अज्ञानी आदमी सुषुप्ति (निद्रावस्था) से तो परिचित है हीं, पर जो ध्यान करता है, वो एक दूसरी अवस्था से भी परिचित है। ध्यान में बोलो किस बात का सुख है? किसका है? ध्यान में सुख है कि नहीं! है कि नहीं? अब ध्यान में आंख बंद किये बैठे हो, बाहर का कोई विषय नहीं, बाहर का कोई व्यक्ति नहीं, बाहर की कोई वस्तु नहीं खा रहे हो, कुछ भोग नहीं रहे हो, शब्द स्पर्श, रूप, रस, गंध में से एक भी विषय का भोग नहीं रहा है, तो भी अंदर सुख… किसका है? एक बात है परमात्मा से भले जान-पहचान है कि नहीं, पर अब अपने आनंद स्वरूप से पहचान हुई कि नहीं।

ध्यान में एक स्थिति ऐसी भी आ जाती है, भले ही वो अभी थोड़ी ही देर को आती हो, क्या? कि कोई विचार नहीं है थोड़ी देर के लिए भी तुम लोगों की, थोड़ी देर को वह स्थिति रहती है जब मन में कोई विचार नहीं। न संसार का, न परमार्थ का। वो जरा सा सेकेंड निर्विकल्पता का। वह जो भीतर निर्विकल्पता होती है सबसे प्यारी होती है क्योंकि उसमें हम अपने मन में अपना प्रतिबिंब नहीं देख रहे, मन ही को उड़ा दिया है, सीधे-सीधे अपने आपको देख रहे हैं।

शीशे में शक्ल दिख रही हो। शीशे में शरीर की शक्ल दिख रही हो और शीशे में जो शक्ल दिख रही हो, रोटी के टुकड़े अगर हम उसके मुंह में डालें, वो जो शीशे में दिख रही है तो भूख मिटेगी। बिंब की या प्रतिबिंब की? किसकी? बिना सोचे उत्तर न दो और हम तो एक सेकेंड में पकड़ लेंगे। बोलेया ते फंसेया। दरवाजा खटक रहा था। अंदर से कोई बोला, कौन है? बोलो, कौन है? अरे कौन है, कौन है क्या लगायी है? दरवाजा खोलो। तो जेड़ा बोले, ओहियो कुंडा खोले।

शीशे में शक्ल दिख रही हो तो शीशे वाली शक्ल को रोटी खिलाओ, दूध पिलाओ, किसकी भूख मिटेगी? दिखने वाले की या शरीर की? किसी की भी नहीं। शीशा तो जड़ है। किसको रोटी खिलाओ, शीशे वाले को? यहां कि यहां? यहां डालो तो भूख मिटती है। ऐसे ही जो सुख की अनुभूति आनंद स्वरूप के प्रतिबिंब होने पर मन के ठहरने पर मिलता है, वह भी झूठा है। वो क्षणिक है, वो विषयानंद है, विषय का आनंद है। 

कौन सा?

जो मन के ठहरने पर मुझ आनंद स्वरूप का प्रतिबिंब पड़ने पर मिले। तो प्रतिबिंब वाला सुख क्षणिक है क्योंकि प्रतिबिंब कब तक पड़ेगा, जब तक मन ठहरा है। जहां मन हिला, प्रतिबिंब पड़ेगा नहीं तो सुख मिलेगा नहीं। 

यह भी पढ़ें –मन की कल्पना के जाल – आनंदमूर्ति गुरु मां