का सागर है, उसका कारण अज्ञान है।

सूफी संत-‘फकत तफावन है नाम ही का अर्थ दरअसल एक ही है’ केवल नाम का ही अंतर है। जिस प्रकार जो पानी की लहर में है वही बुलबुले में भी है। सब वही है। 

शेखसादी-इसने नामुकीमा में लिखा है- ‘जिसके रहने का कोई स्थान नहीं फिर भी वह सब जगह रहता है यह देखकर बड़ा आश्चर्य होता है।’

उपनिषद-ब्राह्मï सर्वज्ञ विद्यमान है। उसी की ज्योति से सब प्रकाशित है।

इंजील-उस अदृश्य-सत्ता के अंदर सब मौजूद है उसी से सब हरकत करते हैं।

शीकग-इस चीनी ग्रंथ में लिखा है- वह ईश्वर सर्वज्ञ छाया हुआ है तथा जीवन के प्रत्येक क्रियाकलाप पर उसकी नजर सदैव बनी रहती है।

योगावष्ठि-ईश्वर सबके अंत:करण में विद्यमान है। अत: उस उपस्थित ईश्वर को छोड़कर जो बाहर ढूंढने का प्रयत्न करते हैं वो अधर्मी हैं।

मैक्समूलर-विश्व जब कभी भी अंतरम एवं संतोष की खोज करेगा उसे भारतीय दर्शन का अनुशीलन करना ही पड़ेगा।

रामायण-‘व्यापक व्याप्य अखण्ड अनंता अखिल अमोघ शक्ति भगवंता।’

इस सूत्र में उसे सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान शक्ति की संज्ञा दी गई है। जिसे उपनिषदों में ‘एकम् एवं आद्वतीयम’ आदि कहा गया है। विविध ग्रंथों में जिस प्रकार एक सर्व व्यापक एक दिव्य शक्ति की अवधारणा है, उसी प्रकार आज के मूर्धन्य वैज्ञानिक भी किसी ब्रह्मांडकारी विचारशील सत्ता को ही मानते हैं। जो इस विश्व ब्रह्मांड का नियमन करती है। 

स्वामी विवेकानंद-मनुष्य और ईश्वर की परिभाषा बताते हैं- ‘मनुष्य एक ऐसा असीम वृत्त है जिसकी परिधि कहीं भी नहीं है लेकिन जिसका केंद्र एक निश्चित स्थान में है और ईश्वर एक ऐसा वृत्त है जिसकी परिधि कहीं भी नहीं है लेकिन जिसका केंद्र सर्वत्र है।’

मैत्रायण्युपनिषद-जो ब्रह्मï है वह ज्ञानमय है। ज्योति ही है और जो ज्योति है वही आदित्य है। मंत्र दृष्टा ऋषि ने अज्ञान धन का भेदन करके उसके पार चमकने वाले परम तत्त्व परमात्मा का दर्शन कर लिया है। अत: उनका कथन है कि मैं उस तत्त्व को समझ गया हूँ । उसको जानने की तीव्रतम जिज्ञासा ही मृत्यु रूपी इस आवरण धन का भेदन कर सकती है। इसके लिए कोई दूसरा मार्ग नहीं है।

सुधांशु जीे महाराज-‘ईश्वर सर्वव्यापक एवं सर्वशक्तिमान हैं। आंखें तुझे देखने में असमर्थ हैं। तेरा वर्णन मेरी वाणी से नहीं हो सकता। तेरी जानकारी मैं पूरी नहीं कर सकता चूंकि हमारी आंखें कुछ दूर तक ही देखती हैं। हमारी बुद्धि अल्पज्ञ है। मन थोड़ी कल्पना करता है। हे ईश्वर तू सच्चिदानंद है।’

हिन्दू धर्म-वह सनातन वैदिक धर्म है। इसमें ईश्वर को बह्मï परमेश्वर, परमात्मा आदि नामों से पुकारा गया है। वह निर्गुण, निराकार अनादि अनंत है।

सिख धर्म-यह धर्म हिन्दुओं के सबसे करीब है। उत्तर भारत में जब विदेशी पारसियों-मुसलमानों की कट्टरता से सामाजिक जीवन अस्त-व्यस्त हो गया था, बेटियों की इज्जत नीलाम होने लगी तो गुरु नानक ने स्थिति का सामना करने के लिए तथा समाज की रक्षा के लिए सिख धर्म की स्थापना की।

मनुस्मृति-आदि ऋषि मनु ने ईश्वर के अंश जीवात्मा को कर्मों का साक्षी मानते हुए उसे ईश्वर का सबसे बड़ा प्रमाण माना है। उस वर्णन के तहत आत्मा ही आत्मा की साक्षी है, आत्मा ही आत्मा की गति है। ऐसा जान कर तुम उत्तम साक्षी देने वाली आत्मा का अपमान मत करो।

ऋग्वेद-4/8/24 – हे सकल जगत को उत्पन्न करने वाले ईश्वर। तू हम सबके पापों को दूर कर और जो कल्याणकारी विचार हैं उन्हें हमें प्रदान कर। हे कृपा निधान हमारे अंत:करणों को पवित्र कर हमें शुद्ध-बुद्ध और पवित्र बना। ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचा में ऋषि ने परमात्मा से प्रार्थना की है। कि हमारे संचित पापों को दूर कर दो। पाप तो हमारे मन की वृत्ति है।

अद्वैतवाद या सर्वेश्वरवाद-‘यह सब कुछ ब्रह्मï ही है’- यह अद्वैतवाद या सर्वेश्वरवाद है। यह सिद्धांत किसी न किसी रूप में प्राय: सब धर्मों में पाया जाता है। जब वस्तु मात्र के मूल तत्त्व को देखते हैं तो उसे केवल निराकार-निर्गुण बल्कि एक साकार सगुण ब्रह्मï रूप मेें व्यक्त करते हैं तब प्रत्येक धर्म में यह तत्त्व दो रूप में व्यक्त होता है। इन्हें हम प्रभु के सर्वातीत और व्यापक रूप के नाम से जानते हैं।

भले ही इन धर्मों की व्याख्या-विवेचना अलग-अलग हो, उनका मूल तो एक ही है। सभी धर्म ईश्वर की एक ही सत्ता को स्वीकार करते हैं और यह भी मानते हैं कि इस सृष्टि का रचियता ईश्वर है एवं व्यक्त-अव्यक्त समस्त ब्रह्मांड का कर्ता भी ईश्वर ही है। सभी कुछ उसकी इच्छानुसार होता है, उसकी राजी बिना पत्ता भी नहीं हिलता तो फिर इतने धर्म क्यों हैं, ये प्रश्न उठाए जाते हैं।

इसके उत्तर में, मैं इतना ही कहता हूं कि ईश्वर के पास या सत्य के पास इस तरह के प्रश्न नहीं हैं, नहीं तो फिर उत्तर कहां से उपलब्ध होंगे। सत्य तो केवल सत्य है। जब मनुष्य का अपनी स्वयं की सृष्टि पर विश्वास नहीं होता एवं ईश्वर की बनी सृष्टि के स्वीकार करने का साहस नहीं होता तो मनुष्य के पास उत्तर ढूंढने और प्रश्न करने का एक अलग ही संसार निर्मित हो जाता है। अत: मैं इन चंद पंक्तियों को पढ़ने वाले पाठकों से बड़े विनम्र भाव से अनुरोध करता हूं जिस स्वयं से प्रश्न निकलते हैं, उसी स्वयं से उत्तर भी निकलते हैं, यह अटल सत्य है। फिर भी यह मानव प्रश्न खुद करता है और उत्तर संसार से चाहता है, यह इतना असंभव है जैसा कि पानी में लकीर खींचना।

अत: सभी धर्मों के वृत्त अलग-अलग हैं, उनकी परिधि कहीं भी नहीं, लेकिन उनके सत्य के केंद्र अपने-अपने स्थान में निश्चित हैं और ईश्वर एक ऐसा असीम वृत्त है जिसकी परिधि कहीं भी नहीं लेकिन उसका सब धर्मों में केंद्र निश्चित है।

इसी प्रकार जापान में एक संत थे जो बांसुरी बजाकर उसकी धुन में मस्त हुआ करता था वह केवल बांसुरी के एक ही सुराख पर अंगुली रखता था और जब उससे कहा जाता था कि दूसरे स्वर पर उंगली क्यों नहीं चलाता तो वह कहता, एक ही ठीक है, एक ही ठीक है। वैसे धर्म कोई साध्य नहीं है वह साधन है वह ईश्वर के साम्राज्य में घुसने की एक गली है एक मार्ग है। याद रहे जब तुम्हारी सोच विभिन्न धर्मों में पहुंच जाती है तो धर्म नहीं बंटते तुम स्वयं बंट जाते हो, बिखर जाते हो। जब किसी धर्म में किसी का नाम लिख दिया जाता है तो उसे राजनीति पकड़ लेती है, वह तर्क की कसौटी में आ जाता है। स्वयं अकेले बनो धर्म एक हो जाएगा। लघु में जिओ विभु बन जाओगे, इकाई में रहो दहाई बन जाओगे सैकड़ा बन जाएगा। धर्म की आत्मा धर्मों में नहीं धर्म में बसती है। 

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