गणेश चतुर्थी भारत के सबसे बड़े त्योहारों में से एक माना जाता है। गणेश चतुर्थी को गणेश उत्सव और विनायक चतुर्थी भी कहा जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास में शुल्क पक्ष की चतुर्थी तिथि को भगवान श्री गणेश का जन्म हुआ। भगवान शिव और पर्वाती के पुत्र गणेश को ज्ञान, बुद्धि समृद्धि और सौभाग्य का देव कहा जाता है। गणेश चतुर्थी का पर्व वैसे तो पूरे भारत में मनाया जाता है, लेकिन महाराष्ट्र में गणेश उत्सव यानि गणेश चतुर्थी का पर्व व्यापक रूप से मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी का पर्व 11 दिनों तक मनाया जाता है। गणेश स्थापना से लेकर 10 दिनों तक भगवान गणेश जी को घर में रखते हैं और 11वें दिन गणेश विसर्जन करते हैं।

 

गणेश चतुर्थी व्रत कथा

गणेश चतुर्थी से जुड़ी एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय भगवान शिव और मां पार्वती नर्मदा नदी के तट पर विराजमान थे। वहां मां पार्वती ने भगवान शिव से चौपड़ खेलने का अनुरोध किया। उस वक्त शिवजी ने मां पार्वती से सवाल किया कि हमारी हार.जीत का फैसला कौन करेगा। सवाल सुनकर मां पार्वती ने वहां पड़े कुछ घास के तिनके बटोरकर एक पुतला बनाया और उसमें प्राण डाल दिए और उससे कहा. पूत्र! हम चौपड़ खेलना चाहते हैं, लेकिन यहां हमारी हार.जीत का फैसला करने वाला कोई नहीं हैए इसलिए तुम हमारे खेल के साक्षी बनों और आखिरी में तुम ही हमें बताना कि कौन जीता, कौन हारा।

भगवान भोले शंकर और मां पार्वती ने चौपड़ का खेल शुरू किया। तीनों बार खेल में मां पार्वती ही जीतीं, लेकिन जब आखिरी में उस घास के बालक से हार जीत के बारे में पूछा गया, तो उसने महादेव को विजयी बताया। ये बात सुनकर मां पार्वती क्रोधित हो गईं और उस बालक को एक पैर से लंगड़ा होने और वहीं नदी किनारे कीचड़ में पड़े रहकर दुख भोगने का शाप दे दिया।

मां को क्रोधित देख बालक ने तुरंत ही अपनी भूल की क्षमा मांगी और कहा कि मुझसे अज्ञानवश ऐसा हो गया। कृपया मुझे माफ करें और मुक्ति का मार्ग बताएं। तब मां पार्वती ने उस बालक को माफ करते हुए बोलीं कि यहां नाग.कन्याएं गणेश.पूजन के लिए आएंगी। उनके उपदेश सुनकर तुम गणेश व्रत करके मुझे प्राप्त कर सकोगे। इतना कहकर मां पार्वती कैलाश पर्वत चली गईं।

एक वर्ष बाद उस स्थान पर नाग कन्याएं आईं। नाग कन्याओं से श्री गणेश के व्रत की विधि मालुम करने पर उस बालक ने 21 दिन लगातार गणेश जी का व्रत किया। उसकी श्रद्वा देखकर गणेश जी प्रसन्न हो गए और श्री गणेश ने बालक को मनोवांछित फल मांगने के लिये कहा बालक ने कहा की है विनायक मुझमें इतनी शक्ति दीजिए कि मैं अपने पैरों से चलकर अपने माता.पिता के साथ कैलाश पर्वत पर पहुंच सकूं और वो यह देख प्रसन्न हों।

 

बालक को यह वरदान दे, श्री गणेश अन्तर्धान हो गएण् बालक इसके बाद कैलाश पर्वत पर पहुंच गया और अपने कैलाश पर्वत पर पहुंचने की कथा उसने भगवान महादेव को सुनाई। उस दिन से पार्वती जी शिवजी से विमुख हो गई। देवी के रुष्ठ होने पर भगवान शंकर ने भी बालक के बताये अनुसार श्री गणेश का व्रत 21 दिनों तक किया। इसके प्रभाव से माता के मन से भगवान भोलेनाथ के लिये जो नाराजगी थी, वह समाप्त हो गई। यह व्रत विधि भगवन शंकर ने माता पार्वती को बताई। यह सुन माता पार्वती के मन में भी अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा जाग्रत हुई। माता ने भी 21 दिन तक श्री गणेश व्रत किया और दुर्वा, पुष्प और लड्डूओं से श्री गणेश जी का पूजन किया। व्रत के 21 वें दिन कार्तिकेय स्वयं पार्वती जी से आ मिलें। उस दिन से श्री गणेश चतुर्थी का व्रत मनोकामना पूरी करने वाला व्रत माना जाता है।

 

विनायक चतुर्थी व्रत विधि

श्री गणेश का जन्म भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन हुआ था, इसलिये इनके जन्म दिवस को व्रत कर श्री गणेश जन्मोत्सव के रुप में मनाया जाता है, जिस वर्ष में यह व्रत रविवार और मंगलवार के दिन का होता है। उस वर्ष में इस व्रत को महाचतुर्थी व्रत कहा जाता है।

 

गणेश जी की आरती

पूजा में घी से बने 21 लड्डूओं से पूजा करनी चाहिए। इसमें से दस अपने पास रख कर, शेष सामग्री और गणेश मूर्ति किसी ब्राह्मण को दान.दक्षिणा सहित दान कर देनी चाहिए।

गणपति बप्पा की पूजा यूं तो कभी भी किसी भी दिन और कैसे भी की जा सकती है। लेकिन गणेश चतुर्थी के दिन बप्पा की पूजा के लिए विशेष विधि.विधान बताए गये हैं। जी हां क्योंकि शास्त्रों में तो हर माह की चतुर्थी को गणेशजी की पूजा का विधान बताया है। लेकिन भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को संपूर्ण देश में धूमधाम से मनाई जाती है। इस दिन लोग घरों में गणपति बप्पा की स्थापना करते हैं और विधि.विधान से पूजा करते हैं। आइए जानते हैं गणेश चतुर्थी की पूजन विधि क्या है

 

 गणपति बप्पा की स्थापना

 गणपति बप्पा की स्थापना से पहले पूजा की सारी सामग्री एकत्रित कर लें। पूजा के लिए चौकी, लाल कपड़ा, गणेश प्रतिमा, जल कलश, पंचामृत, लाल कपड़ा, रोली, अक्षत, कलावा, जनेऊ, गंगाजल, इलाइची, लौंग, सुपारी, चांदी का वर्क, नारियल, सुपारी, पंचमेवा, घी.कपूर की व्यवस्था कर लें। लेकिन ध्यान रखें कि श्रीगेश को तुलसी दल व तुलसी पत्र नहीं चढ़ाना चाहिए। इसके स्थान पर गणपति बप्पा को शुद्ध स्थान से चुनी हुई दूर्वा जिसे कि अच्छे तरीके से धो लिया हो ही अर्पित करें।

 

सुबह.सवेरे नित्य कर्मों से निवृत्त होकर पूजा की सभी सामग्री को एकत्रित करें। इसके बाद सही दिशा का चुनाव करके वहां पर चौकी स्थापित कर दें। इसके बाद गणेशजी को पंचामृत और फिर गंगाजल से स्नान कराएं। फिर चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर गणेशजी की प्रतिमा स्थापित करें। रिद्धि.सिद्धि के रूप में प्रतिमा के दोनों ओर एक.एक सुपारी रख दें। इसके बाद गणेशजी को सिंदूर लगाकर चांदी का वर्क लगाएं। फिर जनेऊए लाल पुष्पए दूर्वाए मोदक और नारियल सहित अन्य सामग्री अर्पित करें।

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