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तलाश आनंद की – आनंदमूर्ति गुरु मां

मन चाहता है आनंद की प्राप्ति और आनंद की तलाश में कहां-कहां भटकता है। हर आगंतुक इच्छा इसी आनंद की पूर्ति के लिए तो करता है लेकिन वो बात अलग है कि इच्छा तो पूरी हो जाती है, पर आनंद नहीं मिलता।

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सुख की अनुभूति – आनंदमूर्ति गुरु मां

वो जरा सा सेकेंड निर्विकल्पता का। वह जो भीतर निर्विकल्पता होती है सबसे प्यारी होती है क्योंकि उसमें हम अपने मन में अपना प्रतिबिंब नहीं देख रहे, मन ही को उड़ा दिया है, सीधे-सीधे अपने आपको देख रहे हैं।

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मन की कल्पना के जाल – आनंदमूर्ति गुरु मां

सीमा में जो होगा, उसकी स्मृति हम कर सकते हैं, परमात्मा हर देश में, परमात्मा हर काल में, हर वस्तु में अनुगत है, तो एक दफे उसका बोध हो जाने पर चूंकि दूरी फिर नहीं होती तो स्मृति नहीं होगी।

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सतोगुणी होने के लिए यत्न करना होगा – आनंदमूर्ति गुरु मां

जिसे तुम छू न सको, जो शब्द से तुम्हें सुनायी न देगा। अदृश्यम्ï जो कभी दृश्य बनकर तुम्हारी आंखों के सामने आने वाला नहीं है। ऐसा सूक्ष्म, अति सूक्ष्म परमात्मा की सत्ता के बोध के लिए, अनुभव के लिए संन्यास है।

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जीवन का लक्ष्य – आनंदमूर्ति गुरु मां

जिसे तुम छू न सको, जो शब्द से तुम्हें सुनायी न देगा। अदृश्यम्ï जो कभी दृश्य बनकर तुम्हारी आंखों के सामने आने वाला नहीं है। ऐसा सूक्ष्म, अति सूक्ष्म परमात्मा की सत्ता के बोध के लिए, अनुभव के लिए संन्यास है।

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सवाल सिर्फ भावना का है – आनंदमूर्ति गुरु मां

ज्ञान किसको मिले? जो श्रद्घाभाव से शरणागत हो और अपना आप समर्पित करके कहे कि ‘गुरुदेव! ज्ञान दीजिए!’ ‘उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं’ तो ही गुरु उपदेश दे। ‘ज्ञानिन: तत्त्वदर्शिन: तो ही तत्त्व का दर्शन तुमको होता है।

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ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण है – आनंदमूर्ति गुरु मां

प्रत्यक्ष प्रमाण तब होता है जब उसको शब्द रूपी बाण दिया जाए। शब्द रूपी बाण नहीं दिया जायेगा तो तुम्हारे अनुमान अनुमान ही रह जाएंगे। तब वो कभी प्रत्यक्ष अनुभव नहीं बन सकेंगे।

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