आनंदमूर्ति गुरु मां का जीवन परिचय

गुरु और शिष्य का संबंध प्रगाढ़ रूप से तब होता है, जब मन की कल्पनाओं को तोड़कर, बुद्धि के अभिमान को छोड़कर गुरु के चरणों में नतमस्तक हो जायें, तो जाकर गुरु और शिष्य का संबध बन पाता है, नहीं तो नहीं बन पाता है।

मन ही की कल्पना में है तो कहते हैं ये हमारे गुरु  है। और मन ही की कल्पना में अच्छे लगते हैं। कुछ दिन और कभी-कभी यह भी हो जाता है कि किसी छोटी सी बात पर वही गुरु जी अब अच्छे नहीं लगते। इसलिए गुरु और शिष्य का संबंध जो मन से जुड़ा होगा वह आज नहीं तो कल टूट सकता है, कभी भी चटक सकता है। मन है आज गुण देखेगा, यही मन है कल को अवगुण भी देख सकता है। आंखों से जिसको देखा नहीं, कानों से जिसको सुना नहीं, उसके विषय में क्या करेंगे कल्पना।

संसार की चीजों के लिए कल्पना, स्मृति और अनुभव लागू होते हैं, लेकिन परमात्मा के लिए स्मृति लागू नहीं होती है। क्यों? क्या कारण है? सीमा में जो होगा, उसकी स्मृति हम कर सकते हैं, परमात्मा हर देश में, परमात्मा हर काल में, हर वस्तु में अनुगत है, तो एक दफे उसका बोध हो जाने पर चूंकि दूरी फिर नहीं होती तो स्मृति नहीं होगी। और संतों ने कहा स्मृति करो। तो वो क्या? वो कहते हैं ये स्मृति करो कि परमात्मा तुमसे दूर कभी नहीं है। ये स्मृति नहीं करनी है कि परमात्मा का ये स्वरूप था, ये स्मृति नहीं करनी है कि मैंने उस स्वरूप में परमात्मा को देखा था।

अर्जुन कहता है न गीता में-

‘नष्ट मोहा: स्मृति लब्धवा।’

मेरा मोह नष्ट हुआ, मुझे मेरी स्मृति मिल गयी है। स्मृति माने बिछड़े हुए को याद करना नहीं। ये स्मृति कि परमात्मा नित्य प्राप्त है, ये स्मृति है कि संसार मेरी कल्पना का जाल है, ये स्मृति कि संसार झूठ है। इसलिए कबीर ने शब्द थोड़ा सा बदल दिया और इसको कहा- सुरत! सुरति! बोले स्मृति में गड़बड़ होती है।

मन के इस पूरे विस्तार को, मन की इस पूरी कल्पना के जाल को तोड़ें कैसे? क्योंकि अभी तक जो तुम सुन रहे हो वो भी मन की कल्पना, जो मान रहे हो वह भी मन की कल्पना है। किसी भी चीज का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है।

एक बात याद रखना, संसार का भी प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है। जैसे, ये क्या है, हमारा शरीर। ये तो सिर है, यह माथा, नाक, मुंह, बांहें, टांग, सीना, पेट शरीर कहां है? है प्रत्यक्ष अनुभव शरीर का? प्रत्यक्ष अनुभव नाम की चीज कौन सी है? है सारा मन की कल्पना का जाल। 

यह भी पढ़ें – जन-जन के प्रिय तुलसीदास