“हलो…” कई बार खिंची फिर वहीं से फोन रख दिया गया ।

धैर्य से शाम होने की प्रतीक्षा करेगी । समय ही कितना है । कलाई पलटकर देखा तो तसल्ली हुई कि ठीक डेढ़ घंटे बाद निगम घर में होंगे । तब तक रसोई का काम निबटा लेती है, ताकि उनके आने पर फुरसत से बैठ सके । बच्चों की आदतें भी बड़ी अजीब हैं । उसे फुरसत से बैठा-बतियाता नहीं देख सकते । ठीक उसी समय उन्हें या तो भूख लग आएगी या हिंदी का गृहकार्य याद आ जाएगा, या कान-पेट में दर्द होने लगेगा । आज उन्हें कोई ऐसा मौका नहीं देना चाहती, जिससे उसके अपने समय में व्यवधान पड़े । चुलबुली बिटिया के कोड शब्दों में कहे तो आज मौसम अच्छा है और वह अपनी तरफ से निगम के लिए ‘झिड़क’ की ट्रे तैयार कर सकती है । वे अगर बहुत दबाव डालेंगे तो स्वयं भी दो चम्मच ब्रांडी थम्सअप में ले लेगी । हालांकि निगम उसके ऐसे साथ देने का उपहास उड़ाने से नहीं चूकते, ‘इससे तो बेहतर है कि सादे पानी का गिलास ही साथ लेकर बैठ जाओ ।’

रसोई से भी निपट गई । बच्चों से भी पूछ लिया कि अगर हिंदी का गृहकार्य करना है तो वह उन्हें लेकर अभी इसी वक्त बैठ सकती है । बच्चों ने उसे अचरज से देखा, “कहीं जाना है, अम्मा?” (उसने बच्चों को ‘अम्मा’ कहना ही सिखाया है) उसने अस्वीकार में सिर हिलाया । मन में इच्छा कुलबुलाई कि उन्हें आज की तत्परता का कारण बता दे । फिर यही लगा कि जब इतनी देर से धीरज गठियाए बैठी है तो कुछ देर सब और सही ।

ठीक सवा छह पर वह लिफ्ट से लगे गलियारे में मंद-मंद मुदित-सी आकर टहलने लगी । बच्चे नीचे क्लब में टेनिस खेलने उतर गए हैं । एकाएक मोटर साइकिल का चिरपरिचित कर्णभेदी शोर कानों में पड़ा । होंठों पर स्मित दौड़ गया । वह टहलते हुए अनुमान लगाने लगी कि अब निगम ने बेसमेंट में गाड़ी पार्क की, अब लिफ्ट में दाखिल हुए, अब लिफ्ट ऊपर सरकने लगी है । वह ‘लिफ्ट’ के सामने आ खड़ी हुई। सूचनापट्ट पर अंक गुलाटी खा रहे हैं । छह, सात, आठ, नौ, दस, ग्यारह । ‘हिच’ करती लिफ्ट ठहर गई है । स्वचालित दरवाजे धड़धड़ाते से खुलने लगते हैं ।

हेलमेट और बैग थामे बाहर होते निगम उसे सामने पा विस्मित हो पूछते हैं-“मामला क्या है, जनाब?”

वह इतराती-सी लंबी सांस भरती है, “मामला टोस्ट होगा, तभी बताया जाएगा ।”

“तब तो लॉटरी खुल गई अपनी!” उत्साहित हो निगम उसे कंधों से जकड़ लेते हैं ।

कमरे में प्रवेश करते ही वे बाथरूम की ओर बढ़ देते हैं-“फटाफट आया कपड़े बदल के ।”

वह रसोई में आकर ड्रिंक की ट्रे तैयार करने लगती है। कुढ़कर सोचती है, निगम ने बिलकुल उत्सुकता नहीं दिखाई । वे उत्साहित और खुश हो रहे हैं तो केवल इस बात से कि आज उन्हें पीने की छूट होगी । क्यों नहीं पूछा उससे कि आखिर बात क्या है? वह इतनी आनंदित और उदार क्यों हो रही है? पता नहीं वे किसी अवसर को विशिष्ट क्यों नहीं बना पाते । वह बहुत भावुक है । उनकी तटस्थता ने सारा मूड चौपट कर दिया । खैर, जानती है कि यह कोई आज की ही बात नहीं है । कुछ कहने-सुनने से भी फर्क पड़नेवाला नहीं । फिर आज वह किसी भी तरह की झिक-झिक नहीं चाहती । छोटे-छोटे मनमुटावों और असहमतियों से यह उपलब्धि बहुत ऊंची है…

“चियर्स!”

“चियर्स!” उसने भी हाथ ऊपर उठा दिया-“मैं आज बहुत खुश हूं।”

“लेकिन किसलिए?”

“मेरी कहानी पर दूरदर्शन से फिल्म बनाने का प्रस्ताव प्राप्त हुआ है, इसलिए ।”

“क्या!” और क्षणांश वह उन्मादी गिरफ्त में सिमट गई ।

अब लगा कि वाकई ‘चियर्स’ हुआ है ।

छूटी तो दौड़कर पत्र उठा लाई और उतावली-सी उन्हें पढ़कर सुनाने लगी…कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के एक भूतपूर्व छात्र विवेक बत्तरा, जो स्वयं रंगमंच के अनुभवी रंगकर्मी हैं और कई बहुचर्चित नाटकों को निर्देशित ही नहीं, अभिनीत भी कर चुके हैं, दिल्ली दूरदर्शन के लिए एक फिल्म बनाने की सोच रहे थे । फिल्म का विषय चुनने की समस्या से अरसे तक उलझे रहने के पश्चात् संयोग से उन्हें किसी ने उसकी विवादास्पद कहानी ‘यही जवाब है’ के विषय में सुझाया । कहानी पढ़ते ही वे अभिभूत हो उठे । तत्काल अपने सहकर्मियों से मिले । उन्हें एक बैठक में कहानी पढ़कर सुनाई । कहानी के चुनाव पर सभी मित्र मुक्तकंठ से एकमत हुए। मित्रों द्वारा कहानी पर सहमत होते ही विवेक बत्तरा ने दूरदर्शन अधिकारियों को भी कहानी पढ़ने को दी । इत्तफाक से दूरदर्शन की सुप्रसिद्ध निर्देशिका अमला भटनागर को कहानी बहुत पसंद आई । वे चाहती हैं कि फिल्म का निर्देशन और निर्माण वे स्वयं करें । विवेक बत्तरा मात्र फिल्म की पटकथा एवं संवाद लिखे और कहानी के एक केंद्रीय चरित्र नपुंसक पति की अंतर्द्वंद्व भूमिका निबाहें । विवेक बत्तरा को इस प्रस्ताव पर कोई आपत्ति नहीं है। बस जल्दी-से-जल्दी वह यही जवाब है के फिल्मीकरण की अनुमति भिजवा दे, ताकि वे कहानी पर आधिकारिक रूप से काम आरंभ कर सके ।

“वाह। वाह। तुम्हारी तो पौ बारह।” निगम ने पुनः अपने अंदाज में लड़ियाकर उसे बधाई दी और कहा, “कमाल तो देखो, तुम रहती हो फिल्म नगरी मुंबई में पर इधर किसी ने कभी तुम्हारी कहानियों को घास नहीं डाली। इसी को कहते हैं घर का जोगी जोगड़ा, आन गांव का सिद्धू।”

“यहां हिंदी पढ़नेवाले हैं ही कितने।” उसने तुनककर बात काटी ।

“यह भी ठीक है। चालू अंग्रेजी उपन्यासों से तो प्लॉट मार-मारकर फिल्में बनाते हैं। ये क्या जाने…” निगम ने उसे खुश करने की बात बनाई कि तभी ‘पियू-पियू’ लगातार बजती घंटी ने उन्हें खामोश कर दिया । वह भुन्नाती-सी उठी कि बच्चों की यही हरकत रही तो एक रोज इतनी कीमती घंटी जलकर रहेगी । सब्र नाम की तो चीज ही नहीं है उनमें । चाहे जितना समझाओ-बुझाओ, मगर वही ढाक के तीन पात । सहन में पहुंच ही रही थी कि सहसा अपना गिलास याद आया । वापस कमरे की ओर पलटी और निगम को इशारे से समझाया कि बच्चों के कमरे में दाखिल होने से पहले वे उसका गिलास कही आड़ में कर दे…

डेढ़ महीने से निरंतर उसके और विवेक बत्तरा के मध्य ‘यही जवाब है’ की प्रगति के संदर्भ में पत्र-व्यवहार जारी है। विवेक ने कहानी में कुछ मामूली परिवर्तनों की अनुमति चाही थी और अपने सुझाव भेजे थे कि क्या उन सुझावों से कहानी की मूल धारा को किसी प्रकार की ठेस लगती है?

उसे सुझाव बुरे नहीं लगे थे । इतना अंदाजा तो उसे भी था कि उसने कहानी चाक्षुष की दृष्टि से तो लिखी नहीं थी। अतः फिल्मीकरण के लिहाज से उसमें कुछ परिवर्तन अपरिहार्य हैं और जो सुझाव विवेक ने उसे प्रेषित किए हैं, वे निश्चित ही कहानी की-बुनावट को नाटकीय गतिशीलता प्रदान करेंगे । उसने जवाब भेज दिया था कि उसे परिवर्तनों पर कोई आपत्ति नहीं है।

विवेक ने यह भी सूचित किया कि स्क्रिप्ट लगभग पूरी होने जा रही है और वह अविलंब उसे अमलाजी को सौंप देगा। जहां तक पटकथा का मामला है अमलाजी ने गहरी दिलचस्पी के साथ कई बैठकों में उसे सुना है और कई दृश्यबंदो को सुनकर बहुत सराहा है।

किंतु आज जो पत्र आया है उसमें विवेक ने उसे अगले सप्ताह अपने मुंबई आने की सूचना भेजी है। बहुत भावुक होकर लिखा है कि मुंबई के एक सुप्रसिद्ध निर्माता ने, जो पिछले दिनों अपनी नई फिल्म के प्रीमियर के अवसर पर दिल्ली आए हुए थे, अपने एक वितरक मित्र के साथ अचानक उसका चर्चित नाटक ‘घासीराम कोतवाल’ देखने श्रीराम सेंटर पहुंच गए। नाटक में कोतवाल के रूप में वह उसके जीवंत अभिनय को देखकर इस कदर अभिभूत हुए कि शो खत्म होते ही सीधा ग्रीनरूम में पहुंच गए और उसे गले लगाकर निस्संकोच बोले कि क्या वह फिल्मों में काम करना पसंद करेगा?

“बशर्ते भूमिका चुनौतीपूर्ण हो ।” उसका उत्तर था ।

ठीक हफ्ते भर बाद वह निर्माता की ओर से प्रस्ताव पाकर स्तंभित रह गया, जिसमें उन्होंने उसे लिखा था कि वह फलां-फलां तारीख को स्क्रीन टेस्ट के लिए मुंबई पहुंच जाए। अगर वह ‘स्क्रीन टेस्ट’ में उत्तीर्ण हो गया तो निश्चय ही वह उसकी अगली फिल्म में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

विवेक बहुत खुश है कि उसे इतने बड़े निर्माता की ओर से स्वयमेव प्रस्ताव प्राप्त हुआ । उसकी ओर से न कोई जद्दोजहद हुई, न तियां पांच, न प्रयोजनात्मक घेरा-घेरी। जबकि उसके रंगकर्मी मित्र, फिल्म के प्रीमियर या फिल्म को कर-मुक्त कराने के उद्देश्य से दिल्ली प्रवास पर आए निर्माता-निर्देशकों की टोह में ही रहते हैं, ताकि वे उन्हें अपने नाटकों में आमंत्रित कर उनकी प्रतिभा-पारखी दृष्टि तले अपना सिक्का जमा सके । संयोग से अब तक उनके मनसूबे फलीभूत नहीं हो पाए। वह सचमुच भाग्यशाली है कि किस्मत स्वयं उसके भाग्य-कपाट पर दस्तक दे रही है । लेकिन बावजूद इसके वह चिंताग्रस्त है कि मुंबई तो वह किसी प्रकार पहुंच ही जाएगा, परंतु उस मायावी नगरी में आवास की कठिनाई से कैसे निपटेगा । न वहां उसका कोई आत्मीयजन है, न परिचित। वैसे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के कुछ भूतपूर्व छात्र जरूर हैं फिल्म जगत में मगर फिल्मों में प्राप्त अप्रत्याशित सफलता ने उनके दिमाग चढ़ा दिए हैं! उनसे किसी प्रकार की सहायता की उम्मीद व्यर्थ है । वह स्वाभिमानी भी कम नहीं । रहने को कोई उचित प्रबंध नहीं हो पाया तो वह अवसर खो देना मुनासिब समझेगा, बनिस्वत उनके दरवाजे खटखटाने के ।

दरअसल उनकी मानसिकता द्वेषी, स्वार्थी, व्यक्तिवादी और होडवादी हो गई है। वे नहीं चाहते कि फिल्मों में उनके मुकाबले अन्य छात्र भी सफल हो । ये वो लोग हैं जो रंगमंच के प्रति प्रतिबद्ध होने का दंभ भरते थे और फिल्मों में जाने तक यह वक्तव्य पीटते रहे कि अगर वे फिल्मों में गए तो मंच और फिल्मों के बीच संतुलन बनाए रखना उनका मुख्य उद्देश्य होगा! इस परिप्रेक्ष्य में वे कितने बेपर्द हो चुके हैं, वह अनभिज्ञ नहीं है। अब तो किसी नाटक में बतौर दर्शक अपनी उपस्थिति में ही उन्हें रंगकर्म में बहुत बड़ा योगदान प्रतीत होती है। खैर, उसे क्या! उनकी वे जानें।

उसे तो मात्र हफ्ते भर के लिए रात गुजारने की जगह चाहिए। दिन तो स्टूडियो की खाक छानते बीत जाएगा ।

अड़चनें कई हैं। जिस प्रतिबद्धता से वह मंच से जुड़ा रहा है वहां अर्थोपार्जन की बात तो दूर, कई दफे मंचन की खातिर ‘श्रीराम सेंटर’ का किराया भरने के लिए भी दोस्तों के चंदे पर निर्भर करना पड़ता है । फिर वह किसी सामान्य से होटल में भी, जिसका कि किराया पचास-साठ रुपये प्रतिदिन होगा, कैसे रहने की सोच सकता है । इस वक्त दिमाग सिर्फ परेशान है, सिर्फ परेशान। कुछ सुझाई नहीं दे रहा । पता नहीं क्या सोचकर उसे इतना सब लिख गया है । शायद यही सोचकर कि एक संवेदनशील रचनाकार का मन किसी रंगकर्मी के संघर्ष की त्रासदी महसूस कर सकेगा ।

इस लंबे खत से गुजरते हुए वह गहरे सोच में डूब गई…

विवेक बत्तरा निस्संदेह भाग्यशाली है कि अनायास भाग्य-लक्ष्मी उसके कैरियर के बूंद कपाटों पर दस्तक देने स्वयं उस तक चलकर आई है । अड़चनें भी अपनी जगह हैं । हिंदी रंगमंच को अभी अपने पांवों पर खड़ा होना बाकी है । विवेक जैसे संघर्षशील युवक उसे आत्म-सक्षम बनाने के लिए कृत-संकल्प है। वह पूरी ईमानदारी से उसकी मदद करना चाहती है; पर कैसे?

शाम को उसने निगम के समक्ष विवेक की समस्या रख दी । पर उन्हें विशेष दिलचस्पी न दिखाते पा तुनक उठी कि अगर उन्हें किसी सस्ते से होटल या गेस्टहाउस की जानकारी नहीं है तो क्या वे अपने किसी कुंवारे दोस्त के साथ कुछ दिनों उसे नहीं टिका सकते? निगम सुनकर बिगड़ उठे, “कैसी वाहियात बातें कर रही हो! तुम समझती नहीं ऐसे मसलों को । एक बार हमने उनके प्रति जिम्मेदारी दिखा दी तो हमेशा के लिए मुसीबत गले पड़ जाएगी । वो आ रहे हैं । उनके लिए होटल ढूंढ़ो साहब । उन्हें जाना है, टिकट आरक्षित करवा दो । इसे सूचना दो, उसे खबर कर दो । सारे काम-धाम छोड़कर यही लफड़े पालते रहो । छोड़ो ये पचड़े । उनकी मुसीबत है, वे झेलें । समझीं ।”

उसे निगम बेहद स्वार्थी, संकीर्ण और अपने से ईर्ष्या करते हुए महसूस हुए। बोले बिना नहीं रह पाई, “तुम सुविधाभोगी इंजीनियर हो न! तुम्हारे पास रचनाकार का संवेदनशील हृदय कहां कि जो दूसरों की परेशानी और पीड़ा को महसूस कर सके । आखिर विवेक बत्तरा हमारा क्या लगता है, जो मेरी कहानी पर ही फिल्म बनाए? कहानियों का अकाल तो नहीं पड़ा है?”

“बेवकूफी भरे तर्क मत दो । कहानी उसने स्वयं चुनी। तुम उसके पास दौड़ी नहीं गई थीं ।”

“ठीक, मैं दौड़ी नहीं गई थी; लेकिन फिर भी यह कोई मामूली बात तो नहीं? मेरे लेखन कैरियर में यह कितना बड़ा प्लस-प्वाइंट होगा, यह सोच या रहे हो तुम? अगर आज वह कहानी दूरदर्शन पर प्रस्तावित कर सकता है तो भविष्य में अगर वह फिल्मों में सफल हो गया तो निर्माता-निर्देशकों को भी मेरा नाम सुझा सकता है ।”

निगम हठात् कलह से सावधान हुए। सारी गंभीरता और खिन्नता झाड़कर हंस पड़े-“माय गॉड, तुम तो बड़ी दूरदर्शी हो गई हो! एकदम बनिया!”फिर हथियार डालनेवाले अंदाज में बोले, “ठीक है, देखता हूं क्या हो सकता है!”

वह आश्वस्त हो रसोई में व्यस्त हो गई । हाथ चलते रहे, पर दिमाग उधेड़-बुन में लगा रहा । निगम समझ नहीं रहे, न बात की गहराई महसूस कर रहे हैं । कितनी ईर्ष्या होती है उसे, जब वह दूरदर्शन पर किसी लेखक या लेखिका की फिजूल-सी कहानी का नाट्य रूपांतरण देखती है या पड़ती है कि फलां-फलां लेखक की फलां कहानी पर फिल्म बन रही है। खूब सोचती है कि भला ऐसा क्या है उस कहानी में? ऐसी तो उसने बीसियों कहानियां लिखी हैं । पर सच्चाई तो यह है कि नाटक हो या सिनेमा, इन जगहों में तब तक बात नहीं बनती जब वहां अपने लोग बढ़ावा देने वाले न हों । विवेक इस दिशा में बड़ा उपयोगी सिद्धू हो सकता है। और उस छद्म लेखकीय स्वाभिमान की भी रक्षा कर सकता है, जिसके चलते लेखक यह तो चाहता है कि उसकी कहानियों पर धड़ाधड़ फिल्में बनें, नाटक हों; किंतु इस आक्षेप से बरी रहे कि वह स्वयं गरजू है और निर्माता-निर्देशक के चक्कर लगाता रहता है। विवेक के मुंबई आने पर वह अपनी कुछेक कहानियां भी उसे पढ़वाएगी, जिन पर बेहतर नाटक की संभावना तो है ही, सफल मनोवैज्ञानिक कला फिल्म भी बन सकती है। मगर यह तभी संभव है जब उनके दरमियान संबंध बनें-और संबंध एक-दूसरे की जरूरत पर खड़े होने से भी अंतरंग हो सकते हैं । उसकी सफलता भी संदिग्ध नहीं है । गत वर्षों में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के जो भी छात्र फिल्मों में आए हैं, रातों-रात सफलता की चोटी पर जा बैठे है…

इतनी झिक-झिक में क्यों पड़ी है? क्यों नहीं उसे अपने यहां ही टिका लेती? लेकिन-लेकिन-वेकिन कुछ नहीं । इन्हीं लेकिन-वेकिन के चक्करों में अच्छे-खासे सुअवसर हाथ से छिटक जाते हैं । फिर बिसूरती बैठती है कि फलां लेखक का यह हो रहा है, वह हो रहा है और वह वहीं-की-वहीं पड़ी हुई है…

वसंत पंचमी की तारीख हफ्तों उसके घर टिकी रही…

…विवेक हफ्ते भर के लिए आया था । तकरीबन महीने भर तक उनके साथ रहा । हर दूसरे-तीसरे रोज कहानी पर उनकी बैठक होती। कहानी के कुछ अंश वह पात्रों में गहरे डूबकर इस हाव-भाव के साथ सुनाता कि उसकी आंखों के समक्ष दूरदर्शन का परदा खिंच जाता है और परदे पर थिरकते दृश्य । उन दृश्यों से जुड़ी दर्शकों की भाव-विभोर भीड़ । बधाइयों की चिट्ठियों का लगता अंबार..

उसके रहते घर का वातावरण इतना रचनात्मक हो उठा था कि उसे लगने लगा कि वह अपने आपको मात्र कहानियों तक ही सीमित न रखे । नाटक विधा पर भी काम करे । उसमें सामर्थ्य है। उसके पास जबरदस्त दृश्यीकरण की क्षमता है, जो नाट्य लेखक एवं फिल्म लेखक के लिए विशेष महत्त्व रखती है। हिंदी में तो अच्छे नाटकों का अभाव ही है। यूं तो नाटक प्रसाद ने भी लिखे, सेठ गोविंददास ने भी लिखे; पर वे मंच के लिए सर्वथा अनुपयुक्त हैं। इधर हिंदी के कुछ शीर्षस्थ कथाकारों ने इस दिशा में संयुक्त प्रयास आरंभ किया है-नाटककारों के साथ बैठकर मंच की तकनीकी जानकारी से अनभिज्ञ हो नाटक लिखने का। परिणाम उत्सावर्धक है…मन्नू भंडारी के ‘महाभोज’ के विषय में उसने सुना ही होगा । विवेक ने जैसे उसके सामने चुनौती रखकर कहा, “बताइए, आपके लिए कोई मुश्किल है?”

“है ।” उसने अपनी लाचारी प्रकट की कि चूंकि वह मुंबई में रह रही है, जहां मराठी मंच जितना समृद्ध है हिंदी उतना ही अविकसित, उसे ऐसा सुअवसर प्राप्त होने से रहा।

“मैं आपकी मदद कर सकता हूं।”

उसकी आंखों में प्रश्न खिंच आए-“कैसे?”

“आप पहले नाटक का कोई समस्यामूलक विषय चुन लीजिए। फिर उस पर काम शुरू कर दीजिए। संभवतः महीने-डेढ़ महीने बाद मेरा पुनः आना होगा । तब हम लोग विषय पर आठ-दस बैठकें कर डालेंगे । ठीक?”

“ठीक।” उसने सोत्साह खिलकर कहा ।

जादू का-सा असर हुआ उस पर कि उसने अपने नए उपन्यास पर बैठना कम करके एकाएक नाटक पर काम शुरू कर दिया। पंद्रह दिन में एक साधारण रूपरेखा तैयार हो गई । निगम को पढ़कर सुनाया तो प्रतिक्रिया में उन्होंने आड़े हाथों लिया-“मैं विषय से सहमत नहीं हूं। शोषण की बात उठाना आम फैशन हो गया है लेखकों में। मध्य वर्गीय संपन्नता में हाथ धोने की ख्वाहिश रखते हुए सर्वहारा वर्ग की खोखली चिता? तुम मध्य वर्गीय पाखंडों को अपना विषय क्यों नहीं बनातीं? कम कहने के लिए है वहां? हां, मगर साहित्य में आजकल वह फैशन में नहीं है। यह और बात है। बहरहाल, मुझे नहीं जम रहा मामला ।”

वह उनकी दो-टूक प्रतिक्रिया से आहत हो आई-“तुम पूर्वाग्रह से भरकर बात कर रहे हो।”

वे गुर्राए, “मैंने वही कहा जो मुझे लगा। सच्चाई सुनकर तिलमिलाहट होती है तो मुझसे पूछती क्यों हो?”

 

“पूछने का तात्पर्य यह नहीं है कि तुम मेरी नीयत पर आक्षेप लगाओ!”

“ठीक है, तो फिर यही समझ लो कि मुझमें नाटक की समझ नहीं। अच्छा होगा कि तुम अपने गुरु विवेक को प्रति भेजकर उसका मत जान लो।”

‘जलो-भुनो’ वह मन-ही-मन तैश से चली। यह कोई जवाब है। मगर तर्क-वितर्क व्यर्थ है। निगम का खूंटा जहां गड़ जाता है, टस से मस नहीं होता। उसे परवाह भी नहीं; पर असहमति के बावजूद उसे उनका यह परामर्श जरूर पसंद आया कि वह प्रतिलिपि, प्रतिक्रिया हेतु विवेक को भेज दे । इधर वह उसे खत लिखना भी चाह रही है। उसे वापस लौटे महीना भर से ऊपर हो रहा है; किंतु न अब तक उसका कोई खत आया, न दूरदर्शन से अनुबंध-पत्र, जिसके विषय में वह आश्वस्त करके गया था कि पहुंचते ही उसके पास अविलंब भिजवाएगा।

विवेक नहीं समझ सकता कि रोजाना की डाक उसके लिए इसलिए फिजूल हो उठती है कि उसमें कोई सरकारी खाकी लिफाफा नहीं होता। उसकी मनोदशा ठीक खिसियाई बिल्ली-सी हो गई है ।

जवाब आने में ज्यादा समय नहीं लगा । पत्र क्या था, परेशानी, दुःख, क्षोभ, संकोच और शर्मिंदगी का पुलिंदा, कि उसके सारे परिश्रम पर पानी फिर गया । दूरदर्शन के अधिकारियों ने फिल्म की स्क्रिप्ट अस्वीकार कर दी है । उनका तर्क है कि कहानी के केंद्रीय चरित्र मां का आचरण अत्यंत व्यावसायिक है, जो मां की हमारी पारंपरिक छवि को ठेस पहुंचाती है । हमने उन्हें संतुष्ट करने की बहुत कोशिश की, मगर वे अपनी लचर दलीलों से चिपके बैठे हैं। निर्देशिका अमलाजी भी बेहद दुःखी हैं। कम वक्त नहीं जाया किया उन्होंने हमारे साथ । घटों संग बैठी एक-एक दृश्य सुनती रही हैं।

…बहुत अरसे से आपको लिखने की सोच रहा था, लेकिन आप मेरी पस्त मनःस्थिति का अंदाज लगा सकती हैं। क्षमायाचना के लिए भी तो आदमी को हिम्मत चाहिए।

पत्र के साथ नाटक पर विस्तृत प्रतिक्रिया भी नत्थी थी; किंतु उसे पढ़ने की इच्छा ही नहीं हुई। दूरदर्शन के अधिकारियों पर रोष उबल पड़ा। टुच्चे और कम-अक्ल लोग । वातानुकूलित कमरों में बैठे हुए उन्हें साहित्य की समझ है। मशीनीकरण के इस युग में निस्वार्थ रिश्तों के मध्य तेजी से व्यापते व्यवसायीकरण का एहसास है? औरत का मानसिक धरातल जिस संक्रमणता से क्षत-विक्षत हो अपने अस्तित्व की पहचान के लिए संघर्षरत है, इसकी जानकारी है?

वह उन्हें नहीं छोड़ेगी । मगर लिखे तो कहाँ और किसे? सहसा एक सूत्र हाथ आया । मुंबई दूरदर्शन से उसे दिल्ली दूरदर्शन का पता आसानी से प्राप्त हो सकता है। आक्रोश से थर्राती उंगलियां टेलीफोन पर नंबर घुमाने लगी! उधर से ‘हलो’ होते ही अपनी उत्तेजना को भरसक संयत कर उसने दिल्ली दूरदर्शन का पता मांगा। पता प्राप्त कर तुरंत अपनी मेज पर जा बैठी और अपनी कहानी ‘यही जवाब है’ का हवाला देते हुए अधिकारियों की दुर्नीति और अविवेकपूर्ण निर्णय को चुनौती देती लिखने लगी कि जिन वजहों से उन्होंने उसकी कहानी पर नैतिक आपत्ति प्रकट की है वह उनकी संकीर्ण मनोवृत्ति और अपरिपक्व दृष्टिकोण का परिचायक है। मनोविश्लेषणात्मक चरित्रों को समझ सकने की न तो उनमें मनोवैज्ञानिक दृष्टि है, न साहस। क्यों वे वक्त के परिवर्तनों को स्वीकार नहीं कर पा रहे है? औरत की कैसी छवि वे दूरदर्शन पर दिखाना चाह रहे है? वे मातृत्व संबंधों पर हावी हो रही अर्थलोलुपता को दिखाना पारंपरिक मर्यादा के खिलाफ कदम मानते हैं; पर आए दिन जो वे स्त्री देह की नुमाइश से भरपूर छिछले विज्ञापनों को प्रदर्शित करते रहते हैं, क्या उससे नारी की पारंपरिक उदात्त छवि को सम्मान प्राप्त होता है? उसने उनसे स्पष्टीकरण मांगा कि जब अमला भटनागर की सहमति और स्वीकृति से उसकी कहानी पर काम शुरू हुआ था तो फिर क्योंकर स्क्रिप्ट अस्वीकृत की गई?

उसे कतई उम्मीद नहीं थी कि उसकी भर्त्सनापूर्ण चुनौती का कोई सरकारी उत्तर आएगा; लेकिन जवाब उसके हाथों में है और वह निगम को पढ़कर सुना रही है। अपने को अविश्वसनीय और भौंचक स्थिति से घिरता हुआ महसूस करने के बावजूद…

उसकी शिकायत जवाबदेही के लिए अमला भटनागर को भेज दी गई थी। क्योंकि प्रत्युत्तर अमलाजी का आया है । अमलाजी ने साश्चर्य उसके आरोपों का खंडन किया है और सारे प्रकरण से स्वयं को ही नहीं, अधिकारियों को भी अनभिज्ञ बताया है । यह अवश्य स्वीकारा है कि विवेक बत्तरा से वे परिचित हैं और अकसर उसे अपने नाटकों में शरीक करती रहती हैं; परंतु न तो विवेक ने उनसे कभी उसकी किसी कहानी का जिक्र किया, न उसे दूरदर्शन के लिए किसी फिल्म का अनुबंध सौंपा गया है । वे अनुमान नहीं लगा पा रहीं कि वह कैसे ऐसे अनर्गल भ्रम का शिकार हुई कि…

पत्र खत्म कर उसने क्षुब्ध दृष्टि से निगम को देखा और जैसे उससे न कहकर अपने आपसे बुदबुदाई, “विवेक बत्तरा ने ऐसा क्यों किया?”

प्रत्युत्तर में निगम एकाएक ठहाका भरकर हंस पड़े । हंसी जो शुरू हुई तो फिर बढ़ती ही चली गई ।

वह खिसियाहट से भरी-भरी रुआंसी हो आई-“उपहास उड़ा रहे हो?”

“उपहास! और मैं?” उन्होंने सप्रयास हंसी को नियंत्रित करने की चेष्टा की और बोले, “भई, मैं तो कुछ और ही सोच रहा था ।”

उसने उत्सुक नजरों से उन्हें देखा ।

“अब देखो न, तुम रहती हो इस शहर में, देश की माया नगरी में । और जब भी किसी को इस शहर में अपनी पटरी साधनी होगी या किसी डेरे की तलाश…बंदा तुरंत तुम्हारी कहानी पर नाटक लिखने लगेगा, या रूसी या फ्रेंच में उसके अनुवाद की अनुमति चाहेगा। तुम खुश-और अगर ऐसे में वह इस शहर में आना चाहेगा तो भला तुम उसे बाहर कैसे रहने दे सकती हो!”

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