Short Story in Hindi: पहाड़ी शहर की सुबहें हमेशा धुंध से ढकी रहती थीं, लेकिन आज की धुंध कुछ ज्यादा ही नरम लग रही थी मानो बादल भी किसी मीठे रहस्य को छिपाए हों। आर्या अपनी स्केचबुक लेकर झील के किनारे बैठी थी। पेंसिल चलती तो थी, लेकिन रुक-रुक कर… जैसे उसके मन में कोई अधूरी धुन बार-बार बज रही हो। तभी उसके बगल में आकर कोई धीमी आवाज में बोला..
उसने सिर उठाया। सामने अर्जुन खड़ा था। वही अर्जुन जिसे उसने तीन महीने पहले पहली बार यहाँ स्केच बनाते देखा था, और तब से उनकी हर सुबह किसी न किसी रूप में एक-दूसरे से टकरा जाती थी।
“आज तुम धुंध को देख रही हो या धुंध तुम्हें?” अर्जुन मुस्कुराया। आर्या भी मुस्कुराए बिना नहीं रह सकी। “धुंध… शायद मुझे जरा ज्यादा पसंद करने लगी है।”
“या फिर कोई और वजह होगी?”
आर्या ने कोई जवाब नहीं दिया। बस पेज पलटा और नई लाइनें बनानी शुरू कर दीं। अर्जुन चुपचाप बैठ गया, और उनके बीच एक मीठी खामोशी फैल गई।
अर्जुन ने उसकी स्केचबुक में झाँकते हुए कहा, “जब तुम रेखाएँ बनाती हो ना, लगता है दुनिया थोड़ी और खूबसूरत हो जाती है।”
आर्या के हाथ रुक गए। “और जब तुम बोलते हो, लगता है दुनिया थोड़ी धीमी हो जाती है।”
उनके बीच एक हल्की हँसी तैर गई। हवा में उड़ते पत्ते जैसे उनके दिल की धड़कनों के साथ ताल मिला रहे थे। उस सुबह, झील के ऊपर उठती धुंध में वे दोनों ऐसे खोए कि समय भी रुक गया हो।
आर्या को महसूस हुआ कि दिल की धड़कनें जैसे पेंसिल की नोंक से बाहर निकलकर स्केचपेपर पर फैल रही हैं।
अगले कई दिनों तक वे ऐसे ही मिलते रहे—कभी झील पर, कभी उस पुराने चाय के खोखे पर जहाँ अर्जुन हमेशा उसके लिए नींबू वाली चाय मंगवाता था।
एक दिन जब बारिश हल्की-हल्की गिर रही थी, अर्जुन ने छतरी उसके ऊपर कर दी।
“तुम भीग जाओगे,” आर्या ने कहा।
“अगर तुम साथ हो, तो भीगना बुरा नहीं लगता,” अर्जुन फुसफुसाया।
आर्या की आँखों में चमक उतर आई। उसने छतरी थोड़ा सा उसकी ओर खींच ली। दोनों के बीच की दूरी कुछ कम हो गई… और शायद कई अनकहे भाव भी।
एक शाम आर्या की स्केचबुक झील के पास गिर गई। पानी से भीग चुके पन्नों को उठाते हुए वह परेशान हो गई। अर्जुन ने उसकी ओर देखते हुए धीरे से कहा, “रेखाएँ मिट भी जाएँ, तो क्या? तुम्हारे हाथ में हुनर है, फिर से बना लोगी।”
आर्या की आँखें नम हो गईं। “कुछ चीजें दोबारा नहीं बनती अर्जुन…”
अर्जुन ने पन्ने उसकी हथेली में रख दिए।
“तो मैं तुम्हें संभालने के लिए हूँ न। जो टूटेगा, साथ में जोड़ लेंगे।”
आर्या ने पहली बार उसे पूरी तरह, बिना किसी पर्दे के देखा। शायद यही पल था जब दिल ने चुपचाप एक वादा कर लिया।
कुछ दिनों बाद, शहर का वार्षिक आर्ट फेस्टिवल था। आर्या ने झील का एक खूबसूरत पेंटिंग बनाई, जिसमें धुंध के बीच किसी की धुँधली-सी परछाईं थीं अर्जुन की।
पेंटिंग के नीचे उसने एक लाइन लिखी, “कुछ लोग धुंध की तरह आते हैं… और दिल साफ कर जाते हैं।”
अर्जुन ने पेंटिंग देखी और उसकी तरफ कुछ कदम बढ़ाए।
“यह… मैं हूँ?”
आर्या मुस्कुराई। “शायद। या तुमसे मिलने के बाद वाली मैं।”
अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“अगर तुम इजाज़त दो, तो मैं हमेशा तुम्हारी रेखाओं के बीच रहना चाहूँगा।”
आर्या ने बिना झिझक उसका हाथ थाम लिया।
“और मैं हमेशा तुम्हारी धड़कनों के बीच।”
झील के ऊपर सूरज धीरे से उभरा और धुंध हटने लगी। लेकिन उनके दिलों में जो धूप फैली—वह हमेशा की थी।
दो लोगों की कहानी, जो सुबह की धुंध में शुरू हुई और साफ, गर्म धूप में अपना नाम पा गई।
कभी-कभी इश्क़ कोई बड़ा इकरार नहीं मांगता… बस दो दिलों की धीमी-सी हाँ काफी होती है।
