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मन की कल्पना के जाल – आनंदमूर्ति गुरु मां

सीमा में जो होगा, उसकी स्मृति हम कर सकते हैं, परमात्मा हर देश में, परमात्मा हर काल में, हर वस्तु में अनुगत है, तो एक दफे उसका बोध हो जाने पर चूंकि दूरी फिर नहीं होती तो स्मृति नहीं होगी।

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सतोगुणी होने के लिए यत्न करना होगा – आनंदमूर्ति गुरु मां

जिसे तुम छू न सको, जो शब्द से तुम्हें सुनायी न देगा। अदृश्यम्ï जो कभी दृश्य बनकर तुम्हारी आंखों के सामने आने वाला नहीं है। ऐसा सूक्ष्म, अति सूक्ष्म परमात्मा की सत्ता के बोध के लिए, अनुभव के लिए संन्यास है।

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