Anandmurti Guru maa

मन चाहता है सुख, मन चाहता है आनंद की प्राप्ति। मन चाहता है आनंद की प्राप्ति और आनंद की तलाश में कहां-कहां भटकता है। सारी जिंदगी को गौर से देखो पीछे, क्या-क्या नहीं किये आनंद को लेने की खातिर। ब्याह क्यों किया? बच्चे क्यों पैदा किये? धन क्यों कमाया?

हर आगंतुक इच्छा इसी आनंद की पूर्ति के लिए तो करता है आदमी, लेकिन वो बात अलग है कि इच्छा तो पूरी हो जाती है, पर आनंद नहीं मिलता। पर एक चीज है, ख्याल से देखोगे तो सच बात ये भी भाई कि कोई सुख नहीं है, जरा सा भी सुख नहीं है ब्याह में? अगर जरा सा भी सुख न होता तो लोग पागल हंै जो ब्याह करवाते फिरते हैं। कुछ तो होगा, ऐसे ही घोड़ियों पर चढ़े चले जा रहे हंै।ं। कुछ तो आनंद होगा न घोड़ी पर बैठने का, सेहरे सजाने का, पैसा खर्च करने का, लोगों को, रिश्तेदारों को बुलाने का, आओ जी, आओ जी क्या है? ब्याह है जी। सुख न हो तो लोग भाग-भागकर जाएं क्यों उसके? आने वालों को भी सुख लगता है, खाओ-पिओ, नाचो, सुख नहीं लगता। लेकिन संत जन कहते हैं कि इस सारे संसार में सुख है ही नहीं। तो थोड़ी सी तो इनको भी सोच करनी चाहिए कि संसार में जरा सुख न हो, जरा सा सुख न हो तो कोई संसार में रहेगा ही क्यों? अगर संतान में सुख न हो तो मांयें अपनी जान की बाजी लगाकर नौ-नौ महीने डबल डैकर बनी घूती रहती हैं इतना बोझा उठाकर, कभी न उठातीं। इतना कष्टï फिर प्रसर पीड़ा का, इतनी पीड़ा सहनी फिर डिलीवरी में। अगर उसमें कोई सुख न हो संतान में, तो क्यों स्त्री मां बने? कोई सुख तो होगा।

ख्याल से समझने की बात है ये। जरा सुख न हो, तो लड़का पैदा हुआ तो क्या जरा सा सुख न था? झूठ न बोलो अपने आप से। क्यों नहीं लगा था? लगा था। ब्याह हुए थे तो दोस्तों ने यारों ने बधाईयां दी थीं, अच्छा ब्याह हो रहा है वाह कोई सुख न हो तो लोग पागल हंै जो ब्याह कराते फिरते हैं। कोई सुख न हो धन की प्राप्ति में, क्यों जेब में नोट हैं, घर में तिजोरी गर्म है, तुम्हारी न हो पर दूसरों की है। तो उनको देखकर मन में एक दफा हाय नहीं उठती कि हाय, क्या मौज है इनकी? झूठ न बोलो, बड़ी गाड़ी में घूम रहे हैं, नौकर-चाकर आगे पीछे हैं, जहां जाते सेठ जी, सेठ जी,  और जिसके पास चार पैसे नहीं हैं, उसकी कोई इज्जत नहीं है, इसलिए तो हर आदमी जायज, नाजायज तरीके से धन प्राप्त करना चाह रहा है। अगर धन में सुख न हो तो रिश्वतें खा-खाकर क्यों मोटी माई बनाएं? कुछ तो होगा न रस। कुछ तो होगा न सुख। 

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