मान लो रूमाल के तीन कोने हैं। रूमाल को हम तह इस तरह से लगाएं कि इसके तीन कोने दिखें। एक कोने को हम हाथ में पकड़ें तो बाकि के दो कोने भी साथ में आ जाऐंगे, पकड़ा चाहे हमने एक को था। जिस कोने को हमने पकड़ा है उस कोने पर हमारा अधिकार ज्यादा हो जाता है। पर दो कोने साथ में हैं। तीन हैं- जीव, जगत, ईश्वर।

जीव में रजोगुण प्रधान है, मायने-जीव ने रजोगुण वाला कोना पकड़ रखा है। तो उसमें तमोगुण भी है और सतोगुण भी है पर चूंकि जीव में रजोगुण प्रधान है इसलिए तो जीव चंचल है। जगत क्या है? जगत में तमोगुण प्रधान है, तो भी सतोगुण और रजोगुण उसमें है। देखो, जितनी तुम प्रकृति देखते हो, है तो जड़, है तो तमोगुण प्रधान लेकिन पानी भी बहता है, हवा भी बहती है।

रजोगुण में क्या है? क्रिया, चंचलता वो रजोगुण में होती है। पानी भी बहता है, शोर करता है। जितना जगत है ये तमोगुण प्रधान है। जीव रजोगुण प्रधान है, ईश्वर सतोगुण प्रधान है। चूंकि ईश्वर सतोगुण प्रधान है इसलिये ईश्वर को कभी अज्ञान नहीं होता है। प्रकाश को अंधेरा कैसे होगा? तो मुसीबत जड़ प्रकृति में है, वो तो सोयी हुई है, वो तो जड़ है, बेहोश। अब दीवारों को कोई तकलीफ है, न तो ईश्वर को कोई तकलीफ है।

ईश्वर को क्या तकलीफ होगी वो तो सतोगुणी है, माया की ताकत रखता है। कभी नहीं भूलता कि मैं ब्रह्मï की सत्ता से हूं। ये जड़ प्रकृति भी मस्त है, अपने तमोगुण में है। परेशान बेचारा ये जीव ही है।

तमोगुणी हो ही नहीं सकता, जड़ वापस हो नहीं सकता। सतोगुणी होने के लिए यत्न करना पड़ेगा। इसको। आदमी कहता है, बाहर की कोई होश न रहे पी लो शराब, खा जाओ अफीम। पर कितनी देर रहेगा ऐसा, फिर होश आ जायेगा। फिर रजोगुण, फिर वही काम-धंधा, वही सारा कुछ और जीव अगर कोशिश करके समाधि लगाता है तो समाधि कितनी देर रहेगी।

योग की जड़ समाधि लगाते हो, हठ योग की समाधि लगाते हो, तो वो कई सौ साल की हो सकती है, कई हजार साल की हो सकती है कई युग की हो सकती है, पर एक दिन तो समाधि टूटेगी। और अगर ज्ञान से समाधि लगाना चाहो तो जब तक ज्ञान का चिंतन रहता है तब तक मन ध्यानस्थ रहता है, पर फिर वापिस। जड़ प्रकृति जैसे वापस तुम हो नहीं सकते, ईश्वर जैसा सतोगुणी होने के लिए कितना प्रयत्न है, समझ रहे हो कि नहीं। एक अपने मूल स्वभाव में ही फर्क लाना है।

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